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विषय-सूची

कलस गुजराती - प्रकरण ६

वेदनी जाली

वेद मोटो कोहेडो, जेहेनी गूंथी ते झीणी जाल । कांईक संखेपे कही करी, दऊं ते आंकडी टाल ॥१॥

वैराट आकार सुपननो, ब्रह्मा ते तेहेनी बुध । मन नारद फरे मांहें, वेदे बांध्या बंध वेसुध ॥२॥

लगाड्या सहु रब्दे, व्याकरण वाद अंधकार । एणी बुधे सहु बेसुध कीधां, विवेक टाल्या विचार ॥३॥

बंध बांध्या वेदव्यासें, वस्त मात्रना नाम बार । ते वाणी वखाणी व्याकरणनी, छलवा आ संसार ॥४॥

बारे गमां बोलतां, एक अखर एक मात्र । ते बांधी बत्रीस श्लोकमां, एवो छल कीधो छे सास्त्र ॥५॥

लवा लवाना अर्थ जुजवा, द्वादसना प्रकार । मूल अर्थने मुझवी, बांध्या अटकले अपार ॥६॥

अर्थने नाखवा अवलो, गमोगमा ताणे । मूढोने समझाववा, रेहेस वचमां आंणे ॥७॥

एवी आंकडियो अनेक मांहें, ते ताणे गमां बार । रंचक रेहेल आंणी मधे, बांध्या बुधे विचार ॥८॥

अखर एक बारे गमां बोले, एवा श्लोक मांहें बत्रीस । ए छल आंणी अर्थ आडो, खोले छे जगदीस ॥९॥

एवा छल अनेक अर्थ आडो, ते अर्थ मांहें कई छल । अखरा अर्थ छल भावा अर्थ आडो, पछे करे भावा अर्थ अटकल ॥१०॥

ते बेसे पंडित विष्णु संग्रामे, एक काना ने कडका थाय । मांहों मांहें वढी मरे, एक मात्र न मेलाय ॥११॥

वादे वाणी सीखे सूरा, सुध बुध जाए सान । स्वांत त्रास न आवे सुपने, एहवुं व्याकरण गिनान ॥१२॥

ते व्यासे कीधी मोटी, दीधूं छलने मान । तेमां पंडित ताणोंताण करे, मांहें अहंमेव ने अग्नान ॥१३॥

ए छल पंडित भणीने, मान मूढोमां पामे । ए मूढ पंडित सहु छलना, भूलव्या एणी भोमे ॥१४॥

आ प्रगट जे प्राकृत, जेमां छल कांई न चाले । एमां अर्थ न थाय अवलो, ते पंडित हाथ न झाले ॥१५॥

आ पाधरी वाणी मांहें प्रगट, एक अर्थ नव दाखे । वचन वलाके त्यारे आणे, ज्यारे छलमां नाखे ॥१६॥

ए छल रामत जेहेनी ते जाणे, बीजी रामत सहु छल । ए छलना जीव न छूटे छलथी, जो देखो करता बल ॥१७॥

पेहेली मुझवण कही वैराटनी, बीजी वेदनी मुझवण । ए संखेपे कही में समझवा, ए छल छे अति घन ॥१८॥

मुख उदर केरा कोहेडा, रच्या ते मांहें सुपन । सुध केहेने थाय नहीं, मांहें झीले ते मोहना जन ॥१९॥

वैराट वेदें जोई करी, सेवा ते कीधी एह । देव तेहेवी पातरी, संसार चाले जेह ॥२०॥

बोल्या वेद कतेब जे, जेहेनी जेटली मत । मोह थकी जे उपना, तेहेने ते ए सहु सत ॥२१॥

लोक चौदे जोया वेदे, निराकार लगे वचन । उनमान आगल कही करी, वली पडे ते मांहें सुंन ॥२२॥

प्रगट देखाडूं पाधरा, पांचे ते जुजवा तत्व । रमे सहु मन मोह मांहें, सहु मननी उतपत ॥२३॥

सकल मांहें व्यापक, थावर ने जंगम । सहु थकी ए असंग अलगो, ए एम कहावे अगम ॥२४॥

दसो दिसा भवसागर, जुए ते एह सुपन । आवरण पाखल मोहनूं, निराकार कहावे सुंन ॥२५॥

ए ब्रह्मांडनो कोई कोहेडो, रामत चौद भवन । सुर असुर कई अनेक भांते, छलवा छल उतपन ॥२६॥

वनस्पति पसु पंखी, मनख जीव ने जंत । मछ कछ जल सागर साते, रच्यो सहु परपंच ॥२७॥

जीवों मांहें जिनस जुजवी, उपनी ते चारे खान । थावर जंगम सहु मली, लाख चौरासी निरमान ॥२८॥

कोई वैकुंठ कोई जमपुरी, कोई स्वर्ग पाताल । रमे पांचेना मांहें पुतला, बीजा सागर आडी पाल ॥२९॥

ए रामतनो वेपार करे, तेहेने माथे जमनो दंड । कोइक दिन स्वर्ग सोंपी, पछे नरक ने कुंड ॥३०॥

तेरे लोके आण फरे, संजमपुरी सिरदार । जे जाणे नहीं जगदीसने, ते खाय मोहोकम मार ॥३१॥

ए रामतनी लेव देव मेली, करे वैकुंठनों वेपार । ए जीवोंनी मोच्छ सतलोक, कोई पार निराकार ॥३२॥

चौदलोक इंडा मधे, भोम जोजन कोट पचास । अष्ट कुली पर्वत जोजन, लाख चौसठ वास ॥३३॥

पांच तत्व छठी आतमां, सास्त्र सर्व मां ए मत । ए निरमाण बांधीने, लई सुपन कीधूं सत ॥३४॥

जोया ते साते सागर, अने जोया ते साते लोक । पाताल साते जोइया, जाग्या पछी सहु फोक ॥३५॥

॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥१९३॥

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