कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १०
राग श्री
सत असत पटंतरो, जैसे दिन और रात । सत सूरज सब देखहीं, जब प्रगट भयो प्रभात ॥१॥
जोलों पिउ परदे मिने, विश्व विगूती तब । सो परदा अब खोलिया, एक रस होसी अब ॥२॥
जोलों जाहिर ना हुते, तब इत उपज्या क्रोध । जब प्रगटे तब मिट गया, सब दुनियां को व्रोध ॥३॥
ए प्रकास खसम का, सो कैसे कर ढंपाए । छल बल वल जो उलटे, सो देवे सब उड़ाए ॥४॥
दुनियां टेढ़ी मूल की, सो पेड़ से निकालूं वल । पिया प्रकास जो खिन में, सीधा करूं मंडल ॥५॥
सत जो ढांप्या ना रहे, उड़ाय दियो अंधेर । नूर पिया पसरे बिना, क्यों मिटे दुनियां फेर ॥६॥
अब अंधेर कछू ना रह्या, जाहेर हुआ उजास । तबक चौदे खसम का, प्रगट भया प्रकास ॥७॥
जोलों तिमर ना उड़े, तोलों सृष्ट न होवे एक । तिमर तीनों लोक का, उड़ाए दिया उठ देख ॥८॥
ए प्रकास है अति बड़ा, सो राखत हों अजूं गोप । जिन कोई ना सहे सके, ताथें हलके करूं उद्दोत ॥९॥
ए जो सब्द खसम के, जिन तुम समझो और । आद करके अबलों, किन कह्या ना पिया ठौर ॥१०॥
ए अकथ केहेनी खसम की, काहूं ना कथियल कोए । जो किनका कथियल कहूं, तो पिया वतन सुध क्यों होए ॥११॥
केतेक ठौरों सोहागनी, तिन सब ठौरों उजास । पर जब इत थें जोत पसरी, तब ओ ले उठसी प्रकास ॥१२॥
कोई दिन राखत हों गुझ, सो भी सैयों के सुख काज । जब सैयां सबे मिलीं, तब रहे ना पकरयो अवाज ॥१३॥
क्यों रहे प्रकास पकरयो, एह जोत अति जोर । जब सब उजाला इत आईया, तब गई रैन भयो भोर ॥१४॥
मैं अबला अरधांग हों, पिउ की प्यारी नार । सब जगाऊं सोहागनी, तो मुझे होए करार ॥१५॥
सैयों को वतन देखावने, उलसत मेरे अंग । करने बात खसम की, मावत नहीं उमंग ॥१६॥
नए नए रंग सोहागनी, आवत हैं सिरदार । खेल जो होसी जागनी, नाहीं इन सुख को पार ॥१७॥
जो पिउ प्यारी आवत, ताको गुझ राखों उजास । बाट देखों और सैयन की, सब मिल होसी विलास ॥१८॥
ए उजास इन भांत का, जो कबूं निकसी किरन । तो पसरसी एक पल में, चारों तरफों सब धरन ॥१९॥
बात बड़ी इन खसम की, सो क्यों कर ढापूं अब । सुख लेने को या समें, पीछे दुनियां मिलसी सब ॥२०॥
ए प्रकास जो पिउ का, टाले अंदर का फेर । याही सब्द के सोर से, उड़ जासी सब अंधेर ॥२१॥
और बेर अब कछू नहीं, गयो तिमर सब नास । होसी सब में आनंद, चौदे तबक प्रकास ॥२२॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥२२६॥
