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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १२

भी कहूं मेरी सैयन को, जो हैं मूल अंकूर । सो निज वतनी सोहागनी, पिया अंग निज नूर ॥१॥

पार पुरुख पिया एक है, दूसरा नाहीं कोए । और नार सब माया, यामें भी विध दोए ॥२॥

जो रूह असलू ईश्वरी, दूजी रूह सब जहान । पर रूह न्यारी सोहागनी, सो आगे कहूंगी पेहेचान ॥३॥

सैयां सुख निज वतनी, ईश्वरी को सुख और । दुनी भी सुख होसी सदा, आगे कहूंगी तीनों ठौर ॥४॥

ए लछन सैयां अंकूरी, जो होसी इन घर । ए वचन वतनी सुनके, आवत हैं तत्पर ॥५॥

अटक रह्या साथ आधा, जिनो खेल देखन का प्यार । ए किया मूल इन खातिर, जो हैं तामसियां नार ॥६॥

भूल गइयां खेल में, जो सैयां हैं समरथ । प्रकास पिया का मुझ पे, कहे समझाऊं अर्थ ॥७॥

सबन को भेली करूं, दृढ़ कर देऊं मन । खेल देखाऊं खोल के, जिन विध ए उतपन ॥८॥

ए खेल है जोरावर, बड़ो सो रचियो छल । ए तब जाहेर होएसी, जब काढ़ देखाऊं बल ॥९॥

तुम नाहीं इन छल के, छल को जोर अमल । सांची को झूठी लगी, ऐसो छल को बल ॥१०॥

तुम आइयां छल देखने, भिल गैयां मांहें छल । छल को छल न लागहीं, ओ लेहेरी ओ जल ॥११॥

ए झूठी तुमको लग रही, तुम रहे झूठी लाग । ए झूठी अब उड़ जाएसी, दे जासी जूठा दाग ॥१२॥

हांसी होसी अति बड़ी, जिन मोहे देओ दोस । कमी कहे मैं ना करूं, पर तुमें छल हुआ सिरपोस ॥१३॥

मांग लिया खसम पें, ए छल तुम देखन । जो कदी भूलियां छल में, तो फेर न आवे ए दिन ॥१४॥

तुम मुख नीचा होएसी, आगूं सैयां सबन । ए हांसी सत ठौर की, कोई सैयां कराओ जिन ॥१५॥

दुख ले चलसी इत थें, नहीं आवन दूजी बेर । तिन क्यों मुख ऊंचा होएसी, जो पिउसों बैठी मुख फेर ॥१६॥

तुम सुध पिउ ना आपकी, ना सुध अपनों घर । नाहीं सुध इन छल की, सो कर देऊं सब जाहेर ॥१७॥

मैं देखाऊं तिन विध, ज्यों होए पेहेचान छल । जब तुम छल पेहेचानिया, तब चले न याको बल ॥१८॥

अब देखो या छल को, जो देखन आइयां एह । प्रकास करूं इन भांत का, ज्यों रहेवे नहीं संदेह ॥१९॥

अन्धेर सब उड़ाए के, सब छल करूं जाहेर । खोलूं कमाड़ कल कुलफ, अन्तर मांहें बाहेर ॥२०॥

॥ प्रकरण ॥१२॥ चौपाई ॥२७९॥

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