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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १

॥ कलस हिन्दुस्तानी - तौरेत ॥

राग श्री मारू

सुनियो बानी सोहागनी, हुती जो अकथ अगम । सो बीतक कहूँ तुमको, उड़ जासी सब भरम ॥१॥

रास कह्या कछु सुनके, अब तो मूल अंकूर । कलस होत सबन को, नूर पर नूर सिर नूर ॥२॥

कथियल तो कही सुनी, पर अकथ न एते दिन । सो तो अब जाहेर भई, जो अग्या थें उतपन ॥३॥

मुझे मेहेर मेहेबूबें करी, अंदर परदा खोल । सो सुख सनमंधियनसों, कहूं सो दो एक बोल ॥४॥

मासूकें मोहे मिलके, करी सो दिल दे गुझ । कहे तूं दे पड़उतर, जो मैं पूछत हों तुझ ॥५॥

तूं कौन आई इत क्योंकर, कहां है तेरा वतन । नार तूं कौन खसम की, दृढ़ कर कहो वचन ॥६॥

तूं जागत है के नींद में, करके देख विचार । विध सारी याकी कहो, इन जिमी के प्रकार ॥७॥

तब मैं पियासों यों कहया, जो तुम पूछी बात । मैं मेरी मत माफक, कहूंगी तैसी भांत ॥८॥

सुनो पिया अब मैं कहूं, तुम पूछी सुध मंडल । ए कहूं मैं क्यों कर, छल बल वल अकल ॥९॥

मैं न पेहेचानों आपको, ना सुध अपनों घर । पिउ पेहेचान भी नींद में, मैं जागत हों या पर ॥१०॥

ए मोहोल रच्यो जो मंडप, सो अटक रह्यो अंत्रीख । कर कर फिकर कई थके, पर पाई न काहूं रीत ॥११॥

जल जिमी तेज वाए को, अवकास कियो है इंड । चौदे तबक चारों तरफों, परपंच खड़ा प्रचंड ॥१२॥

यामें खेल कई होवहीं, सो केते कहूं विचित्र । तिमिर तेज रूत रंग फिरे, ससि सूर फिरे नखत्र ॥१३॥

तबक चौदे इंड में, जिमी जोजन कोट पचास । साढ़े तीन कोट ता बीच में, होत अंधेरी उजास ॥१४॥

उजास सूर को कहावहीं, सो तो अंधेरी के तिमर । तिनथें कछू न सूझहीं, जिमी आप ना घर ॥१५॥

जब थें सूरज देखिए, लेत अंधेरी घेर । जीव पसु पंखी आदमी, सब फिरें याके फेर ॥१६॥

काल ना देखें इन फेरे, याही तिमर के फंद । ए सूरज आंखों देखिए, पर याही फंद के बंध ॥१७॥

वाओ बादल बीज गाजही, जिमी जल ना समाए । ए पांचो आप देखाए के, फेर ना पैदा हो जाए ॥१८॥

या भांत अनेक ब्रह्मांड में, देत देखाई दसों दिस । ए मोहजल लेहेरां लेवहीं, सागर सब एक रस ॥१९॥

ए कोहेड़ा काली रैन का, कोई न पावे कल मूल । कहां कल किल्ली कुलफ, जो द्वार पाइए सूल ॥२०॥

ए तीनों लोक तिमर के, लिए जो तीनों ही घेर । ए निरखे मैं नीके कर, पर पाईए ना काहूं सेर ॥२१॥

ए अंधेरी इन भांत की, काहूं सांध न सूझे सल । ए सुध काहूं न परी, कई गए कर कर बल ॥२२॥

ग्यान लिया कर दीपक, अंधेर आप नहीं गम । जोत दीपक इत क्या करे, ए तो चौदे तबकों तम ॥२३॥

ए देखे ही परिए दुख में, कोई व्राध को रचियो रोग । छुटकायो छूटे नहीं, नाहीं ना देखन जोग ॥२४॥

टेढ़ी सकड़ी गलियां, तामें फिरे फेर फेर । गुन पख अंग इंद्रियां, कियो अंधेरी में अंधेर ॥२५॥

तत्व पांचो जो देखिए, यामें ना कोई थिर । प्रले होसी पल में, वैराट सचरा चर ॥२६॥

ए उपजे पांचो मोह थें, और मोह को तो नाहीं पार । नेत नेत कहे निगम फिरे, आगे सुध ना परी निराकार ॥२७॥

मूल बिना ए मंडल, नहीं नेहेचल निरधार । निकसन कोई न पावहीं, वार न काहूं पार ॥२८॥

पंथ पैंडे कई चलहीं, कई भेख दरसन । ता बीच अंधेरी ग्यान की, पावे ना कोई निकसन ॥२९॥

यामें ज्यों ज्यों खोजिए, त्यों त्यों बंध पड़ते जाएं । कई उदम जो कीजिए, तो भी तिमर न छोड़े ताए ॥३०॥

इत जुध किए कई सूरमें, पेहेन टोप सिल्हे पाखर । बचन बड़ें रन बोल के, सो भी उलट पड़े आखिर ॥३१॥

ए सुध अजूं किन ना परी, बढ़त जात विवाद । ए खेल तो है एक खिन का, पर जाने सदा अनाद ॥३२॥

खेल खावंद जो त्रैगुन, जाने याथें जासी फेर । ए निरखे मैं नीके कर, अजूं ए भी मिने अंधेर ॥३३॥

ए द्वार कोई खोल के, कबहूं ना निकस्या कोए । ए बुजरक जो छल के, बैठे देखे बेसुध होए ॥३४॥

ए जिन बांधे सो खोलहीं, तोलों ना छूटे बंध । या विध खेल खावंद की, तो औरों कहा सनंध ॥३५॥

निज बुध आवे अग्याएँ, तोलों ना छूटे मोह । आतम तो अंधेर में, सो बुध बिना बल ना होए ॥३६॥

ए तो कही इन इंड की, पिया पूछ्यो जो प्रश्न । कहूँ और अजूं बोहोत है, वे भी सुनो वचन ॥३७॥

॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥३७॥

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