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विषय-सूची

कलस गुजराती - प्रकरण ८

गोकुल लीला

आ जुओ रे आ जुओ रे आ जुओ रे हो साथ जी, गोकुल लीला आपणी हो साथ जी ।

विध सर्वे कहूं विगते, वृज वस्यो जेणी पेर । अग्यारे वरस लीला करी, रास रमीने आव्या घेर ॥१॥

गोकुल जमुना त्रट भलो, पुरा बेतालीस वास । पासे पुरो एक लगतो, ए लीला अखंड विलास ॥२॥

वास वसती वसे घाटी, त्रण खूंने ना गाम । कांठे पुरो टीवा ऊपर, उपनंदनो ए ठाम ॥३॥

पुरा सहु बीजी गमां, वचे वाट धेननो सेर । इहां रमे वालो सकल मांहें, गोवालो ने घेर ॥४॥

पुरो पटेल सादूलनो, बीजी ते गमां एह । व्रखभानजी त्रीजी गमां, पुरो दीसे लांबो तेह ॥५॥

नंदजीना पुरा सामी, दिस पूरव जमुना त्रट । छूटक छाया वनस्पति, वृध आडी डालो वट ॥६॥

सकल वन सोहामणूं, सोभित जमुना किनार। अनेक रंगे वेलडी, फल सुगंध सीतल सार ॥७॥

नंदजीना पुरा पाखल, पुरा त्रण मामाओ तणा । ठाट बस्ती आखे पुरा, आप सूरा त्रणे जणा ॥८॥

गांगो चांपो अने जेतो, ए मामा त्रणेना नाम । दखिण दिस ने पछिम दिस, वीटी बेठा गाम ॥९॥

आठ मंदिर नंदजी तणा, मांडवे एक मंडाण । पाछल वाडा गौतणा, मांहें आथ सर्वे जाण ॥१०॥

रेत झलके मांडवे, आगल दूध चूलो चरी । आईजी एणे ठामे बेसे, बेसे सखियो सहु घेरी ॥११॥

इहां मंदिर मोदी तेजपालनो, चरी चूला पास । कोइक दिन आवी रहे, एनों मथुरा मांहें वास ॥१२॥

सरूप दस इहां आरोगे, पाक साक अनेक । भागवंतीबाई भली भांते, रसोई करे विवेक ॥१३॥

लाडलो नंद जसोमती, रोहिणी बलभद्र बाल । पालक पुत्र कल्याणजी, तेहेनो ते पुत्र गोपाल ॥१४॥

बेहेनो बंने जीवा रूपा, भेलियां रहे मोहोलान । अने बाई भागवंती, नारी घर कल्यान ॥१५॥

पुरो एक वृखभाननो, उत्तर दिस लगतो । पासे भाई भेलो लखमण, पुरो पूरण वसतो ॥१६॥

सरूप साते भली भांते, आरोगे अंन पाक । कल्यानबाई रसोई करे, विध विध वघारे साक ॥१७॥

राधाबाई पिता वृखभानजी, प्रभावती बाई मात । नान्हों कृष्ण कल्यानजी, तेथी मोटो सिदामो भ्रात ॥१८॥

नार सिदामा तणी, तेहनी नणद राधाबाई । जाणो सगाई स्यामनी, अंग धरे ते अति बडाई ॥१९॥

मंदिर छे आगल मांडवे, चूले चढे दूध माट । राधाबाई खोले प्रभावती, लई बेसे ऊपर खाट ॥२०॥

राधाबाईनो विवाह कीधूं, पण परण्या नथी प्राणनाथ । मूल सनमंधे एक अंगे, विलसे वल्लभ साथ ॥२१॥

घुरसे गोरस हरखे हेतें, घर घर प्रते थाए । आंगणे वेलूं उजली, वालो विराजे सहु मांहें ॥२२॥

पुरा सघले वचें चौरा, मांहें मेलावा थाय । चारे पोहोर गोठ घूघरी, रामत करतां जाय ॥२३॥

तेजपाल मोदी वलोट पूरे, वृजमां मोटे ठाम । वस्त वसाणूं सहु लिए, घृत दिए आखू गाम ॥२४॥

घोलिया इहां घोल करवा, आवे वृजमां जेह । वस्त वसाणूं लिए दिए, जई रहे मथुरा तेह ॥२५॥

गोवाला संग रमे वालो, सेर पाणी वाट । विनोद हांस अमें आवूं जावूं, जल भरवा एणे घाट ॥२६॥

विलास वृजमां वालाजीसूं, वरते छे एह वात । वचन अटपटा वेधे सहुने, अहनिस एहज तात ॥२७॥

रमे प्रेमें प्रीते भीनो, पुरा सघला मांहें । रमे खिण जेसूं तेहेने बीजो, सूझे नहीं कोई क्यांहें ॥२८॥

रामत रंगे अमें वालाजी संगे, रमूं जातां पाणी । आठो पोहोर अटकी अंगे, एह छब एहज वाणी ॥२९॥

घर घर आनंद ओछव, उछरंग अंग न माय । विनोद हांस वालाजी संगे, अहनिस करतां जाय ॥३०॥

बालक सुंदर बोले मीठूं, केडे करी घेर आणूं । खिणमां जोवन प्रेमें पूरो, सेजडिए सुख माणूं ॥३१॥

वाछरडा लई वन पधारे, आठमें दसमें दिन । कहियक गोवरधन फरतां, मांहें रमें ते वारे वन ॥३२॥

अखंड लीला रमूं अहनिस, अमें सखियों वालाजीने संग । पूरे मनोरथ अमतणां, ए सदा नवले रंग ॥३३॥

श्री राज पधारया पछी, वृजवधु मथुरा न गई । कुमारिका संग रामत मिसे, दाणलीला एम थई ॥३४॥

कुमारिका रमे रामत, अभ्यास चीलो कुल तणो । कुलडा मांहें दूध दधी, रमे वन रंग रस घणो ॥३५॥

वृजवधु मांहें रमवा, संग केटलीक जाय । वालोजी इहां दाण मिसे, मारग आडो थाय ॥३६॥

दूध दधी माखण ल्यावुं, अमें वालाजीने काज । ते दधी झूंटी अमतणो, दिए गोवालाने राज ॥३७॥

गोवाला नासी जाय अलगां, अमें वलगी राखूं वालो पास । पछे एकांते अमें वालाजी संगे, करूं वनमां विलास ॥३८॥

त्यारे कुमारिका अम संग रेहेती, अमें वाला संगे रमती । कुमारिकाओ ने प्रेम उतपन, मूल सनमंध इहां थकी ॥३९॥

अखंड लीला अहनिस, नित नित नवले रंग । एणी जोतें सहुए द्रढ थयूं, सखियों वालाजी ने संग ॥४०॥

नंद जसोदा गोवाल गोपी, धेन वछ जमुना वन । पसु पंखी थावर जंगम, नित नित लीला नौतन ॥४१॥

पुरे सघले रमूं अमें, अजवालिए लई ढोल । वालोजी इहां विनोद करे, ते कहया न जाय बोल ॥४२॥

उलसे गोकुल गाम आखू, हरख हेत अपार । धन धान वस्तर भूखण, द्रव्य अखूट भंडार ॥४३॥

विवाह जनम नित प्रते, आखे गाम अनेक होय । थोडुंक कारज कांइक थाय, तिहां तेडावे सहु कोय ॥४४॥

अनेक बाजंत्र नाटारंभ, धन खरचे अहीर उमंग । साथ सहु सिणगार करी, अमें आवुं ते अति उछरंग ॥४५॥

वलगे वालो विनोदे अमसूं, देखतां सहु जन । पण विचारे नहीं कोई वांकू, सहु कहे एह निसन ॥४६॥

वात एहेनी जाणूं अमें, कां वली जाणे अमारी एह । मांहेली वात न समझे बीजो, वालाजीनो सनेह ॥४७॥

ए थाय सहु अम कारणे, वालो पूरे मनोरथ मन । ए समे नी हूं सी कहूं, साथ सहु धंन धंन ॥४८॥

गोकुल आखो कीधूं गेहेलूं, अने वालो तो वचिखिण । जिहां मलूं तिहां एहज वातो, हांस विनोद रमण ॥४९॥

हवे ए लीला कहूं केटली, अलेखे अति सुख । वरस अग्यारे वासनाओंसों, प्रेमें रम्या सनमुख ॥५०॥

एक दिन गौ चारवा, वालो पोहोंता ते वृंदावन । गोवाला गौ लई वल्या, पछे जोगमाया उतपन ॥५१॥

कालमायामां रामत, एटला लगे प्रमाण । ब्रह्मांडनो कल्पांत करी, अखंड कीधो निरवाण ॥५२॥

सदा लीला जे वृजनी, आ विध कही तेह तणी । हवे रासनो प्रकास कहूं, ए सोभा अति घणी ॥५३॥

वली जोत झाली नव रहे, बीजो वेधियो आकास । ततखिण लीधो त्रीजो ब्रह्मांड, जिहां अखंड रजनी रास ॥५४॥

जिनस जुगत कहूं केटली, अलेखे सुख अखंड । जोगमायाए नवो निपायो, कोई सुख सरूपी ब्रह्मांड ॥५५॥

॥ प्रकरण ॥८॥ चौपाई ॥२९५॥

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