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परमहंस मंगल दास गुरुजी | Guruji Mangal Das

मंगल दास जी की जन्म सन् 1896 में नेपाल के ईलाम जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था । उनकी माता का नाम नर्वदा बाई तथा पिता का नाम कल्याण दास था । जब उनकी आयु डेढ़ वर्ष थी, तब उनके माता-पिता उन्हें लेकर रांशाली (असम) की यात्रा पर आए और वहां श्री पीताम्बर दास से तारतम ग्रहण किया ।

मंगल दास जी का बाल्यकाल रांशाली में ही बीता । उनके भाई जगन्नाथ का जन्म वहीं पर हुआ । बाल्यावस्था में ही उनके पिता का देहान्त हो गया ।

जब उनकी आयु बारह वर्ष की थी, तब उनकी माता अपने दोनों पुत्रों को लेकर पन्ना की यात्रा के लिए निकल पड़ीं । वहां उनकी माता ने साध्वी का वेश धारण कर लिया और दोनों पुत्रों को भी साधु वेश धारण करवाकर श्री प्राणनाथ अन्न क्षेत्र में भर्ती करवा दिया ।

बारह वर्ष की छोटी सी आयु में मंगल दास जी ने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और श्री प्राणनाथ अन्न क्षेत्र में विद्या अध्ययन करने लगे । उन्होंने श्री मेहेर दास से श्री कुलजम सरूप की तालीम (शिक्षा) ली ।

जब मंगल दास जी के गुरु श्री पीताम्बर दास श्री महा मंगल पुरी, सूरत की गादी पर विराजमान हुए, तब उनसे भेंट करने के लिए मंगल दास जी सूरत गए । लगभग एक वर्ष उनके सान्निध्य में रहने के बाद वे श्री नौतनपुरी, जामनगर का दर्शन करने गए । नौतनपुरी के आचार्य धनी दास से भी उन्होंने दो वर्ष तक तारतम वाणी की शिक्षा प्राप्त की । उसके पश्चात् वे अनेक वर्षों तक अलग-अलग स्थानों पर मन्दिरों में सेवा तथा भक्ति करते रहे ।

अनेक तीर्थों में भ्रमण के पश्चात् सन् 1935 में मंगल दास जी विरक्त भाव से हरिद्वार में गंगा किनारे साधना करने लगे । वहां उन्हे श्री राज के दर्शन हुए । उनकी प्रेरणा से मंगल दास जी पन्ना गए और गुम्मट जी में हाथ जोड़कर ज्ञान प्रचार की अनुमति मांगी । तब श्री जी साहेब की प्रेरणा से वे पूर्व दिशा में ज्ञान प्रचार के लिए निकल पड़े । उस समय उनकी आयु चालीस वर्ष थी ।

पहले तो मंगल दास जी ने तीन वर्ष तक प्रणामी मन्दिर, इच्छे, कालिम्पोंग में सेवा करी । सन् 1940 में उन्होंने श्री कृष्ण प्रणामी मन्दिर (मंगल धाम), कालिम्पोंग की स्थापना करी । यहां से वे असम, सिक्किम, भूटान और नेपाल में तारतम ज्ञान का प्रचार करने लगे । सन् 1944 में उन्होंने प्रणामी बालिका विद्या मन्दिर, कालिम्पोंग की स्थापना करी । सन् 1962 में उन्होंने जुई (हरियाणा) में और सन् 1966 में सिलीगुड़ी में मन्दिर बनवाए ।

श्री मंगल दास द्वारा लिखी गई कुछ पुस्तकों के नाम हैं- प्रार्थना पुष्पांजलि, आत्म सोपान, अन्तर्दृष्टि, आदि ।

सन् 1971 में उन्होंने सलकपुर (नेपाल) में मन्दिर की स्थापना करी । सन् 1972 में सिलीगुड़ी में श्री प्राणनाथ ब्रह्मचर्य आश्रम और संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना करी । सन् 1979 में श्री कृष्ण प्रणामी विद्या निकेतन स्कूल, सिलीगुड़ी की स्थापना करी । सन् 1980 में इटहरी (नेपाल) और सन् 1982 में भिवानी (हरियाणा) में मन्दिर बनवाया ।

परमहंस मंगल दास गुरुजी

श्री मंगल दास ने अनाथ बच्चों के लिए कालिम्पोंग और सिलीगुड़ी में आश्रम भी बनवाए । उन्होंने अपने जीवन काल में पचास से अधिक मन्दिर, विद्यालय, आश्रम, आदि बनवाए । उनके छात्र उन्हें प्यार से "गुरुजी" कहकर पुकारते थे । वर्तमान में उनकी संस्थाओं का संचालन गुरुजी प्रणामी मिशन ट्रस्ट द्वारा किया जाता है ।

सन् 1985 में 89 वर्ष की आयु में गुरुजी मंगल दास का धाम गमन हो गया ।

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