कलस गुजराती - प्रकरण ४
पंथ पैंडोंनी खेंचाखेंच
कोई कहे दान मोटो, कोई कहे गिनान । कोई कहे विग्नान मोटो, एम वदे सहु उनमान ॥१॥
कोई कहे करम मोटो, कोई कहे मोटो काल । कोई कहे ए अगम, एम रमे सहु पंपाल ॥२॥
कोई कहे तीरथ मोटो, कोई कहे मोटो तप । कोई कहे सील मोटो, कोई कहे मोटो सत ॥३॥
कोई कहे विचार मोटो, कोई कहे मोटो व्रत । कोई कहे मत मोटी, एम वदें कई जुगत ॥४॥
कोई कहे करनी मोटी, कोई कहे मुगत । कोई कहे भाव मोटो, कोई कहे भगत ॥५॥
कोई कहे कीर्तन मोटो, कोई कहे श्रवन । कोई कहे वंदनी मोटी, कोई कहे अरचन ॥६॥
कोई कहे ध्यान मोटो, कोई कहे धारण । कोई कहे सेवा मोटी, कोई कहे अरपन ॥७॥
कोई कहे स्वांत मोटी, कोई कहे मोटो पण । रमे सहुए निद्रा मांहें, रूदे अंधारू अति घण ॥८॥
कोई कहावे अप्रस अंगे, कोई निवेदन । कोई कहे अमे नेम धारी, पण मूके नहीं मैल मन ॥९॥
कोई कहे सत संगत मोटी, कोई कहे मोटो दास । कोई कहे विवेक मोटो, कोई कहे विस्वास ॥१०॥
कोई कहे सदा सिव मोटो, कोई कहे आद नारायण । कोई कहे आद सकत मोटी, एम करे ताणोंताण ॥११॥
कोई कहे आतम मोटी, कोई कहे परआतम । कोई कहे अहंकार मोटो, जे आदनों उतपन ॥१२॥
कोई कहे सकल व्यापी, दीसंतो सहु ब्रह्म । कोई कहे ए निरगुण न्यारो, आ दीसे छे सहु भरम ॥१३॥
कोई कहे सुंन मोटी, कोई कहे निरंजन । सार अर्थ सूझे नहीं, पछे वादे वढें वचन ॥१४॥
कोई कहे आकार मोटो, कोई कहे निराकार । कोई कहे मांहें जोत मोटी, एम वढें भरया विकार ॥१५॥
कोई कहे पारब्रह्म मोटो, कोई कहे परसोतम । वेद ने वाद अंधकारे, वादे वढता धरम ॥१६॥
प्रगट पंपाल दीसे रमता, अति घणो अंधेर । कहे अमे साचा तमे झूठा, एम फरे ते अवले फेर ॥१७॥
पंथ सहुना एहज पैया, जे वलग्या मांहें वैराट । ए विध कही सहु विगते, ए रच्यो माया ठाट ॥१८॥
परपंचे सहु पंथ चाले, कहे लेसूं चरण निवास । ए रामतना जे जीव पोते, ते केम पामे साख्यात ॥१९॥
कोई भैरव कोई अगिन, कोई करवत ले । पारब्रह्म ने पामे नहीं, जो तिल तिल कापे देह ॥२०॥
अनेक स्वांग रमे जुजवा, असत ने अप्रमाण । मूल विना जे पिंड पोते, ते केम पामे निरवाण ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥१२७॥
