Kuljam.org

विषय-सूची

परमहंस राम रतन दास | Ram Ratan Das

परमहंस श्री राम रतन महाराज साक्षात् प्रेम के स्वरूप थे । उनके जीवन में तप, त्याग, श्रद्धा, प्रेम व समर्पण के अतिरिक्त कुछ नहीं था । श्री राज और अपने सद्गुरु के प्रति उनमें अटूट श्रद्धा थी । उनके कोमल हृदय व उच्च आध्यात्मिक अवस्था के कारण उन्हे "परमहंसों में परमहंस" कहा जाता है । उनकी कृपा से अनेक परमहंस हुए । जो उनकी शरण में आता, वह उन्ही का होकर रह जाता । उनका संक्षिप्त जीवन परिचय यहां प्रस्तुत है ।

परमहंस राम रतन दास

जन्म व प्रारम्भिक जीवन

श्री राम रतन का जन्म सन् 1894 में जड़ौदा ग्राम, सहारनपुर, उ. प्र. में हुआ था । बचपन में उनका नाम झण्डू दत्त रखा गया था । वे बचपन से ही बहुत सन्तोषी स्वभाव के थे, अधिक की लालसा नहीं करते थे । उनके पिता का नाम छज्जू जी था और वे पुरोहिती का कार्य करते थे । उनकी माता का नाम मगन देवी था । उनका एक छोटा भाई भी था, जिसका नाम बुद्धि दास था ।

एक बार उनके पिता उन्हें मेले में ले गए । तब उनकी आयु छह वर्ष थी । उनके पिता ने उन्हें कुछ देर के लिए गांव की महिलाओं के पास छोड़ दिया । अपने पिता को न पाकर, वे वहां से भागकर रोते हुए गांव की तरफ चल पड़े । मार्ग में किसी चोर ने उनका अपहरण कर लिया और बहुत मुश्किल से वह बच पाए ।

जब वे आठ वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहान्त हो गया । जब उनकी आयु बारह वर्ष की थी, तब गांव में महामारी फैल गई जिसमें उनकी माता की भी मृत्यु हो गई । वह बहुत ही मार्मिक दृश्य था क्योंकि माता के अन्तिम संस्कार के लिए उन्हें घर-घर जाकर पूछना पड़ा कि क्या आपके घर पर कोई मरा है ?

माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् दोनों भाइयों का जीवन बहुत दरिद्रता में बीता । कभी पुरोहिती से कुछ मिठाई मिल जाती, तो दोनों भाई प्रतिदिन एक-एक लड्डू खाकर पूरा दिन गुजार लेते । किसी दिन थोड़ा गुड़ खाकर और पानी पीकर सो जाते । किसी-किसी दिन भूखे ही सोना पड़ता । कई वर्षों तक बुआ ने दोनों भाइयों का स्नेह से पालन किया ।

नौ वर्ष की आयु तक गांव की चौपाल में महाराज जी ने हिन्दी भाषा की शिक्षा प्राप्त की, ढाई महीने संस्कृत का भी ज्ञान प्राप्त किया । पन्द्रह वर्ष की आयु तक उन्होंने रामायण को कण्ठस्थ कर लिया था ।

एक दिन बुआ को उनके घर में दबा हुआ धन मिल गया, जिससे उन्होंने जबरन दोनों भाइयों का विवाह कर दिया । जब श्री राम रतन अठारह वर्ष के थे, तब उनकी पुत्री का जन्म हुआ । उसके पश्चात् महाराज जी के मन में वैराग्य बढ़ गया ।

आध्यात्मिक यात्रा व तप

उन्नीस वर्ष की आयु में श्री राम रतन ने गृह का त्याग कर दिया । वे अर्ध रात्रि को घर छोड़कर परमात्मा का दर्शन करने के उद्देश्य से पैदल निकल पड़े । कई दिनों तक बिना कुछ खाए वे मथुरा की तरफ बढ़ चले । तीन दिन बाद एक लाला ने भोजन करवाया ।

उस समय अंग्रेजी सरकार खाली पड़े द्वीपों को बसाने के लिए लोगों को एकट्ठा कर रही थी । दो सिपाहियों ने जबरन महाराज जी को फिजी देश को भेजे जाने वाले दस्ते में कलकत्ता भेज दिया । किसी तरह वहां से बचकर महाराज जी ट्रेन से मथुरा के लिए चले ।

मार्ग में शिक्षा नगरी बनारस आया । महाराज जी के मन में विचार आया कि संस्कृत की शिक्षा पाकर शास्त्री बनना चाहिए । इसी उद्देश्य से वे बनारस उतर गए । वहां जैसे ही वे विद्यालय में प्रवेश करने लगे, उनके मन में संशय हुआ कि प्रभु की सेवा में लगना इससे अच्छा है । आठ दिन तक वे विद्यालय के द्वार से लौटते रहे । नौवें दिन विद्यालय के द्वार पर एक महात्मा ने उन्हे समझाया कि लौकिक विद्या में क्या रखा है, जगन्नाथ मन्दिर (पुरी) में साक्षात् दर्शन होते हैं, तुम वहां जाओ । यह कहकर वह महात्मा अदृश्य हो गए । उनकी बात से प्रभावित होकर महाराज जी पुरी के लिए पैदल निकल पड़े ।

इस लम्बी यात्रा में महाराज जी दिन भर चलते रहते तथा किसी गांव के बाहर पेड़ के नीचे बैठे-बैठे रात बिता दिया करते । मार्ग में एक महात्मा के उपदेश पर उन्होंने अनावश्यक सामान त्याग दिया और हल्का महसूस करने लगे । वे उन दिनों शिव जी का ध्यान करते थे । एक रात्रि एक दिव्य पुरुष ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि वे गुरु कर लें ।

महाराज जी को चमत्कार और सिद्धियों में कोई रुचि नहीं थी । मार्ग में मिलने वाले अवधूत और सिद्ध पुरुषों के प्रति उन्हें कोई आकर्षण नहीं होता था । वे तो सिर्फ परमार्थ की चिन्ता करने और साधु-महात्माओं की संगति में रहना पसन्द करते थे ।

एक रात्रि वे पेड़ के नीचे बैठे थे । तभी एक आवाज आई कि अब शिव दर्शन होंगे । उसके बाद सामने प्रकाश हो गया और साक्षात् शिव जी प्रकट हुए । महाराज जी उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हुए और उनको प्रणाम किया ।

शिव जी बोले- ऐ भक्त ! गुरु धारण कर लो ।

महाराज जी ने पूछा- किसे गुरु बना लूं ?

शिव जी बोले- तुम्हें यहां से आगे मिलेंगे ।

यह कहते ही शिव जी अदृश्य हो गए और चारों तरफ पुनः अन्धकार छा गया ।

इस घटना के कुछ दिन बाद महाराज जी जगन्नाथ पुरी पहुंच गए । उस समय उनके शरीर पर सिर्फ एक लंगोटी और हाथ में एक लोटा था । चन्दन ताल में स्नान करके वह मन्दिर में प्रवेश कर गए । वहां काठ की मूर्ति देखकर वे विस्मित हो गए । तभी उन्हें एक परिचित साधू मिल गया ।

महाराज जी ने उस साधू से पूछा कि क्या उसे नाथ जी के दर्शन हो गए ? उसने कहा कि साक्षात् भगवान सामने दर्शन दे रहे हैं । यह सुनकर महाराज जी को आश्चर्य हुआ कि सबको दर्शन हो रहे हैं, तो उन्हें क्यों नहीं हुए ? उन्होंने दो परिक्रमा लगाई, परन्तु तब भी दर्शन नहीं हुए । एक पण्डा यह सब देख रहा था । वह सिपाही लेकर आया कि मन्दिर में एक पागल घुस आया है और महाराज जी को अपमानित करके निकलवा दिया ।

साक्षात्कार न मिलने से महाराज जी बहुत दुःखी हुए और आठ दिन तक समुद्र तट पर बैठकर चिन्तन करते रहे । तब उन्होंने गुरु की खोज में उत्तर की ओर प्रस्थान किया । अभी तक महाराज जी पांच दिन में एक बार आहार लेते थे, अब से उन्होंने पांचवे दिन सिर्फ फलाहार करना शुरु कर दिया । हिमालय पर्वत पर महादेव मन्दिर में दर्शन करने के बाद, वे गौमुख धारा के पास बनी कुटिया में कुछ दिन रहे ।

एक रात्रि उन्हें पहले जैसा दृश्य दिखा । सबसे पहले किसी अदृश्य शक्ति ने उनकी बांहें मरोड़ीं, फिर एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए ।

दिव्य पुरुष ने कहा- अब महादेव जी की मण्डली पधार रही है । ऐसे दर्शन बहुत दुर्लभ हैं ।

उसके बाद चारों तरफ प्रकाश छा गया । एक तख्त प्रकट हुआ, जिस पर आसन बिछ गया । एक प्रसाद का पात्र प्रकट हुआ, जिसमें एक चम्मच भी था । फिर महात्माओं की जमात प्रकट हो गई । तख्त पर महादेव जी साक्षात् विराजमान दिखे । सभी महात्माओं ने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया । महाराज जी ने भी उन्हें प्रणाम किया ।

अब शिव जी ने सबको प्रसाद बांटना प्रारम्भ कर दिया । सभी महात्मा पंक्ति में लग गए । जिसने महाराज जी के हाथ ऐंठ रखे थे, उसने दबाव देकर महाराज जी को भी पंक्ति में खड़ा कर दिया । जब उनका अवसर आया, तब शिव जी से उनके नेत्र मिले । शिव जी उन्हें प्रसाद देने लगे, तो महाराज जी ने कहा कि उन्होंने आज ही फलाहार किया है, अब पांच दिन तक कुछ नहीं खा सकते । दिव्य पुरुष के बाध्य करने पर उन्होंने प्रसाद ले लिया ।

दिव्य पुरुष ने कहा- तुमने कठिन प्रतिज्ञा कर ली है । शिव जी सावन में एक मास तक यहां रहते हैं । तुम भी एक मास तक यहां ठहरो, तो तुम्हारे प्रण का समाधान हो सकता है ।

यह कहते ही सारे दृश्य ओझल हो गए ।

अगली प्रातः एक वृद्ध महात्मा उनकी कुटिया में आए और बालाजी की महिमा बताकर उन्हें वहां जाने के लिए प्रेरित करने लगे । महाराज जी तो एक मास तक वहीं रुकना चाहते थे, परन्तु बार-बार उस महात्मा के कहने पर वे बालाजी के लिए प्रस्थान कर गए ।

इस लम्बी यात्रा में कभी-कभी तो आठ-दस दिन तक भोजन नहीं मिला, सिर्फ पानी पीकर चलते रहते । लंगोट भी फट गई थी, सो वस्त्रहीन ही चलते जा रहे थे । अब महाराज जी के मन में परमात्मा के दर्शन की इतनी तड़प उत्पन्न हो चुकी थी कि उसके बिना उनसे रहा नहीं जा रहा था । उन्होंने निद्रा का पूर्णतः त्याग कर दिया था । जब आंखों पर सूर्य की किरण पड़ती तो ही आंखें खुलती, अन्यथा ध्यान के उद्देश्य से बन्द ही रहतीं । उनका पेट पिचक कर कमर से मिल गया था और मुख एक घोंसले जैसा बन गया था । उनका वैराग्य इतना बढ़ गया कि एक स्थान पर आसन लगाकर उन्होंने अपने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया । तब एक महात्मा के समझाने पर वे पुनः आशा लेकर चल पड़े ।

तिरुपति बालाजी पहुंचकर महाराज जी मन्दिर नहीं गए और एक मठ के बाहर एक पेड़ के नीचे आसन लगाकर बैठ गए । मठाधीश ने उन्हें तपस्वी जानकर फलाहार की व्यवस्था कर दी । इस दिन से महाराज जी ने हर पांचवे दिन पांच फल खाने का नियम बना लिया ।

यहां से महाराज जी महालक्ष्मी मन्दिर व अन्य तीर्थ स्थानों पर विचरण करते हुए बढ़ते गए । निर्वस्त्र होने के कारण कई बार उन्हें अपमानित भी होना पड़ता था । यात्रा में महाराज जी कपड़े की थाली पर भोजन किया करते थे । अधिक सामान उन्हें बोझ की तरह लगता था । एक दिन एक लाला ने विनती करके उन्हें अपनी दुकान से सूती वस्त्र, कम्बल, आदि दे दिया ।

पक्षी तीर्थ, तुंगभद्रा नदी, परमेश्वर वन, पम्पा सरोवर, ऋषि मुख पर्वत, किष्किन्धा, आदि देखते हुए महाराज जी उस स्थान पर पहुंचे जहां एक पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था । कोई मनुष्य वहां पहुंच नहीं पाता था । महाराज जी बहुत कठिन चढ़ाई चढ़कर आश्रम तक पहुंच गए, परन्तु वहां किसी से भेंट न हो सकी । इस बात से उन्हें बहुत कष्ट हुआ कि जब एक ऋषि का दर्शन नहीं मिलता, तो परमात्मा का दर्शन कैसे होगा ?

वहां से चलकर महाराज जी रात्रि में एक हनुमान मठ में रुक गए । जब वे ध्यान में बैठे थे, तो पुनः दिव्य पुरुष ने उनकी बांह ऐंठी । तभी सामने तेज प्रकाश छा गया और एक आकृति प्रकट हुई ।

दिव्य पुरुष ने कहा- यह हनुमान जी हैं, इन्हें प्रणाम करो ।

महाराज जी ने खीझकर कहा- तैंतीस कोटि देवी-देवता हैं, किस-किस को प्रणाम करते रहें ।

दिव्य पुरुष ने समझाया- इन्हें धारण कर लो । तुम भयानक वनों में घूमते हो, यह सदा तुम्हारे काम आएंगे, तुम्हारी रक्षी करेंगे ।

कई बार मना करने पर जब दिव्य पुरुष नहीं माने, तो हारकर महाराज जी ने स्वीकृति दे दी । तभी हनुमान जी की आकृति वायु में विलीन होते हुए महाराज जी में समा गई । इस घटना के बाद महाराज जी को शरीर में थकान नहीं लगती थी । उनके मन से भय का बीज भी नष्ट हो गया ।

घर छोड़े महाराज जी को दो वर्ष बीत गए थे और उनकी आयु इक्कीस वर्ष हो गई थी । अनेक स्थानों पर घूमते हुए अन्ततः वे अपने गांव लौट आए । अगले छह वर्षों तक वे जूड़ में रहे, कभी-कभी ही जड़ौदा में अपने घर जाते थे । उन्होंने सत्य धर्म नाम की एक सभा बनाई, जिसमें हर आठवें दिन भजन, कीर्तन व सत्संग होता था । दिव्य पुरुष और हनुमान जी से उनकी बात होती रहती थी । वे उनके सभी संशयों को मिटा देते थे । धीरे-धीरे वे उनसे एकाकार हो गए ।

इतना सब होने पर भी महाराज जी के मन में एक टींस बनी रहती कि अब तक वे सद्गुरु और परमात्मा के दर्शन नहीं पा सके थे ।

सद्गुरु से मिलन

सन् 1921 में श्री राम रतन महाराज दूसरी बार सद्गुरु की खोज में गृह त्याग कर निकल पड़े । इस बार उन्होंने दृढ़ संकल्प कर लिया कि यदि परमात्मा नहीं मिले, तो वे यात्रा में ही प्राण त्याग देंगे, खाली हाथ वापस नहीं लौटेंगे ।

महाराज जी ने पिछली परिक्रमा के मार्ग का अनुसरण किया और चलते गए । हिमालय से जगन्नाथ पुरी होते हुए गुलबर्ग पहुंचे । वहां एक आश्रम के महंत ने सारा कार्यभार महाराज जी पर छोड़ दिया । वहां आने वाले सभी साधू-सन्तों की व्यवस्था महाराज जी करने लगे । साथ ही वे प्रतिदिन गीता का मनन, योग, आदि का भी अभ्यास करते, सिर्फ आधा घण्टा सोते थे । इस प्रकार ढाई वर्ष बीत गए ।

महाराज जी की रहनी और अच्छी व्यवस्था से प्रभावित होकर महंत ने महाराज जी के नाम से वसीयतनामा बनवा दिया । महाराज जी को जब इस बारे में पता चला, तो वे इस झंझट से छुटकारा पाने के लिए व्याकुल हो गए । जिस दिन रजिस्ट्री होनी थी, संयोगवश उस दिन छुट्टी हो गई । महाराज जी बहुत प्रसन्न हुए । बहुत मुश्किल से महंत जी से विदा लेकर, महाराज जी अपना कमण्डल लेकर वहां से प्रस्थान कर गए ।

पण्डरपुर, बम्बई, बेंट द्वारका, पंचवटी, आदि होते हुए सोनगीर पहुंचे । इन दिनों महाराज जी का ध्यान बहुत उच्च अवस्था पर पहुंच गया था । प्रतिदिन आठ घण्टे ध्यान में डूबे रहते । कभी-कभी तो ध्यान में हाथ-पैर दब जाते, नाड़ी मद्धम पड़ जाती और श्वास भी थम जाती । एक दिन राम मन्दिर में वे इसी अवस्था में पड़े थे । लोगों को लगा कि साधू मरा पड़ा है ।

पूरे गांव में शोर मच गया । भीड़ जमा हो गई । कोई वैद्य लेकर आया, तो कोई अग्नि संस्कार की तैयारी करने लगा । तभी परमहंस श्री नारायण दास आए । नाड़ी देखने के बाद वे समझ गए कि यह तो योगावस्था है । उन्होंने अपने घर से मंगवाकर कुछ खिलाया और गुलाब जल छिड़का, जिससे श्री राम रतन की चेतना लौट आई । श्री राम रतन का परिचय जानकर उन्होंने उन्हें सोमेश्वर के शिव मन्दिर में ठहरने को कहा और प्रतिदिन मिलने का वादा किया ।

श्री राम रतन सोमेश्वर के शिव मन्दिर चले गए और पीपल के पेड़ के नीचे आसन लगा लिया । आठ पहाड़ियों से घिरा वह स्थान बहुत सुन्दर था । प्रतिदिन प्रातः परमहंस श्री नारायण दास उनसे मिलने आते और साथ में फूलों से ढककर प्रसाद और पुष्पहार लाते । उनकी संगति से श्री राम रतन का योगाभ्यास कुछ कम हो गया, परन्तु एक नया आनन्द हृदय में आ गया ।

सद्गुरु महाराज के मुख से परमधाम और श्री राज श्यामा जी की चर्चा सुनकर श्री राम रतन उन पर पूरी तरह समर्पित हो गए । श्री राम रतन को ऐसा लगने लगा कि सद्गुरु महाराज का स्वरूप उनके हृदय में समा गया है । वे चार मास तक वहां रहे । उसके पश्चात् सद्गुरु महाराज के आदेश से श्री राम रतन बस्ती के निकट एक खेत में रहने लगे । सद्गुरु महाराज प्रतिदिन प्रातः आते ।

एक दिन श्री राम रतन ने सद्गुरु महाराज से विनती करी- आपने इतनी कृपा की है, तो एक कृपा और करो । मेरे हृदय में सदा के लिए आसन डालकर बैठ जाओ ।

सद्गुरु श्री नारायण दास ने उत्तर दिया- तुम चिन्ता क्यों करते हो ? मैं सदैव तुम्हारे हृदय में ही तो रहता हूं । कभी तुमसे अलग नहीं होता ।

उन्होंने सद्गुरु के चरण पकड़ लिए और पुनः निवेदन किया । तब सद्गुरु महाराज ने उन्हें सिद्धासन पर बैठने को कहा । इसके पश्चात् सद्गुरु महाराज की कृपा से श्री राम रतन को लगा कि जैसे वे अपने सद्गुरु की छवि को पी गए हैं । हृदय में कोई विचित्र शक्ति आ गई । अब उन्हें सभी मनुष्य कीट समान लगने लगे । उनकी अवस्था बदलने लगी ।

जहां श्री राम रतन कुटिया बनाकर रहते थे, वहां सत्संग करने के लिए लोग आने लगे । श्री राम रतन जो बात कहते वह सत्य हो जाती, उनकी कृपा से गृहस्थियों के संकट दूर होने लगे, तथा उनसे मिली विभूति से रोगी स्वस्थ होने लगे । लोग उन्हें "सीतारामी बाबा" कहकर बुलाते थे । उस प्रान्त में उनकी बहुत प्रसिद्धि हो गई, परन्तु लोगों के आने-जाने से श्री राम रतन के ध्यान में बहुत विघ्न पड़ता था ।

सद्गुरु महाराज उन्हें कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होने देते थे । उन्हें समय पर पका-पकाया भोजन मिल जाता था । दीपक सदैव जलता मिलता था । सद्गुरु की कृपा-छांव में वे निश्चिन्त होकर अधिकांश समय चितवन में मस्त रहते थे ।

एक दिन सद्गुरु महाराज की पुत्रवधु बीमार हो गई । श्री राम रतन ने सद्गुरु से आग्रह किया कि उसका कुछ उपचार करें, परन्तु सद्गुरु टाल गए । अगले कुछ दिनों में उसका स्वास्थ्य अधिक बिगड़ गया । श्री राम रतन हठ करके सद्गुरु को उनके घर ले गए । सद्गुरु श्री नारायण दास ने अपनी पुत्रवधु को देखकर कहा कि यह तो बिलकुल ठीक है, कुछ दिन में स्वस्थ हो जाएगी । यह कहकर वे चले गए । कुछ देर बाद ही उसका देहान्त हो गया । श्री राम रतन ने सद्गुरु को सूचित किया ।

सद्गुरु श्री नारायण दास बोले- इसे श्मशान ले चलो । वहीं इसे संजीवनी विद्या से जीवित कर देंगे ।

सद्गुरु महाराज के आदेशानुसार शव को श्मशान ले जाया गया और लकड़ियों पर रख दिया गया । अब सद्गुरु ने कहा कि अग्नि लगा दो । श्री राम रतन सहित सब लोग प्रतीक्षा करते रहे कि वह कब जीवित होगी, परन्तु कुछ नहीं हुआ । शव का दाह-संस्कार भी हो गया । सब लोग घर लौटने लगे और सद्गुरु महाराज भी "चिरंजीव रहो" कहते हुए घर लौट गए ।

इस घटना से श्री राम रतन अपने सद्गुरु महाराज से बहुत डर गए । उनकी ऐसी अवस्था देखकर सद्गुरु महाराज ने उन्हें कुछ दिनों के लिए अन्य स्थानों पर विचरण करने को कहा और श्री राम रतन ने वहां से प्रस्थान कर दिया ।

सोनगीर के बाहर अन्य स्थानों पर विचरण

सद्गुरु के आदेश से श्री राम रतन महाराज कुछ दिनों के लिए सोनगीर छोड़कर चल पड़े और निकट ही एक गुफा में तपस्या करने लगे । उसके पास एक सड़क थी, जहां से निकलने वाली कारों की रोशनी महाराज जी की आंखों में पड़ती थी और उनका ध्यान भंग हो जाता था । अतः महाराज जी कई बार सड़क पर गए और जन-जन को समझाया कि यहां से निकलते समय बत्ती बुझा लिया करो, परन्तु कोई नहीं माना ।

एक रात्रि महाराज जी ध्यान में लीन थे, जब एक कार की तेज रोशनी उनकी आंखों में पड़ी । उनके मुख से शब्द निकले "गुरु महाराज" । उसी समय वह गाड़ी बिगड़ गई और उसकी बत्ती बुझ गई । उसके पीछे दर्जनों गाड़ियां आती गईं और बिगड़ती गईं । सबमें वहीं समस्या थी । कुछ लोग जो प्रतिदिन वहां से गुजरते थे, समझ गए कि यह सब महात्मा जी की बात न मानने के कारण हुआ है ।

सभी गाड़ी वाले मिलकर उस टेकरी पर आए, जहां महाराज जी ध्यान कर रहे थे । सबने महाराज जी से क्षमा मांगी और सड़क पर बोर्ड लगवा दिया कि यहां से निकलते समय बत्ती बुझाना अनिवार्य है । उसके बाद वहां से निकलने वाली सभी गाड़ियां बत्ती बुझाकर निकलने लगीं ।

कुछ दिन वहां रहने के बाद, महाराज जी ने सतपुड़ा मालाओं से होते हुए कपिलेश्वर मन्दिर में आसन लगा लिया जो ताप्ती और पांजरा नदियों के संगम पर स्थित है । दोनों नदियां सूखी हुई थीं ।

महाराज जी धरती पर आसन लगाकर बैठते थे । उनके पास एक पिचकी सी लुटिया थी । दाढ़ी, मूंछ और सिर के बाल बढ़कर आपस में मिले हुए थे । मुख से जो कह देते, वही सत्य हो जाता । हृदय में सद्गुरु का वास था । उन्हे आठों प्रहर दर्शन होते रहते । किसी प्रकार की चिन्ता नहीं थी ।

चौदस को पांजरा की रेती में मेला लगता था । महाराज जी से मिलने अनेक लोग आने लगे । तब उन्होंने एक प्रतिष्ठित व्यक्ति से मेला रुकवाने को कहा, परन्तु वह नहीं माना । फिर उसी स्थान पर थानेदार का डेरा लग गया और महाराज जी को कुछ दूर आसन लगाना पड़ा । महाराज जी ने थानेदार और प्रबन्धकों को भी चेताया कि इस बार मेला मत लगने दो, परन्तु कोई भी नहीं माना ।

वहां अनेक दुकानें सज गयीं और हजारों लोग उमड़ पड़े । चौदस की रात्रि में मेला पूरी तरह भर गया । तभी अर्धरात्रि के पश्चात् शंख जैसी ध्वनि हुई और पानी की बाढ़ आ गई । दो मिनट में सब कुछ बह गया । उस बाढ़ में हजारों मनुष्य, पशु और लाखों की सम्पत्ति नष्ट हो गई ।

यह सब देखकर महाराज जी का हृदय व्यथित हो गया । वे दारोगा के पास गए और उसको बुरी तरह फटकारा । दारोगा चुपचाप हाथ जोड़कर सिर नीचा करके खड़ा रहा । इस घटना के बाद महाराज जी ने तुरन्त वह स्थान त्याग दिया और घने वन में प्रवेेश कर गए ।

महाराज जी परमधाम के ध्यान में इतना मग्न रहते थे कि शरीर का कुछ ध्यान ही नहीं रहता था । जिस तरफ मार्ग दिख जाता, वे उसी दिशा में लक्ष्यहीन चलते जाते । कुछ दिन चलने के बाद एक गांव आया । महाराज जी ने उसी बस्ती में एक पेड़ के नीचे आसन लगा लिया । गांव वालों ने महाराज जी से भोजन पूछा, परन्तु महाराज जी ने मना कर दिया क्योंकि वे रात्रि में भोजन नहीं करते थे ।

उस गांव में सबके घर पन्द्रह-सोलह फुट ऊंचे झाड़ों से बने थे । गांव वालों ने महाराज जी से विनती करी कि वे रात्रि में किसी घर में विश्राम करें, क्योंकि हर रात्रि वहां एक शेर आता था, जो किसी पशु या मनुष्य को उठा ले जाता था । महाराज जी ने मना कर दिया क्योंकि उनके मन में किसी का भय नहीं था ।

रात्रि में तीन बार शेर आया । वह महाराज जी के सामने खड़ा रहता, फिर वापस लौट जाता । महाराज जी की उपस्थिति के कारण वह किसी पशु का शिकार नहीं कर सका । अगली प्रातः गांव वालों ने महाराज जी का धन्यवाद किया और उनसे स्थायी रूप से वहीं रहने की विनती की, परन्तु महाराज जी अपनी स्वच्छन्दता को कैसे छोड़ सकते थे । उसी दिन वे उस गांव से प्रस्थान कर गए ।

महाराज जी सारी रात ध्यान करते थे और दिन में विचरण करते थे । कुछ दिनों तक वनों में घूमने के बाद महाराज जी पुनः एक गांव में पहुंचे और वहां एक पेड़ के नीचे आसन लगा लिया । उस गांव में किसी के रोने की ध्वनि आ रही थी । गांव वालों ने बताया कि एक विधवा के युवा पुत्र को सांप ने काट लिया है, जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई है । तभी एक व्यक्ति महाराज जी के पीछे पड़ गया और उन्हें हठ करके उस स्थान पर ले गया ।

महाराज जी को देखकर वह स्त्री उनके चरण पकड़कर रोने लगी । महाराज जी ने अपने पैर छुड़ाने का बहुत प्रयास किया, परन्तु सफल न हो सके ।

स्त्री बोली- महात्मा जी ! जब तक आप मेरे पुत्र को जीवित नहीं करते, मैं आपके पैर नहीं छोड़ूंगी । या तो मेरे पुत्र को जीवित करो या मुझे भी अर्थी पर भेजो ।

महाराज जी ने उसे बहुत समझाया, परन्तु वह नहीं मानी ।

अन्त में विवश होकर महाराज जी ने कहा- श्री सद्गुरु महाराज कृपा करेंगे । इसे सूर्योदय तक नहीं उठाना, न ही जल में प्रवाहित करना । गुरु महाराज कृपा करेंगे, उनके चरणों में श्रद्धा रखना ।

यह कहकर महाराज जी उसी क्षण उस गांव से प्रस्थान कर गए और सारी रात चलते रहे ।

अगली प्रातः चार बजे गांव वाले अन्तिम संस्कार के लिए उस युवक की अर्थी सजाने लगे, तो उस स्त्री ने किसी को अपने पुत्र को हाथ नहीं लगाने दिया । जब सूर्योदय हुआ, तब वह लड़का उठकर खड़ा हो गया और उसने पीने के लिए जल मांगा । एक मुर्दे को जीवित हुआ देखकर लोग अचम्भित रह गए और सब तरफ महाराज जी को ढूंढने लगे, परन्तु वे तो बहुत पहले ही उस स्थान से जा चुके थे ।

महाराज जी कई दिनों तक वनों में विचरण करते रहे । जब से सद्गुरु की छवि उनके हृदय में बसी थी, उनके मन का भय समाप्त हो गया था । उन्हें सदैव ऐसा लगता था कि सद्गुरु उनके साथ हैं । सभी मनुष्य छोटे और दुर्बल लगते थे ।

इस प्रकार चलते-चलते महाराज जी शीरपुर नामक गांव आए । वहां उन्हें ढूंढते हुए उनके गुरु भाई पहुंच गए और बताया कि सद्गुरु ने उन्हें बुलाया है । यह सुनकर दोनों ने तत्काल सोनगीर के लिए प्रस्थान किया ।

श्री राज का दर्शन

सोनगीर में सद्गुरु श्री नारायण दास के चरणों में पुनः पहुंचकर श्री राम रतन को बहुत प्रसन्नता हुई । उन्होंने सद्गुरु महाराज को साष्टांग प्रणाम किया और कई बार उनके चरणों को चूमा । सद्गुरु गम्भीर मुद्रा में थे । उन्होंने श्री राम रतन को सामने बैठने को कहा ।

तब सद्गुरु श्री नारायण दास बोले- तू इतना बड़ा हो गया है कि अब मुर्दों को जिन्दा करने लगा है । प्रकृति के कार्य में दखल देने लगा है ।

यह सुनकर श्री राम रतन सन्न रह गए और चुपचाप सिर नीचा करके बैठे रहे ।

सद्गुरु श्री नारायण दास पुनः बोले- जिसको तूने रोक दिया है, अब उसका खाना पूरा कर । बता अब उसके स्थान पर कौन जाएगा ? तुमने इसे खेल समझ रखा है कि जिसको चाहा जिन्दा कर दिया । बताओ उसकी जगह कौन जाएगा ?

श्री राम रतन ने उत्तर दिया- मैं ! अपने किए की भरपाई मैं करूंगा और उसके स्थान पर मैं जाऊंगा ।

तब सद्गुरु ने कहा- तो फिर चलने की तैयारी कर लो ।

श्री राम रतन ने उस स्थान को साफ करके स्नान किया । फिर सद्गुरु महाराज के चरणों को ध्यान में लेकर वहीं पर कुशा बिछाकर लेट गए ।

सद्गुरु महाराज बोले- यह लो कफन ।

श्री राम रतन ने सद्गुरु द्वारा दी गई चादर ओढ़ ली और आंखें बन्द करके सद्गुरु का ध्यान करने लगे । सिरहाने पर सद्गुरु महाराज का आसन था और उनके चरणों में श्री राम रतन लेटे हुए थे । कुछ देर के बाद उनकी चेतना चली गई और बाहर का ज्ञान समाप्त हो गया । कुछ समय तक वे इसी अवस्था में लेटे रहे ।

जब श्री राम रतन की आंख खुली, तब उन्हें एक आवाज सुनाई दी- रतन ! अब उठो ।

यह सुनकर जब श्री राम रतन उठे, तो देखा सद्गुरु महाराज के आसन पर साक्षात् श्री राज विराजमान हैं । श्री राज उन्हे देखकर बहुत मुस्करा रहे थे ।

श्री राज जी बोले- रतन बाई ! झण्डूदत्त के इस चोले में तुम्हारी आत्मा ने प्रवेश किया है । अब सावधान होकर बैठ जाओ । मैं तुम्हारे तन में उतरता हूं ।

श्री राम रतन आसन लगाकर बैठ गए । तभी उन्हें लगा जैसे करोड़ों सूर्यों का प्रकाश उनके अन्दर समा गया है । उन्हें भूत और भविष्य का सारा ज्ञान हो गया । श्री राज की सारी लीला समझ आ गई । उनके आनन्द की कोई सीमा नहीं थी ।

अगले दिन सद्गुरु श्री नारायण दास के पुत्र का देहान्त हो गया । उसके दाह संस्कार के तीसरे दिन सद्गुरु महाराज ने श्री राम रतन को धोती, अंगरखा, पगड़ी, चादर, कमण्डल, आदि प्रदान किया । श्री राम रतन ने पूरी श्रद्धा से उन वस्त्रों को धारण किया । यह देखकर सद्गुरु महाराज बहुत पुलकित हुए ।

इसके साथ उन्होंने श्री राम रतन को आसन पर बैठाकर तारतम मन्त्र प्रदान किया । सब निधियां देने के बाद सद्गुरु महाराज बहुत प्रफुल्लित हुए । उन्हें देखकर लगता था जैसे उन्हें अपार हर्ष हुआ है । श्री राम रतन को ऐसा लगा जैसे उनमें और सद्गुरु महाराज में कोई अन्तर नहीं रहा, दोनों एक हो गए हैं । इस प्रकार श्री राम रतन को सद्गुरु महाराज से सारी आध्यात्मिक सम्पदा प्राप्त हो गई ।

इस घटना के बाद सद्गुरु महाराज ने कहा- अब तुम्हारी जहां इच्छा हो, वहां जाओ ।

सद्गुरु महाराज का आदेश मिलने के बाद श्री राम रतन ने वहां से प्रस्थान किया ।

भ्रमण करते हुए जन्मभूमि पहुंचे

अब परमहंस श्री राम रतन महाराज की अवस्था बहुत विचित्र हो गई थी । वह पैदल चलते जाते थे, परन्तु उन्हें स्थान आदि का बोध नहीं होता था । उनकी सुरता सदैव परमधाम के पच्चीस पक्षों में विचरण करती रहती थी तथा उन्हे बाहरी संसार का ज्ञान कम ही रहता था ।

सोनगीर से चलकर महाराज जी पांच महीने खुड़खुड़ेश्वर मन्दिर में रहे । फिर कमरखेड़ी (उज्जैन) में चतुर्मास बिताए । वहां के लोग श्रद्धापूर्वक सत्संग व दर्शन करने आते थे तथा महाराज जी को घर ले जाकर आदर से भोजन भी करवाते थे ।

उस गांव में दो गुट बन गए थे, जिनमें बहुत शत्रुता थी, एक-दूसरे का मुख भी नहीं देखते थे । महाराज जी ने कह दिया कि वे भोजन तभी करेंगे, जब पूरा गांव एक ही चूल्हे का बना भोजन ग्रहण करेगा । महाराज जी के कहने पर सभी लोगों ने वैमनस्य भूलकर एक साथ भोजन किया और गुटबाजी छोड़कर सब एक हो गए । इस प्रकार अनेक ग्रामों में महाराज जी का बहुत सत्कार हुआ ।

यहां से विदा लेकर महाराज जी अपने साथी महात्मा रामानन्द के साथ कलकत्ता के लिए पैदल निकल पड़े । मार्ग में साईं खेड़ी में तीन सौ वर्ष के एक महात्मा केशवानन्द को देखा । मिर्जापुर, बैजनाथ, ओंकारेश्वर, दरभंगा, आदि स्थानों के आश्रम, मन्दिर व राजमहल देखते हुए कलकत्ता पहुंच गए ।

कलकत्ता में महादेव तालाब के किनारे महाराज जी ने अपना आसन लगा लिया । महाराज जी के सत्संग में अनेक लोग आने लगे और कई साधु-महात्मा भी उनसे जुड़ गए । महाराज जी के मुख से श्री कृष्ण की त्रिधा लीला का ज्ञान सुनकर सब अचम्भित रह गए ।

कलकत्ता में सेठ लक्ष्मी नारायण ने महाराज जी व उनके साथी साधु मण्डली का पूरा खर्चा उठा लिया । मांगीलाल नाम का मारवाड़ी तो महाराज जी पर पूर्ण रूप से समर्पित हो गया । मांगीलाल को देखकर अनेक मारवाड़ी लोग महाराज जी के सत्संग में आने लगे ।

इस बात से वहां का प्रसिद्ध सिद्धनाथ बाबा क्रोधित हो गया क्योंकि लोगों ने उसके यहां जाना बन्द कर दिया था । पहले उसने मांगीलाल को धमकाया, फिर सीधा महाराज जी से झगड़ा करने आ गया । महाराज जी से शास्त्रार्थ करने के उद्देश्य से उसने आते ही प्रश्नों की बौछार कर दी । महाराज जी ने भी उसके प्रश्नों का खरा-खरा उत्तर दे दिया । इससे उसका क्रोध और भड़क गया । वह तिलमिलाकर बोला कि होशियार रहना, देखूंगा कि तुझमें कितना पानी है । महाराज जी ने उत्तर दिया कि अभी देख लो । वह क्रोध से पांव पटकता हुआ लौट गया ।

उसी रात्रि सिद्धनाथ बाबा ने अपनी सिद्धि के बल से मांगीलाल को बहुत डराया । मांगीलाल को अपने घर के द्वार पर एक सरकटा भैंसा फंसा हुआ दिखा । वह सारी रात भय से कांपता रहा । प्रातः होते ही वह भागकर महाराज जी के पास आया ।

महाराज जी ने उसे दिलासा देते हुए कहा- यह लोग छोटी-छोटी साधनाओं से लोगों को भय दिखलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं, परन्तु किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते । यह साधनाएं बिलकुल काल्पनिक और निस्सार होती हैं ।

मांगीलाल का मन शान्त हो गया । फिर वह सिद्धनाथ बाबा के पास गया और उसे जताया कि उसकी इन सिद्धियों से वह डरने वाला नहीं है । उसका मन पूरी तरह भय मुक्त हो गया ।

कुछ दिनों बाद महाराज जी ने अपनी मण्डली के साथ गंगा सागर का मेला देखा । मेले में बहुत सत्संग और प्रश्नोत्तर के प्रसंग छिड़े । सेठ लक्ष्मी नारायण ने वहां भण्डारा खोल दिया और सभी साधु-सन्तों की बहुत सेवा करी । उसे महाराज जी पर अटूट श्रद्धा हो गई । तीन दिन तक वहां रहने के बाद महाराज जी वापस कलकत्ता आ गए ।

कलकत्ता का एक गृहस्थ ठाकुर गृह त्याग कर सदा महाराज जी की सेवा में रहना चाहता था, परन्तु उसकी पत्नी को यह स्वीकार नहीं था । महाराज जी ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक घर से स्वीकृति नहीं मिलेगी, तब तक कोई उनके साथ नहीं चल सकता ।

कुछ दिन कलकत्ता में रहने के बाद महाराज जी ने वहां से प्रस्थान करने का निर्णय लिया । यह सुनकर सभी सुन्दरसाथ भावुक हो गए । जब चलने का समय आया, तो सब की आंखों से आंसुओं की जलधारा बह रही थी और वे महाराज जी पर फूलों की वर्षा कर रहे थे ।

महाराज जी कलकत्ता से ट्रेन पर चढ़कर मुजफ्फरपुर गए । वहां से पैदल यात्रा करते हुए नेपाल पहुंच गए, जहां पशुपति का मेला लगने वाला था । पशुपति के मेले में साधुओं की इतनी भीड़ थी कि खड़े रहना भी मुश्किल था । मेले के दिन नेपाल के राजा और रानी ने सभी साधु-सन्तों को दान दिया । महाराज जी की भी उनसे भेंट हुई । पशुपति मेला देखकर महाराज जी वापस भारत की सीमा में प्रवेश कर गए ।

इस लम्बी यात्रा में छह वर्ष बीत चुके थे । लखनऊ और मेरठ होते हुए महाराज जी सन् 1927 में अपने गांव जड़ौदा पहुंचे । गांव में किसी को यह ज्ञान नहीं था कि वे जीवित भी हैं या नहीं । उनकी पत्नी सधवा होते हुए भी विधवा के समान अपमानजनक जीवन जी रही थीं । उनकी पुत्री विवाह योग्य हो गई थी । घर में अत्यन्त दरिद्रता थी ।

महाराज जी की पत्नी जूड़ में उनसे मिलने आई । कुछ देर भेंट करने के बाद उसने पुत्री के विवाह के खर्चे की बात छेड़ी । महाराज जी तो अपने पास सांसारिक धन रखते नहीं थे, तो देते कहां से ।

महाराज जी ने उत्तर दिया- जिसका कार्य है, वही करेगा । तू बस घर जाकर सद्गुरु का स्मरण कर ।

यह सुनकर उनकी पत्नी चिन्तित हो गई । उसने भरतसिंह पण्डित को पुनः महाराज जी से बात करने के लिए भेजा ।

महाराज जी ने पुनः वही उत्तर दिया- शादी होनी है, तो अवश्य होगी । सब सद्गुरु महाराज करेंगे ।

महाराज जी से आश्वासन भरे वचन सुनकर घर वालों ने विवाह की तैयारी प्रारम्भ कर दी । खर्चे का हिसाब लिखा जाने लगा, परन्तु बिना धन के कार्य नहीं होता ।

भरतसिंह दोबारा महाराज जी के पास आया और सद्गुरु से धन मांगने का आग्रह करने लगा ।

महाराज जी ने कहा- मैं अपने गुरु महाराज से कभी ऐसी मांग नहीं कर सकता । तुम चिन्ता मत करो, सब हो जाएगा ।

यह सब सुनकर भरतसिंह रोने लगा । फिर उसने आग्रह किया कि महाराज जी अपने सद्गुरु को एक पत्र लिख दें । महाराज जी ने कहा कि वे पत्र नहीं लिखेंगे, सिर्फ हस्ताक्षर करेंगे । भरतसिंह ने सद्गुरु श्री नारायण दास को बहुत प्रेम से विस्तृत पत्र लिखा और उन्हें सभी सुन्दरसाथ सहित निमन्त्रित भी किया । महाराज जी ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए । इसके पश्चात् महाराज जी ने एक बाल्टी पानी मंगवाया और पत्र को उसमें डुबोकर उसके अक्षर धोने को कहा । महाराज जी बोले कि पत्र चला गया । भरतसिंह ने आदेश का पालन तो किया, परन्तु उसे कुछ समझ नहीं आया ।

तीसरे दिन महाराज जी के लिए डाक से एक पत्र और सोलह रुपए का मनीआर्डर आया । महाराज जी ने भरतसिंह को पत्र सौंप दिया । उसमें लिखा था कि आपका पत्र मिला । साथ में एक-एक बात का यथावत् उत्तर दिया गया था । यह भी लिखा था कि परसों तक सेठ लक्ष्मी चन्द पहुंच जाएंगे और विवाह का सारा खर्च सम्भाल लेंगे । इसके पश्चात् महाराज जी ने भरतसिंह को सोलह रुपए देकर कहा कि इसे सद्गुरु का आशीर्वाद समझकर सम्भाल कर रखना ।

अगले ही दिन कलकत्ता से सेठ लक्ष्मी चन्द आ गए । उनके सहयोग से बहुत धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ । अन्तिम दिन का भोजन सद्गुरु जी के नाम से किया गया । सेठ जी तो गांव के एक-एक बालक के पैर छूते फिर रहे थे । उन्हें लगता था जैसे यह ब्रज के ग्वाल बाल हैं । विवाह के बाद इतनी मिठाइयां बच गयीं कि जूड़ में पांच गांवों का विशाल भण्डारा किया गया, जिसमें सबने कथा और कीर्तन का लाभ लिया ।

जूड़ ग्राम में आसन लगाया

जूड़ गांव के कोने में एक टूटा-फूटा मन्दिर था । उसके पास ही परमहंस श्री राम रतन महाराज ने अपना आसन लगा लिया । वहीं पर पांच गांवों से लोग आने लगे और सदैव सत्संग चलता रहता । एक बार जो आ जाता, उसका घर जाने का मन ही नहीं करता था । कुछ लोग तो कई-कई दिन तक वहीं बैठे रहते ।

महाराज जी को तो निद्रा आती नहीं थी, परन्तु उनकी नकल करके वे लोग भी चौबीस घण्टे बैठे रहते । कुछ लोग खड़े-खड़े सोते मिलते, कुछ बैठे-बैठे सो जाते, कुछ खेत में जाकर सो जाते । महाराज जी उनकी समस्या समझ गए । इसलिए वे जानबूझकर रात्रि में आंखें मींच लेते, जिससे कि वे सभी विधिवत् घर जाकर शयन कर लें ।

महाराज जी प्रतिदिन पांचों गांवों का एक चक्कर लगाकर वापस अपने आसन पर आ जाते थे । बाढ़ी, भरतसिंह और मामराज सिंह उन पर अटूट श्रद्धा रखते थे, इसलिए उनके घर अवश्य जाते थे । शेरपुर का बारू भगत उनसे बहुत वाद-विवाद करता था ।

एक दिन बारू भगत बोला- महाराज जी ! कल आप मेरे घर पर भोजन करना, मेरी मां की तेरहवीं है ।

महाराज जी ने उत्तर दिया- आपने कहा, समझो हमने भोजन कर लिया । हम मृत्यु भोज नहीं खाते । क्षमा करना ।

बारू बोला- कैसे नहीं जाओगे ? मैं तुम्हें अपने घर ले जाकर ही छोड़ूंगा । तुम्हारा प्रण तुड़वाकर रहूंगा ।

यह कहकर बारू चला गया । अगले दिन बारू सिंह को आता देखकर महाराज जी उसके सामने से निकल गए, परन्तु उसे नहीं दिखे । पहले महाराज जी भरतसिंह के घर गए । बारू भागकर वहां पहुंचा । उसे आया देखकर महाराज जी उसके सामने से बाढ़ी के घर की तरफ चल पड़े, परन्तु उसे नहीं दिखे । बारू पीछे-पीछे भागता हुआ बाढ़ी के घर पहुंचा । उसे आता देखकर महाराज जी पुनः मामराज सिंह के घर की तरफ निकल पड़े । बाढ़ी ने बारू को समझाया कि वे सामने जा रहे हैं, परन्तु बारू को कुछ नहीं दिखा । इसी प्रकार मामराज सिंह के घर भी हुआ ।

इसके पश्चात् महाराज जी शेरपुर में बारू के घर पर कुछ देर रुके, फिर वहां से जैपुर होते हुए जूड़ आ गए । जब बारू घर पहुंचा, तो उसके घरवालों ने कहा कि महाराज जी उसकी प्रतीक्षा कर-कर के अभी निकले हैं । बारू भागता हुआ जूड़ पहुंचा, तो उसको महाराज जी आसन पर बैठे दिखे । तब बारू ने महाराज जी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी । इस प्रकार की अनेक लीलाएं वहां होती रहती थीं ।

महाराज जी ने अपने भक्तों से कहकर जूड़ के टूटे-फूटे मन्दिर का जीर्णोद्धार करवा दिया । उस मन्दिर की देख-रेख पुजारी करने लगा । महाराज जी के आसन के पास भक्तों की भीड़ जमा रहती थी । यह देखकर पुजारी को महाराज जी से ईर्ष्या होती थी । वह गांव के लोगों से हमेशा महाराज जी की निन्दा करता रहता ।

पुजारी सदैव एक अवसर की तलाश में रहता था कि किसी प्रकार महाराज जी को यहां से भगा दिया जाए । एक बार उसने देखा कि महाराज जी की बातों को सुनकर गांव की एक महिला भावुक होकर रोने लगी । पुजारी ने इस बात का लाभ उठाकर पूरे गांव में महाराज जी के चरित्र को लेकर झूठी अफवाह फैला दी । पुजारी की बातों में आकर बहुत लोगों ने महाराज जी के पास जाना भी छोड़ दिया । बात इतनी बढ़ गई कि इस विषय का फैसला करने के लिए पंचायत बैठाई गई ।

महाराज जी अभी तक यह भी नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर किस बात के लिए उन्हें पंचायत में बुलाया गया है । मामराज सिंह व अन्य भक्तों ने उन्हें सब कुछ समझाया और परामर्श दिया कि वे पंचायत में न जाएं क्योंकि वहां उनका अपमान करने की योजना बनाई गई है । महाराज जी ने इस बात को नकार दिया और कहा कि जब उनका कोई दोष नहीं है, तो वे पंचायत में जाने से क्यों डरें ।

पांच गांवों की पंचायत बैठी । महाराज जी भी समय से पहुंच गए । पन्द्रह मिनट तक सन्नाटा छाया रहा । किसी में महाराज जी के खिलाफ बोलने का साहस नहीं हुआ । पंचों के पूछने पर गांव की अन्य समस्याओं पर चर्चा होने लगी । उसके बाद पंचों ने पूछा कि कोई अन्य बात करनी है तो अभी बताएं । पुनः कुछ देर तक सन्नाटा छा गया । कोई एक शब्द नहीं बोला । फिर पंचायत उठ गई ।

श्री राज ने लाज रख ली । इसके बाद महाराज जी का मन उस स्थान से उचट गया और वे अपना आसन उठाकर हरिद्वार चले गए । कुछ दिन वहां रहकर वे सहारनपुर में अपने छोटे भाई बुद्धिदास के यहां रुके । उसके पश्चात् उन्होंने शेरपुर ग्राम में अपना आसन जमाया ।

शेरपुर में निजानन्द आश्रम की स्थापना

शेरपुर में परमहंस श्री राम रतन महाराज एक बाग में गए । उसके पास एक कूप भी था । वहां चारों तरफ पशु-पक्षियों के पिंजर, सूखे झाड़, सांपों की बंबियां थीं । ऐसे स्थान पर कोई भूत या साधु ही रह सकता था । महाराज जी ने अपने सद्गुरु का नाम लेकर वहां अपना आसन जमा दिया । जैसे ही महाराज जी ने वहां आसन लगाया, तेज आंधी चलने लगी, मेघ उमड़ आए और तीव्र वर्षा होने लगी ।

ग्रामीणों ने महाराज जी से विनती करी कि वे वर्षा में न भीगें और गांव में आ जाएं, परन्तु महाराज जी ने एक बार जहां आसन लगा दिया फिर वहां से हटते नहीं थे । कुछ दिनों में ग्राम वासियों ने उस स्थान को साफ करके महाराज जी के लिए एक कुटिया बना दी, जिसमें धूप व वर्षा से सुरक्षा हो सके ।

महाराज जी के बैठते ही वहां सत्संग होने लगा । अनेक गांवों से लोग आने लगे । यहां जूड़ से भी अधिक संख्या होने लगी । सदा आध्यात्मिक विषय पर संवाद चलता रहता था । श्री कृष्ण की भांति महाराज जी के पास भी एक मुरली थी । कभी-कभी अर्धरात्रि को जब वे मुरली बजाते थे, तो पांचों गांवों के भक्त उनके प्रेम में खिंचे चले आते थे । वहां ब्रज जैसी मनोहर लीलाएं होने लगीं ।

महाराज जी अपनी वाणी से रस बरसाते रहते, परन्तु सभी अपने अंकुर के अनुसार ही उसे ग्रहण कर पाते थे । कोई उनकी प्रभा, कोई चमत्कार, तो कोई उनकी बोली के आगे झुकता था ।

किशनपुर से गंगाराम नाम का व्यक्ति आया और महाराज जी से सेवा मांगी । उसकी श्रद्धा को देखते हुए महाराज जी ने उसे मन्दिर बनाने का कार्य दिया । वहीं पर एक झोंपड़ी के रूप में श्री राज का मन्दिर बनाया गया । महाराज जी स्वयं सोनगीर से श्री कुलजम सरूप को अपने सिर पर रखकर पैदल चलते हुए शेरपुर लाए । मन्दिर में वाणी और सद्गुरु के चित्र को पधराया गया और प्रतिदिन आरती होने लगी । गंगाराम ने पुजारी की भूमिका में मन्दिर की सेवा सम्भाल ली ।

विशम्बर सिंह और वारू सिंह दोनों मित्र थे, जो श्री राज की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे । गंगाराम और इन दोनों ने अन्य लोगों की सहायता से मन्दिर के लिए एक पक्का कमरा बना डाला और श्री राज की सेवा वहां पधरा दी गई । अब गांव के लोग नियमित रूप से मन्दिर में आकर कीर्तन करने लगे । बाद में यही वारू सिंह पूर्ण रूप से समर्पित हो गए और युगल दास के नाम से विख्यात हुए ।

एक दिन साधु-सन्तों की एक जमात आश्रम में आई । जब उन्हें पता चला कि वहां भण्डारा नहीं चलता, तो उन्होंने महाराज जी से आग्रह किया कि यदि उनकी आज्ञा हो तो वे लोग भण्डारा शुरु करना चाहते हैं । महाराज जी ने सहर्ष स्वीकृति दे दी । उस दिन के बाद से शेरपुर के निजानन्द आश्रम में सबके सहयोग से अखण्ड भण्डारा चलने लगा ।

जब सुन्दरसाथ भोजन कर लेते थे, तो महाराज जी छिप कर झूठे पतलों से कुछ दाने ग्रहण कर लेते थे । उनकी भावना थी कि यह ब्रह्मसृष्टियों का प्रसाद है ।

एक बार महाराज जी पंजाब (पाकिस्तान) की यात्रा पर गए । वहां उन्होंने सुन्दरसाथ को बहुत समझाया कि यह स्थान त्याग दो, कोई अनहोनी होने वाली है, परन्तु उनकी बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया । कुछ समय बाद सन् 1947 में भारत का बंटवारा हो गया और पंजाब के सुन्दरसाथ भयंकर कष्ट झेलते हुए पैदल चलकर खाली हाथ भारत आए । उस समय भी शेरपुर के आश्रम में महाराज जी ने अधिक से अधिक सुन्दरसाथ के रहने और भोजन की व्यवस्था करी । उन्होंने अनेक कन्याओं को पुत्री मानकर उनका विवाह करवाया और भी हर तरह से सहयोग किया ।

सहारनपुर की एक कन्या की पीठ कुबड़ी थी । एक दिन जब वह महाराज जी को प्रणाम करने लगी, तो महाराज जी ने उसकी पीठ पर थपकी देकर हंसते हुए कहा कि सीधी हो जा । उस लड़की का कुबड़ापन समाप्त हो गया । यह बिलकुल वैसे ही है, जैसे श्री कृष्ण ने कुब्जा का कुबड़ापन ठीक किया था तथा श्री प्राणनाथ ने ललिता को सर्वांग सुन्दरी बना दिया था ।

जब श्री जगदीश चन्द्र शेरपुर आए, तो महाराज जी से बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने देखा कि महाराज जी सुन्दरसाथ के प्रति कितना प्रेम रखते हैं । जगदीश जी दिन-रात फावड़ा लेकर आश्रम में सेवा करने लगे । उनकी सच्ची लगन व सेवा देखकर महाराज जी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे । वे प्रेम से उन्हें अपना "लोहे का घोड़ा" बुलाते थे ।

महाराज जी का नियम था कि वे हर तीन मास में एक बार पन्ना में श्री प्राणनाथ मन्दिर का दर्शन करने अवश्य जाते थे । वहां हर वर्ष शरद पूर्णिमा पर मेला लगता है । उसके अतिरिक्त साल भर सुन्दरसाथ का आना लगा रहता था, परन्तु भोजन की कोई व्यवस्था नहीं थी । तब महाराज जी के प्रयास से सन् 1956 से वहां भी सुन्दरसाथ के लिए भण्डारा शुरु हो गया ।

एक बार बनारसो बहन महाराज जी से कहने लगी कि आप सुन्दरसाथ को परमधाम का दर्शन क्यों नहीं करवाते ? महाराज जी ने उत्तर दिया कि सभी को माया की चाहना है, कोई परमधाम को नहीं चाहता । बनारसो बहन के हठ करने पर यह घोषणा कर दी गई कि जिसको भी कुछ चाहिए महाराज जी से मांग सकता है । सब सुन्दरसाथ पंक्ति में लग गए । कोई पुत्र मांगता, कोई धन मांगता, कोई पद मांगता, कोई रोग से मुक्ति । किसी ने भी श्री राज या परमधाम को नहीं मांगा ।

अन्त में महाराज जी ने श्री जगदीश चन्द्र से कहा कि वे भी कुछ मांग लें । पहले तो वे मना करते रहे, परन्तु बाद में महाराज जी के चरणों में अपनी झोली फैलाकर उन्होंने मांगा कि मुझे अपने चरण कमल दे दीजिए । यह सुनकर महाराज जी सोच में पड़ गए । बाद में महाराज जी सन् 1962 में उन्हें कश्मीर ले गए और श्री राज का दर्शन करवाया ।

निजानन्द आश्रम में सुन्दरसाथ के रहने के लिए कुछ कमरे भी बन गए । सुन्दरसाथ को तारतम देने के लिए महाराज जी ने एक अलग कक्ष बनवाया, जिसका नाम "तारतम भवन" रखा । महाराज जी को "परमहंसों में परमहंस" ऐसे ही नहीं कहते । उनकी कृपा से अनेक सुन्दरसाथ को श्री राज का दर्शन प्राप्त हुआ । उनकी छत्रछाया में श्री जगदीश चन्द्र, श्री चमेल सिंह, आदि कई परमहंस हुए ।

महाराज जी की कृपा से हरि कृष्ण लाल भगत केन्द्र सरकार में मन्त्री बन गए । सन् 1964 में उनके मॉडल टाऊन वाले घर में ही महाराज जी समाधिस्थ हो गए । बाद में उन्हें उसी अवस्था में शेरपुर आश्रम ले जाया गया, जहां तारतम भवन के बगल में उनकी स्थायी समाधि बनाई गई । हर वर्ष मई में शेरपुर में मेला लगता है, जिसमें पूरे देश से हजारों सुन्दरसाथ भाग लेते हैं ।

Share on WhatsApp