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परमहंस नारायण दास | Narayan Das

श्री नारायण दास का जन्म काल लगभग सन् 1865 से 1870 के बीच का है । वे सोनगीर, महाराष्ट्र में रहते थे और लोगों को दिखाने के लिए ठठेरे (पीतल-तांबे के बर्तन बनाने) का काम करते थे । श्री राम रतन की जीवनी के कुछ प्रसंग देखकर यह पता चलता है कि परमहंस श्री नारायण दास के अन्दर श्री राज का पूर्ण जोश था ।

जब श्री राम रतन सद्गुरु की तलाश करते हुए सोनगीर पहुंचे, तो वे सीताराम मन्दिर में समाधि में बैठ गए । लोगों ने उन्हें मृत समझ लिया, परन्तु परमहंस श्री नारायण दास ने उनकी नाड़ी देखकर जान लिया कि वे समाधि में हैं । तब परमहंस महाराज विभूति देकर उन्हें चेतना में वापस लाए ।

परमहंस महाराज ने श्री राम रतन को सुपात्र जानकर उन्हें परमधाम और श्री राज के विषय में सम्पूर्ण ज्ञान प्रदान किया । उनकी कृपा से श्री राम रतन को समस्त निधियां प्राप्त हो गईं । पहले उन्होंने श्री राम रतन को चार मास तक गांव के बाहर एकान्त में सोमेश्वर के शिव मन्दिर में ठहराया, फिर बस्ती के पास एक खेत में उनकी कुटिया बनवा दी । वे प्रतिदिन प्रातः प्रसाद और फूल-हार लेकर उनसे मिलने जाते थे और उन्हें परमधाम की चर्चा आदि से तृप्त करते थे ।

परमहंस नारायण दास एवं परमहंस राम रतन दास

एक दिन गांव का एक आदमी श्री राम रतन के पास आकर उनके सम्मुख परमहंस श्री नारायण दास की निन्दा करने लगा और उनके लिए अपशब्द कहने लगा । श्री राम रतन के मना करने पर भी वह नहीं माना, तो उन्होंने उसे चले जाने के लिए कहा ।

व्यक्ति बोला- मैं मर जाऊंगा, परन्तु यहां से उठूंगा नहीं ।

श्री राम रतन ने कहा- मरना तो तुम्हें है ही, पर अपने घर जाकर मरना ।

किसी तरह उसे वहां से भगाया । घर जाते ही उसकी मरणासन्न अवस्था हो गई । घर में शोर मच गया । उसके सभी रिश्तेदार एकत्रित हो गए । जब पता चला कि कुछ देर पहले वह श्री राम रतन के पास बैठा था, तो सभी लोग उनके पास आकर घर चलने की विनती करने लगे । श्री राम रतन ने साफ कह दिया कि जब तक सद्गुरु महाराज नहीं जाएंगे, वे भी नहीं जाएंगे । तब लोग परमहंस श्री नारायण दास को आग्रह करके उसके घर ले गए । सद्गुरु महाराज को जाते देखकर श्री राम रतन भी उनके साथ हो लिए ।

उस व्यक्ति के घर पहुंचकर परमहंस श्री नारायण दास ने अपने बटुवे से विभूति निकालकर उसे दी, तो वह तत्क्षण ठीक हो गया । अब वह परमहंस श्री नारायण दास के चरणों में गिरकर क्षमा-याचना करने लगा ।

तब श्री राम रतन ने उससे कहा- देखा ! तुम जिनकी निन्दा कर रहे थे, आज उनकी कृपा से ही तुम्हारा जीवन बच सका है ।

इसी प्रकार नन्दलाल नाम का एक व्यक्ति प्रतिदिन श्री राम रतन के पास आकर चमत्कार दिखाने की मांग करता था । श्री राम रतन उससे तंग आ गए थे । तब वे परमहंस महाराज के पास आए और उन्हें अपनी समस्या बताई ।

परमहंस श्री नारायण दास ने कहा- कल जब नन्दलाल आए, तो उससे कहना कि परसों चमत्कार दिखेगा ।

श्री राम रतन ने वैसा ही किया । अगले दिन नन्दलाल अपने घर में दीवार से टेक लगाकर बैठा था कि दीवार उसके ऊपर गिर गई । किसी तरह वह बच गया । घर के लोग भागकर श्री राम रतन के पास आए, परन्तु उन्होंने साफ कह दिया कि सद्गुरु महाराज के बिना वे नहीं जाएंगे । तब लोग परमहंस श्री नारायण दास और श्री राम रतन को विनती करके उसके घर ले गए ।

दोनों स्वरूपों को देखकर नन्दलाल बोला- कृपा करो प्रभु । मैं आपका अपराधी हूं । मुझे जल्दी माफ कर दो क्योंकि मैं मरने वाला हूं ।

परमहंस श्री नारायण दास ने कहा- नन्दलाल ! मरने की बात मत करो, अभी तुम्हें नहीं मरने देंगे । अभी तो बहुत से चमत्कार देखने बाकी हैं । यदि तुम मर गए, तो उन चमत्कारों का क्या होगा ?

यह कहकर परमहंस महाराज ने अपने बटुवे से विभूति निकालकर उसे दी । उस विभूति से नन्दलाल का शरीर तो ठीक हो गया, परन्तु बुद्धि पर असर बना रहा ।

उस दिन के बाद नन्दलाल की बुद्धि वैकुण्ठ वासियों जैसी हो गई । उसके अन्दर देव वृत्ति जाग गई । विरक्त लोगों की भांति, वह अपना सब कुछ दान करने लगा । घर में उपलब्ध समस्त अन्न-धान, दूध, बर्तन, वस्त्र, आदि उसने गरीबों और मन्दिरों को दान कर दिया । उसकी ऐसा हालत देखकर घर वाले श्री राम रतन के पास गए और क्षमा मांगने लगे । तब उन्होंने यह बात परमहंस महाराज से कही । सारा वृत्तान्त सुनकर परमहंस महाराज मुस्कराए और नन्दलाल को अपने पास बुलवाया ।

परमहंस श्री नारायण दास ने कहा- नन्दलाल ! तुम्हारा चित्त प्रसन्न तो है । सुना है तुम धरती पर ही वैकुण्ठ का सुख भोग रहे हो । अभी और चमत्कार देखने की इच्छा है ?

नन्दलाल काठ सा बना रहा, एक शब्द भी नहीं बोला । तब परमहंस महाराज ने उसे प्रसाद खिलाया, जिससे उसकी बुद्धि सामान्य हो गई ।

एक बार श्री राम रतन ने किसी गांव में एक मृत युवक को जीवित कर दिया था । परमहंस श्री नारायण दास ने उन्हें तुरन्त सोनगीर बुलवाया । जब परमहंस महाराज ने पूछा कि उसके स्थान पर कौन जाएगा, तब श्री राम रतन ने उत्तर दिया कि वे जाएंगे । इसके बाद परमहंस महाराज ने उन्हें लेटने के लिए कहा और उनके ऊपर चादर ओढ़ा दी ।

कुछ देर बाद जब श्री राम रतन उठे, तो उन्होंने परमहंस श्री नारायण दास के स्थान पर साक्षात् श्री राज को बैठे देखा । इसमें कोई संशय नहीं है कि परमहंस महाराज के अन्दर श्री राज का वास था । इसके बाद श्री राम रतन पर कृपा करके राज जी उनके अन्दर प्रवेश कर गए । इस प्रकार परमहंस महाराज ने अपना सब कुछ उनको दे दिया ।

जिस युवक को श्री राम रतन ने जीवन दान दिया था, उसके स्थान पर परमहंस महाराज ने अपने पुत्र का बलिदान दे दिया । अगले दिन ही उनके पुत्र का देहान्त हो गया ।

जब परमहंस महाराज की लीला पूरी होने को थी, तो उन्होंने श्री राम रतन को सोनगीर बुलवा लिया । कुछ दिन साथ रहने के पश्चात् सन् 1939 में परमहंस श्री नारायण दास समाधि में लीन हो गए ।

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