बड़ा कयामतनामा - प्रकरण ३
लिख्या चौथे सिपारे, सुख उमत को खुदा के सारे । कहे मक्के के काफर, आराम करते बीच घर ॥१॥
जो पूजें मक्के के पत्थर, इनों एही जान्या सांच कर । और जिनको खुदाए की पेहेचान, सहें दुख न छोड़ें ईमान ॥२॥
तिन की तसल्ली के कारण, महंमद को हुआ इजन । और इसलाम कहे दरवेस, कही खास उमत इन भेस ॥३॥
याकी मुराद कही इसलाम, यों कह्या मांहें अल्ला कलाम । कोई कर ना सके भेव, जो महंमद को देवें फरेब ॥४॥
बीच आवें जाएँ सौदागर, वास्ते फानी फल कुफर । काफर होए सिताबी दूर, मोमिन साहेब के हजूर ॥५॥
सो काफर पड़े मांहें दोजख, आखिर को जो ल्यावे सक । जो मोमिन हैं खबरदार, डरते रहें परवरदिगार ॥६॥
बीच आखिरत के बुजरकी, हुई है इस उमत की । सांची गिरो जो है हक, तहां बाग भिस्त बुजरक ॥७॥
दूध सहत की नदियां चलें, बागों बीच दरखतों तले । है इसलाम को मेहेमानी, होसी खुदा की मेहेरबानी ॥८॥
जहां बिध बिध की हैं न्यामत, मेवा मिठाइयां बीच भिस्त । करके तमासा नूर, इसलाम साहेब के हजूर ॥९॥
जो हमेसां दरगाह के, ए बीच भिस्त खुदाए के । और जाहेद जो चाहें भिस्त, आसिकों दीदार की कस्त ॥१०॥
जो कहे हैं नेकोंकार, पाया छिपा भला दीदार । जो फुरमान के बरदार, सोई नेक गिरो सिरदार ॥११॥
ए जो कही किताबें तीन, तिन पर है हक का आकीन । सिफत जमाने पैगंमर, रखना बीच खुदाए का डर ॥१२॥
अंजील तौरेत और कुरान, इन पर होए आया फुरमान । जो हवसेका पातसाह, पाई इन किताबों से राह ॥१३॥
इनकी जो करे उमेद, मुराद इसलाम पावे भेद । जो कहे दोस्त साहेब मोहोल, नजीक खुदाए के खासे फैल ॥१४॥
सब्द न छोड़े ए महंमद, वास्ते फानी दुनियां रद । वास्ते नेकी आखिरत, कबूं न छोड़ें खास उमत ॥१५॥
अदा हुए सब फरज, तब सिर से छूट्या करज । खुसालियां इनों होसी घनी, भिस्त खजाना पाया अपनी ॥१६॥
इनों का होसी सिताब, नजीक खुदाए के हिसाब । सब बंदगी एही मोमिन, जो अंदर के मारे दुस्मन ॥१७॥
एही कही तुम हकीकत, ए कबूल करो हुकम सरीयत । आप रखो पांउं उस्तुवार, मैदान लड़ाई हो हुसियार ॥१८॥
ए जो बैठा मांहें सबन, एही खुदाए का है दुस्मन । काफर करे बोहोतक सोर, तो मोमिनों सों न चले जोर ॥१९॥
बाजे नजीक अर्ज़ निमाज, और डरें नहीं हुकम आवाज । निमाज पीछे कह्या यों कर, खुदाए का तुम राखो डर ॥२०॥
फुरमान बरदारी ल्यावे जोए, सिताब छुटकारा पावे सोए । जिनों कुरान की पाई खबर, तिनों कह्या यों दिल धर ॥२१॥
नफसों से करो सबर, मारे हिरस हवा परहेज कर । दिल से दृढ़ करो सबर, साबित बंदगी मौला पर ॥२२॥
बंदगी वाले खुदाए राखत, बलाए सेती सलामत । कजाए का सिर लेओ हुकम, हक मिलावे को रूह तुम ॥२३॥
दूर करो जो बिना हक, करो उस्तुवारी जो बुजरक । लुत्फ मेहेरबानगी पाओ भेद, छूटो तिनसे जो है निखेद ॥२४॥
खुदाए बीच वजूद हिजाब, रूह तुमारी बैठा दाब । पीछे फना के फायदा सब, दौलत खुदाए बका पाओ जब ॥२५॥
बका चाहे सो फना होए, बिना फना बका न पावे कोए । छोड़ो नाचीज जो कमतर, ताथें फना होउ बका पर ॥२६॥
ढांपे थे जो एते दिन, हनोज लों न खोले किन । बातून जो कुरान के स्वाल, सो जाहेर किए छत्रसाल ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥७९॥
