परमहंस साधू बाबा | Sadhu Baba
साधू बाबा का जन्म सन् 1790 में तिवनी ग्राम (रीवा) में हुआ था । उनके पिता का नाम भूलसाहि और माता का नाम रोहिणी था । भूलसाहि जी के चार पुत्र थे, जिसमें साधू बाबा तीसरे थे । बचपन में उनका नाम सरनाम सिंह रखा गया था ।
आठ वर्ष की आयु में साधू बाबा का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ और विद्याध्ययन प्रारम्भ किया, परन्तु साधन के अभाव में अधिक न पढ़ सके । मन में भक्ति के संस्कार थे और आचार-विचार अत्यन्त शुद्ध थे । वे भगवान राम के अनन्य भक्त थे ।
भाभी कमलेश्वरी से विवाद
भैयां ग्राम के मनबोध मिश्र की बहन कमलेश्वरी देवी का विवाह सन् 1806 में साधू बाबा के बड़े भाई से हुआ । कमलेश्वरी परमहंस गोपाल मणि की शिष्या थी और अपने सद्गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा रखती थी । विवाह के समय उसने परमहंस महाराज से प्रार्थना करी कि मुझे भूलना नहीं । तब महाराज जी ने गृहस्थ जीवन के अनुसार शिक्षा दी कि प्रतिदिन श्री राज को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करके भोजन करना तथा नियमित युगल स्वरूप का ध्यानादि करना ।
कमलेश्वरी अपने ससुराल में सद्गुरु की आज्ञानुसार धर्म-नियम का पालन करते हुए रहने लगी, परन्तु उसकी दिनचर्या घर वालों को नहीं भाती थी । घर के लोग श्री राज को भोग लगाने के उसके नियम को छुड़ाने के लिए उस पर बहुत दबाव डालते थे । वह भी अपने देवर साधू बाबा को शालिग्राम की पूजा करते देखकर हंसती थी और कहती थी कि तुम्हारा धर्म यहां पर नहीं चलने दूंगी और यह गोली-गोला तुम्हारे हाथों से फिंकवाकर रहूंगी । इस कारण देवर-भाभी में नोंकझोंक चलती रहती थी ।
एक दिन कमलेश्वरी महाप्रसाद और चरणामृत ग्रहण करके गृह कार्य में लग गई । तब साधू बाबा ने अपनी भाभी की महाप्रसाद की थैली गायब कर दी । यह बात भैयां ग्राम में परमहंस गोपाल मणि जी को पता चल गई । उन्होंने मनबोध मिश्र को बुलाकर पूरा घटनाक्रम सुनाते हुए कहा कि दो महात्माओं में उलझन हो गई है, थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा, तब तक किसी सज्जन के हाथों कमलेश्वरी को महाप्रसाद भिजवा दो ।
दूसरे दिन कमलेश्वरी स्नान करके महाप्रसाद ग्रहण करने गई, तो थैली मिली नहीं । महाप्रसाद ग्रहण किए बिना वह जल तक ग्रहण नहीं करती थी । वह समझ गई कि यह सब उसके देवर साधू बाबा का कार्य है । जब मांगने पर भी उसने थैली वापस नहीं की, तो विवश होकर कमलेश्वरी ने उसके शालिग्राम भगवान को कहीं भूमि में गाड़ दिया ।
जब साधू बाबा को भगवान नहीं दिखे, तो उसने कमलेश्वरी भाभी से पूछा । भाभी ने उत्तर दिया कि तुम्हारे शालिग्राम भगवान महाप्रसाद को ढूंढने गए हैं, जब मिल जाएगा तो लौट आएंगे । इस प्रकार दोनों में ठन गई और दोनों ही अन्न-जल त्यागकर बैठ गए । इसी प्रकार शाम के चार बज गए ।
तभी परमहंस महाराज का भेजा हुआ अनुचर महाप्रसाद लेकर पहुंच गया । महाप्रसाद प्राप्त होते ही कमलेश्वरी ने शालिग्राम को भूमि से निकालकर साधू बाबा को दे दिया । इसके पश्चात् दोनों व्यक्तियों ने जलपान किया और परमहंस महाराज के अनुचर से भेंट की ।
उस व्यक्ति ने बताया कि वह उसी सुबह भैयां ग्राम से चला था और महाराज जी की कृपा से चार बजे तक पहुंच भी गया, जबकि सामान्यतः इस यात्रा में दो दिन लगते हैं । घर के सब लोग आश्चर्य करने लगे कि परमहंस महाराज को यहां की जानकारी कैसे हुई और उनका भेजा व्यक्ति इतनी शीघ्र यहां कैसे पहुंच गया ? तब सबको परमहंस महाराज की महिमा का पता चला और कमलेश्वरी के लिए सबके मन में सम्मान भर गया ।
इस घटना से साधू बाबा बहुत लज्जित हुए और अपनी भाभी कमलेश्वरी देवी से अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी । उनके मन में परमहंस गोपाल मणि जी के लिए बहुत श्रद्धा उत्पन्न हो गई और वे उनका दर्शन करने के लिए व्याकुल होने लगे । तब कमलेश्वरी ने साधू बाबा को परमधाम की ब्रह्मसृष्टियों के संसार में आने के बारे में बताया, ब्रज, रास और जागनी लीला का वर्णन सुनाया । यह सब सुनकर साधू बाबा ने शालिग्राम की पूजा त्याग दी और सद्गुरु स्वरूप गोपाल मणि जी का ही चिन्तन करने लगे ।
सत्रह वर्ष की आयु में साधू बाबा का विवाह हो गया ।
मृत्यु के मुख से बचाव
जब साधू बाबा की आयु अठारह वर्ष हुई, तब वह मार्केश की बीमारी से ग्रसित हो गए । कोई उपचार काम नहीं आया । स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि उनका अन्तिम समय जानकर उन्हें धरती पर लिटा दिया गया । तब घर वालों ने कमलेश्वरी से कहा कि तू भी अपने सद्गुरु से प्रार्थना करके देख ले । यह सुनकर कमलेश्वरी बोली कि यदि इस को सद्गुरु महाराज के चरणों में अर्पित करने का वचन दो, तो यह बच सकता है । सबने एक स्वर में यह बात स्वीकार कर ली ।
तब कमलेश्वरी ने साधू बाबा को कमरे में आसन पर लिटा दिया । फिर अपने हाथ-पैर धोकर सद्गुरु का ध्यान और प्रार्थना करने लगी । फिर महाराज जी की दी हुई माला उसके शरीर पर फेर दी और प्रदक्षिणा देकर रसोई में खिचड़ी बनाने चली गई । कुछ ही देर में साधू बाबा की चेतना लौट आई और उन्हें भूख सताने लगी । वैद्य ने जाकर नाड़ी देखी तो वह चकित रह गया, मानो किसी मृतक में प्राण लौट आए हों । सभी घर वाले भी इस चमत्कार को देखकर चकित हो रहे थे । फिर कमलेश्वरी ने श्री राज और सद्गुरु महाराज को खिचड़ी का भोग लगाकर सबको प्रसाद खिलाया । कुछ दिनों में साधू बाबा पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गए ।
सद्गुरु परमहंस गोपाल मणि से मिलन
अगले कई वर्षों तक साधूू बाबा परमहंस महाराज से मिलने नहीं जा सके । सन् 1815 में मायके जाते समय कमलेश्वरी उन्हें अपने साथ भैयां ग्राम ले गई । तभी साधू बाबा ने परमहंस गोपाल मणि जी से तारतम लेकर अपनी आत्मा को उनके चरणों में समर्पित कर दिया । उस समय उनकी आयु 25 वर्ष थी । वह छह मास तक सद्गुरु की शरण में रहकर वाणी चर्चा सुनते रहे । वह तो वापस जाना ही नहीं चाहते थे, परन्तु भाभी और सद्गुरु के कहने पर उन्हें दुःखी मन से वापस घर लौटना पड़ा ।
वैराग्य व कठोर तप
घर लौटने पर साधू बाबा का मन गृहस्थी में नहीं लगता था । अब वह खैर दहार नदी के निकट एकान्त स्थान पर गुफा बनाकर ध्यान-साधना करने लगे । कुछ दिन दूध-फल का आहार लिया, कुछ दिन जल पर निर्भर रहे, फिर जल भी दो दिन के अन्तर पर लेने लगे । इस तरह तप करते हुए छह वर्ष बीत गए । तब उनके पिता भूलसाहि ने परमहंस महाराज के पास अनुचर भेजकर सारा वृत्तान्त कह सुनाया और उनसे तिवनी ग्राम (रीवा) पधारने की प्रार्थना की । परमहंस महाराज ने आश्वासन और स्वीकृति दे दी ।
परमहंस गोपाल मणि जी ने सन् 1821 में पहली बार रीवा प्रान्त में चरण धरे । रीवा में टिकुरी ग्राम के निकट सुन्दर उपवन में एक कुटी में विश्राम करने के लिए वे रुक गए और साधू बाबा व उनके परिजनों को सन्देश भिजवाकर वहीं बुलवा लिया ।
साधू बाबा और उनके पिता टिकुरी ग्राम पहुंचे । परमहंस महाराज को साष्टांग प्रणाम करके साधू बाबा के नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगी । परमहंस महाराज ने उनसे पूछा कि जब उन्हें तारतम ज्ञान मिल गया, अपनी परात्म का बोध हो गया और अपने प्रियतम श्री राज की पहचान हो गई, तो फिर किस लिए वे कठिन कसनी कर रहे हैं ? साधू बाबा ने उत्तर दिया कि वह माया के बन्धन में नहीं रहना चाहते । तब महाराज जी ने उन्हें समझाया कि वे तो माया के बन्धन से पहले ही मुक्त हो चुके हैं और उनके माध्यम से अनेक आत्माओं की जागनी होनी है । उन्होंने साधू बाबा को ढांढस बंधाया और उन्हें रीवा में ही निवास करने का आदेश दिया ।
टिकुरी में मन्दिर की स्थापना
टिकुरी में अनेक ग्रामों से लोग परमहंस गोपाल मणि जी के दर्शन करने के लिए आने लगे । सन् 1824 में, श्रद्धालु जनों के सहयोग से, वहां पर मन्दिर बनकर तैयार हो गया । जल की कमी के कारण एक बड़ा कुंआ खोदना प्रारम्भ किया गया । उसी दौरान भूमि में एक विशाल काला सर्प मिला, जो अपने स्थान से हटने को तैयार नहीं था । परमहंस महाराज ने उसे देखकर कहा कि यह विषैला नहीं है, परन्तु कोई सुन्दरसाथ अन्दर प्रवेश करके उसे निकालने को तैयार नहीं हुआ ।
तब परमहंस महाराज के आदेश से साधू बाबा नीचे उतर गए और सर्प से कहा कि बच्चा, मेरे हाथ पर चढ़ जाओ । सर्प चुपचाप उनके हाथ से लिपट गया । ऊपर पहुंचकर साधू बाबा वन में दूर निकल गए और पुनः सर्प से कहा कि अब हाथ से उतर जाओ । सर्प उतरकर चला गया । इस घटना के बाद वहां के लोग साधू बाबा का सम्मान करने लगे ।
साधू बाबा सदैव परमहंस गोपाल मणि जी की सेवा में पूर्ण श्रद्धा से लगे रहते थे । जब किसी सुन्दरसाथ के घर बुलावा आता, वहां भी वे उनके साथ ही रहते । बहुत अवसर पर परमहंस महाराज के कहने पर साधू बाबा ही लोगों को तारतम दिया करते थे ।
इस प्रकार टिकुरी में रहते हुए परमहंस गोपाल मणि जी को सात वर्ष हो गए थे, जिस दौरान अनेक आत्माओं की जागनी हुई । सन् 1828 में साधू बाबा को टिकुरी मन्दिर की जिम्मेदारी सौंपकर परमहंस महाराज भैयां ग्राम लौट गए ।
सद्गुरु के प्रिय पात्र
सन् 1831 में साधू बाबा टिकुरी से कुछ सुन्दरसाथ को लेकर भैयां ग्राम में परमहंस गोपाल मणि जी का दर्शन करने हेतु पहुंचे । सुन्दरसाथ तो चार-पांच दिन में वापस लौट गए, परन्तु साधू बाबा वहीं रुक गए ।
कोस्फरा ग्राम के राम दीन भैयां मन्दिर में पधारे और परमहंस महाराज से प्रार्थना करी कि वे चलकर उनके पुत्रों को तारतम दे दें । परमहंस महाराज ने साधू बाबा को उनके साथ इस कार्य हेतु भेज दिया ।
साधू बाबा ने राम दीन के पुत्रों को तारतम प्रदान किया । घर में उत्सव मनाया गया, सब सुन्दरसाथ भी एकत्रित हुए और रसोई भी बनाई गई । तभी एक व्यक्ति एक अनाम पत्री लेकर आया और साधू बाबा को देकर चला गया । साधू बाबा ने पत्री खोलकर पढ़ी, तो उसमें श्री कुलजम सरूप की एक चौपाई लिखी थी- तोड़त स्वरूप सिंहासन, दौड़ाए अपनी अकल । इन बातों से मारे जात हैं, देखो इनकी नसल ।।
इस पत्री को पढ़कर साधू बाबा व्याकुल हो गए और तुरन्त उठकर भैयां ग्राम चले आए । उनका दुःखी चेहरा देखकर परमहंस गोपाल मणि जी ने सब कुछ पूछा । उस पत्री को पढ़कर परमहंस महाराज क्रोधित होकर बोले- किस शैतान के मन में द्वेष भावना उत्पन्न हुआ है ? मेरे और साधू बाबा में जरा भी अन्तर नहीं है । जिस किसी को द्वैत भावना उत्पन्न हुई हो, सो आकर देखे कि मेरे हृदय में साधू बाबा का निवास है या नहीं ।
परमहंस महाराज के ऐसे वचनों को सुनकर साधू बाबा से द्वेष रखने वाले सुन्दरसाथ कांपने लगे । तब परमहंस महाराज ने साधू बाबा को दिलासा भरे वचन कहे और पुनः राम दीन के साथ भेज दिया । उसके बाद पूरा कार्यक्रम शान्तिपूर्वक सम्पन्न हो गया ।
रीवा प्रान्त में जागनी
सन् 1837 में परमहंस गोपाल मणि दूसरी बार टिकुरी पधारे । उन्होंने रीवा प्रान्त में रहकर गांव-गांव में जागनी करी । इस पुनीत कार्य में साधू बाबा हर समय उनके साथ रहे और जागनी कार्य में बहुत सहयोग दिया । अधिकतर सुन्दरसाथ को तारतम देने की जिम्मेदारी साधू बाबा की ही रहती थी ।
इस प्रकार सात वर्ष टिकुरी में रहने के बाद परमहंस महाराज फूलपुर भैयां जाने के लिए तैयार हो गए । उनको जाता देखकर सुन्दरसाथ बहुत व्याकुल होने लगे । तब परमहंस महाराज ने कहा कि किसी बात की चिन्ता मत करो । इस स्थान से बहुत आत्माएं जाग्रत होंगी । इस स्थान का पूज्य साधू बाबा को मानना, जिन्हें मैंने अपने हृदय में स्थान दिया है ।
धाम गमन
सन् 1860 में साधू बाबा एक मास के लिए फूलपुर भैयां गए । सद्गुरु परमहंस गोपाल मणि का दर्शन करके कुछ दिन तक सत्संग करते रहे । परमहंस महाराज से उन्हें पता चला कि अब वे शीघ्र ही अपने नश्वर शरीर का त्याग करने वाले हैं ।
एक दिन साधू बाबा ने परमहंस महाराज के सामने नतमस्तक होकर पूछा कि एक स्त्री को अपने पति के जीवित रहते शरीर छोड़ना चाहिए या उसके मरणोपरांत शरीर छोड़ना चाहिए ? परमहंस महाराज ने उत्तर दिया कि शास्त्रों के अनुसार उत्तम पतिव्रता स्त्री पति के जीवित रहते हुए ही अपने शरीर का त्याग कर देती है ।
कुछ दिवस पश्चात् साधू बाबा परमहंस महाराज को प्रणाम करके अपनी मण्डली के साथ टिकुरी लौट आए । वे परमहंस महाराज को श्री राज का स्वरूप मानते थे और उनके शरीर त्यागने की तिथि भी उन्हें ज्ञात थी । अतः इसे अपनी आत्मा का पतिव्रत धर्म मानते हुए, परमहंस महाराज से पहले ही साधू बाबा ने 70 वर्ष की आयु में स्वेच्छा से अपना शरीर त्याग कर दिया । उनकी श्रद्धा और समर्पण धन्य-धन्य है ।
