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परमहंस मकुन्द दास अहदी | Makund Das Ahdi

श्री मकुन्द दास का जन्म लगभग सम्वत् 1725 (सन् 1668) में हरदोई जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था । उनका परिवार अत्यन्त दरिद्र था और वे भेड़-बकरियां चराकर गुजारा करते थे ।

एक दिन साधु के वेश में एक दिव्य पुरुष उनके घर के द्वार पर खड़े होकर उनका नाम पुकारने लगे । उस समय मकुन्द दास जी बाहर गए हुए थे । उनकी माता ने उस व्यक्ति को बताया कि मकुन्द घर पर नहीं है, साथ ही उनका परिचय भी पूछ लिया ।

उस दिव्य पुरुष ने उत्तर दिया- जब मकुन्द घर लौटे, तो उससे कहना कि पन्ना से प्राणनाथ आए थे और वह पन्ना आ जाए ।

यह कहकर दिव्य पुरुष तत्काल चले गए ।

जब मकुन्द दास जी सन्ध्या में लौटे, तो उनकी माता ने उन्हें सूचना दी- पन्ना से कोई प्राणनाथ आए थे और तुम्हें बुला गए हैं ।

माता के मुख से "प्राणनाथ" शब्द सुनते ही मकुन्द दास के शरीर में सिहरन हो गई और वे तत्काल पन्ना के लिए निकल पड़े । मकुन्द दास पन्ना के लिए निकल तो गए, परन्तु वन में दिशा भटक गए । तब पुनः उसी दिव्य पुरुष ने दर्शन देकर उन्हें सरलता से पन्ना तक पहुंचा दिया ।

जब मकुन्द दास जी बंगला जी में पहुंचे, तो सिंहासन पर श्री प्राणनाथ जी विराजमान थे और पूरा दरबार सुन्दरसाथ से भरा हुआ था । महामति जी के निकट पहुंच कर उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया । श्री जी ने बहुत प्रेम से उनका स्वागत किया ।

मकुन्द दास भी अन्य सुन्दरसाथ की तरह श्री प्राणनाथ की सेवा में लग गए । एक दिन श्री जी ने एक चिरमची (पीकदान) उन्हें देते हुए कहा कि इसे बाहर फेंक आओ । मकुन्द दास तो उन्हें अपनी आत्मा का प्रियतम मान चुके थे । अपनी अटूट श्रद्धा के चलते मकुन्द दास उस चिरमची को पी गए । उनकी श्रद्धा देखकर श्री जी बहुत प्रसन्न हुए ।

श्री प्राणनाथ ने मकुन्द दास से कहा- हे हेमकुंवर ! तुम परमधाम की आत्मा हो । अपने मूल घर निजधाम को याद करो । वहां की आनन्दमयी लीलाओं का ध्यान करो । अब तुम्हें माया स्पर्श नहीं कर सकती । अब तुम अवध क्षेत्र में जाओ ।

श्री जी की कृपा से मकुन्द दास जी को मूल स्वरूप तथा परमधाम का दर्शन प्राप्त हुआ । उनके आदेश से वे उत्तर भारत में विचरण करने लगे । तदोपरान्त मलिहाबाद (जिला लखनऊ) को उन्होंने अपनी साधना व ज्ञान-प्रचार का केन्द्र बनाया ।

मलिहाबाद में बहुत आम के बाग थे और वहां रहने वाले अधिकांश लोग मुस्लिम थे । जब मकुन्द दास जी वहां रहकर साधना करने लगे, तो यह बात स्थानीय लोगों को अच्छी नहीं लगी । वे लोग तरह-तरह से उन्हें परेशान करने लगे ।

एक दिन जब परमहंस मकुन्द दास ध्यान कर रहे थे, तो स्थानीय लोगों ने उन्हें आसन सहित उठाकर एक गड्ढे में डाल दिया और उस गड्ढे को चारपाई से ढक दिया । ऐसा करके वे लोग प्रसन्नतापूर्वक लौट रहे थे कि तभी उन पर हजारों मधुमक्खियों ने आक्रमण कर दिया । सभी लोग बुरी तरह घायल हो गए । वे समझ गए कि मकुन्द दास जी कोई साधारण पुरुष नहीं हैं । जब उन्होंने मकुन्द दास जी से क्षमा मांगी, तब मधुमक्खियों का आतंक समाप्त हुआ ।

परमहंस मकुन्द दास द्वारा कहे गए कुछ पदों का संकलन भजन संग्रह और ज्ञान तिलक नामक पुस्तकों में है ।

सम्वत् 1760 (सन् 1703) में परमहंस मकुन्द दास जी ने जीवित समाधि ले ली ।

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