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विषय-सूची

मार्कण्ड ऋषि का दृष्टान्त

मार्कण्ड ऋषि एक ताल पर तपस्या कर रहे थे । उनकी तपस्या पूरी होने से पहले ही नारद जी ने मार्कण्ड ऋषि से कहा कि आपकी तपस्या पूरी हो चुकी है । भगवान आपको दर्शन देने आने वाले हैं । उनसे यह मांगना कि हे भगवान ! मुझे माया भी पूरी दिखाइये तथा चरणों से भी दूर न कीजिए ।

जब भगवान नारायण साक्षात्‌ आए तथा दर्शन देकर मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि पुत्र ! क्‍या चाहते हो ? तब मार्कण्डेय ऋषि ने कहा कि हे नाथ ! मुझे माया भी देखनी है किन्तु आप अपने चरणों से भी दूर न कीजिए । पहले मुझे चन्दन-पुष्प से पूजन कर लेने दीजिए । तब नारायण ने कहा कि जितने समय में तुम चन्दन-पुष्प से पूजन करोगे, उतने में ही माया दिखा दूंगा । जैसे ही वे चन्दन घिसने के लिए बैठे, तो नारायण ने मार्कण्ड पर माया का आवरण डाला तथा उन्हें गहरी नदी में गोते खाते हुए दिखाया ।

उस ताल पर बैठे-बैठे ही मार्कण्डेय जी स्वयं को एक वस्त्रहीन स्त्री के रूप में देख रहे हैं तथा किनारे पर एक धोबी कपड़े धो रहा है । धोबी ने पूछा कि तुम कौन हो, कहां से आए हो और कहां जाना है ? और उसे पहनने के कपड़े भी दे दिए । मार्कण्डेय ऋषि उस नदी में गोते खाने के कारण अपनी मूल अवस्था को भूल चुके थे । वे कुछ भी उत्तर नहीं दे सके । तब धोबी समझ गया कि यह पानी में डूबने की बेहोशी में सब कुछ भूल गई है । उसने शादी के लिए आग्रह किया कि मैं भी बिना परिवार के हूं । यदि आप चाहें तो मेरे साथ शादी करके जीवन निभा सकती हैं । तो उस स्त्री के रूप में मार्कण्डेय ने शादी करना स्वीकार कर लिया । फिर क्‍या था ? साल बाद एक बच्चा पैदा हुआ । काम बढ़ गया परन्तु कोई चिन्ता नहीं की । दूसरे साल जब दूसरा बच्चा हो गया, तो काम और भी बढ़ गया और घर में खटपट हो गई । जैसे-तैसे वह साल बीता तो तीसरे साल एक बच्चा और हो गया । तब धोबी की पत्नी बच्चों की देखभाल में लग गई । खर्चा बढ़ गया, धोबिन काम में सहायता नहीं कर पाती थी । लोगों को कपड़े देर से मिलने के कारण लोगों ने अपने कपड़े दूसरे धोबी को देना शुरु कर दिया, जिससे धोबी और धोबिन में और खटपट होने लगी । चौथे वर्ष एक और बच्चा हो गया । अब दोनों में मारपीट भी होने लगी ।

एक दिन धोबी ने धोबिन को इतना पीटा कि उसने आत्महत्या का निर्णय कर लिया । जैसे ही धोबी कपड़े धोने के लिए गया और उसकी पत्नी ने फांसी लगाने के लिए फंदा लगाया ही था कि ताल पर खड़े आदि नारायण ने देखा कि मेरे भक्त मार्कण्डेय ऋषि तो फांसी लगा रहे हैं । उन्होंने साधु का रूप धारण कर धोबिन के दरवाजे को खटखटाया । धोबिन ने समझा कि धोबी आ गया है । उनसे दरबाजे को जैसे ही खोला तो साधु को देखकर गालियां निकालनी शुरु कर दीं । तो साधु ने कहा कि हम मार्कण्डेय की कथा सुनाते हैं, तब हम भोजन पाते हैं और यह कहते हुए धोबिन के घर में घुस गए ।

तब साधु रूप में आए नारायण वहां पर बैठ गए तथा मार्कण्डेय का पूरा दृष्टान्त कह सुनाया । तब धोबिन उस दृष्टान्त को सुनकर समझ गई कि यह सब मेरा ही प्रसंग है । तब साधु के चरणों में गिरकर चिल्लाकर बोली कि हे भगवान ! मुझे बचाइए । तब नारायण ने अपनी माया का आवरण हटाया तथा मार्कण्डेय ने अपने असल रूप को देखा तथा जैसे ही भगवान की ओर देखा, तब भगवान ने पूछा कि क्या माया देखोगे ? तब उन्होंने कहा कि हे भगवान ! अब मैं कभी भी माया नहीं देखूंगा ।

मार्कण्डेय की ही तरह ब्रह्मसृष्टियां भी माया में आकर भूल गई हैं और स्वयं अक्षरातीत श्री राजजी महाराज हमें जगाने के लिए आए हुए हैं ।