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विषय-सूची

कलस गुजराती - प्रकरण ७

अवतारोंना प्रकरण

एह छल तां एवो हुतो, जेमां हाथ न सूझे हाथ । द्रष्ट दीठे बंध पडे, तेमां आव्यो ते सघलो साथ ॥१॥

ते माटे वालेजीए, आवीने छोडायो साथ । बीज ल्‍यावी घर थकी, कीधो जोतनो प्रकास ॥२॥

ए रामत करी तम माटे, तमे जोवा आव्या जेह । रामत जोई घर चालसूं, वातो ते करसूं एह ॥३॥

हवे चौद लोक चारे गमां, में मथ्या जोई वचन । मोहजल सागर मांहेंथी, काढ्या ते पांच रतन ॥४॥

पेहेलां कहया में साथने, पांचे तणां ए नाम । सुकदेव ने सनकादिक, महादेव भगवान ॥५॥

नारायण लखमी विष्णु मांहें, विष्णु थकी उतपन॥ अंग समाय अंगमां, ए नहीं वासना अंन ॥६॥

कबीर साखज पूरवा, लाव्यो ते वचन विसाल । प्रगट पांचे ए थया, बीजा सागर आडी पाल ॥७॥

वली एक कागल काढिया, सुकदेवजीनो सार । हदियो ना कोहेडा, वेहदी समाचार ॥८॥

तमे रामत जोवा कारणे, इच्छा ते कीधी एह । ते माटे सहु मापियूं, आ कहयूं कौतक जेह ॥९॥

अमे रामत खरी तो जोई, जो अखंड करूं आवार । बुधने सोभा दऊं, सत करी प्रगट पार ॥१०॥

अवतार चौवीस विष्णुना, वैकुंठ थी आवे जाय । ते विध सर्वे कहूं विगते, जेम सनंध सहु समझाय ॥११॥

अवतार एकवीस ए मधे, ते आडो थयो कल्पांत । बीजा त्रण जे मोटा कहया, तेहेनी कहूं जुजवी भांत ॥१२॥

अवतार एक श्रीकृष्णनों, मूल मथुरा प्रगट्यो जेह । वसुदेवने वायक कही, वैकुंठ वलियो तेह ॥१३॥

गोकुल सरूप पधारियो, तेहेने न कहिए अवतार । ए तो आपणी अखंड लीला, तेहेनो ते कहूं विचार ॥१४॥

संखेपे कहूं में समझवा, भाजवा मननी भ्रांत । एहेनो छे विस्तार मोटो, आगल कहीस वृतांत ॥१५॥

कल्पांत भेद आंही थकी, तमे भाजो मनना संदेह । अवतार ते अक्रूर संगे, जई लीधी मथुरा ततखेव ॥१६॥

विचार छे वली ए मधे, तमे सांभलो दई चित । आसंका सहु करूं अलगी, कहूं तेह विगत ॥१७॥

दिन अग्यारे भेख लीला, संग गोवालो तणी । सात दिन गोकुल मधे, पछे चाल्या मथुरा भणी ॥१८॥

धनक भाजी हस्ती मल्ल मारी, त्यारे थया दिन चार । कंस पछाडी वासुदेव छोडी, इहां थकी अवतार ॥१९॥

जुध कीधूं जरासिंधसूं, रथ आउध आव्या जिहां थकी । कृष्ण विष्णु मय थया, वैकुंठमां विष्णु त्यारे नथी ॥२०॥

वैकुंठथी जोत वली आवी, सिसुपाल होम्यो जेह । मुख समानी श्रीकृष्णने, पूरी साख सुकदेवे तेह ॥२१॥

कीधूं राज मथुरा द्वारका, वरस एक सो ने बार । प्रभास सहु संघारीने, उघाड्या वैकुंठ द्वार ॥२२॥

दिन आटला गोप हुतो, मोटी बुधनो अवतार । लवलेस कांइक कहूं एहेनो, आगल अति विस्तार ॥२३॥

कोइक काल बुध रासनी, ग्रही जोगवाई सकल । आवी उदर मारे वास कीधो, वृध पामी पल पल ॥२४॥

अंग मारे संग पामी, में दीधूं तारतम बल । ते बल लई वैराट पसरी, ब्रह्मांड थासे निरमल ॥२५॥

दैत कालिंगो मारीने, सनमुख करसे तत्काल । लीला अमारी देखाडीने, टालसे जमनी जाल ॥२६॥

आ देखो छो दैत जोरावर, व्यापी रहयो वैराट । काम क्रोध उनमद अहंकार, चाले आपोपणी वाट ॥२७॥

वैराट आखो लोक चौदे, चाले आपोपणी मत । मन माने रमे सहुए, फरीने वल्यूं असत ॥२८॥

एणे संघारसे एक सब्दसों, वार न लागे लगार । लोक चौदे पसरसे, ए बुध सब्दनों मार ॥२९॥

हूं मारूं तो जो होय कांइए, न खमे लवानी डोट । मारी बुधने एक लवे एवा, मरे ते कोटान कोट ॥३०॥

उठी छे वाणी अनेक आगम, एहेनो गोप छे अजवास । वैराट आखो एक मुख बोले, बुधने प्रकास ॥३१॥

चालसे सहु एक चाले, बीजूं ओचरे नहीं वाक । बोले तो जो कांई होय बाकी, चूंथी उडाड्यूं तूल आक ॥३२॥

हवे एह वचन कहूं केटला, एनो आगल थासे विस्तार । मारे संग आवी निध पामी, ते निराकार ने पार ॥३३॥

पार बुध पाम्या पछी, एहेनों मान मोटो थासे । अछर खिण नव मूके अलगी, मारी संगते एम सुधरसे ॥३४॥

अवतार जे नेहेकलंकनो, ते अस्व अधूरो रह्यो । पुरख दीठो नहीं नैने, तुरीने कलंकी तो कह्यो ॥३५॥

अवतार आ बुधना पछी, हवे बीजो ते थाय केम । विकार काढी सहु विस्वना, सहु कीधां अवतारना जेम ॥३६॥

अवतारथी उत्तम थया, तिहां अवतारनों सूं काम । कीधो सरवालो सहुनो, इहां बीजो न राख्यूं नाम ॥३७॥

पैया देखाडया पारना, अविचल भान उदे थयो । तिहां अगिया अवतारमां, अजवास इहां स्यो रहयो ॥३८॥

एणी पेरे तमे प्रीछजी, अवतार न थाय अंन । पुरख तां पेहेलो न कहयो, विचारी जुओ वचन ॥३९॥

रखे कहेने धोखो रहे, आ जुआ कहया अवतार । तो ए केहेनी बुधें विष्णुने, जगवी पोहोंचाड्यो पार ॥४०॥

सुकजीए अवतार सहु कहया, पण बुधमां रहयो संदेह । एहेनो चोख करी नव सक्‍यो, तो केम कहे लीला एह ॥४१॥

ए तो अछरातीतनी, लीला अमारी जेह । पेहेले संसा सहु भाजीने, वली कहीस कांईक तेह ॥४२॥

वैराटनी विध कही तमने, रखे राखो मन संदेह । अखंड गोकुल ने प्रतिबिंब, वली कही प्रीछवुं तेह ॥४३॥

अजवास अखंड अम कने, नहीं अंतराय पाव रती । रास रमी गोकुल आव्या, प्रतिबिंब लीला इहां थकी ॥४४॥

तारतम सूरज प्रगट्यो, सकल थयो प्रकास । लागी सिखरो पाताल झलक्यो, फोडियो आकास ॥४५॥

किरणां सघले कोलांभियो, गयो वैराटनो अग्नान । द्रढाव चोकस लोक चौदनो, उडाड्यूं उनमान ॥४६॥

वली जोत झाली नव रहे, वचमां विना ठाम । अखंड मांहें पसरी, देखाड्यो वृज विश्राम ॥४७॥

॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥२४०॥

इसी सन्दर्भ में देखें-