शून्य
शून्य या महा शून्य ऐसा आवरण है, जिसने इस संसार को घेर रखा है । चौदह लोक की उत्पत्ति और लय उसी से होता है । शून्य को निराकार भी कहते हैं ।
क्या शून्य को पार करना सम्भव है ?
जो लोग बड़ी बुद्धि वाले कहलाते हैं, वे भी इस प्रकार ठण्डे पड़ गए । उन्हें छल (संसार) और वतन (धाम) की पहचान न हो सकी, सो वे शून्य (निराकार) में गल गए ।1
(1) कलस हिन्दुस्तानी 2/38
