कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १६
वैराट का कोहेड़ा
वैराट का फेर उलटा, मूल है आकास । डारें पसरी पाताल में, यों कहे वेद प्रकास ॥१॥
फल डारें अगोचर, आड़ी अंतराए पाताल । वैराट वेद दोऊ कोहेड़ा, गुंथी सो छल की जाल ॥२॥
विध दोऊ देखिए, एक नाभ दूजा मुख । गूंथी जालें दोऊ जुगतें, मान लिए दुख सुख ॥३॥
कोहेड़े दोऊ दो भांत के, एक वैराट दूजा वेद । जीव जालों जाली बांधे, कोई जाने न छल भेद ॥४॥
देखलावने तुम को, कोहेड़े किए ए । बताए देऊं आंकड़ी, छल बल की है जेह ॥५॥
आंकड़ी एक इन भांत की, बांधी जोर सों ले । आतम झूठी देखहीं, सांची देखें देह ॥६॥
करें सगाई देह सों, नहीं आतमसों पेहेचान । सनमंध पालें इनसों, ए लई सबो मान ॥७॥
नहवाए चरचे अरगजे, प्रीतें जिमावें पाक । सनेह करके सेवहीं, पर नजर बांधी खाक ॥८॥
जीव गया जब अंग थें, तब अंग हाथों जालें । सेवा जो करते सनेह सों, सो सनमंध ऐसा पालें ॥९॥
हाथ पांऊं मुख नेत्र नासिका, सब सोई अंग के अंग । तिन छूत लगाई घर को, प्यार था जिन संग ॥१०॥
अंग सारे प्यारे लगते, खिन एक रह्यो न जाए । चेतन चले पीछे सो अंग, उठ उठ खाने धाए ॥११॥
सनमंधी जब चल गया, अंग वैर उपज्या ताए । सो तबहीं जलाए के, लियो सो घर बटाए ॥१२॥
छोड़ सगाई आतम की, करें सगाई आकार । वैराट कोहेड़ा या बिध, उलटा सो कई प्रकार ॥१३॥
कई बिध यों उलटा, वैराट नेत्रों अंध । चेतन बिना कहे छूत लागे, फेर तासों करे सनमंध ॥१४॥
एक भेख जो विप्र का, दूजा भेख चंडाल । जाके छुए छूत लागे, ताके संग कौन हवाल ॥१५॥
चंडाल हिरदे निरमल, खेले संग भगवान । देखलावे नहीं काहू को, गोप राखे नाम ॥१६॥
अंतराए नहीं खिन की, सनेह सांचे रंग । अहनिस दृष्ट आतम की, नहीं देहसों संग ॥१७॥
विप्र भेख बाहेर दृष्टी, खट कर्म पाले वेद । स्याम खिन सुपने नहीं, जाने नहीं ब्रह्म भेद ॥१८॥
उदर कुटम कारने, उत्तमाई देखावे अंग । व्याकरण वाद विवाद के, अर्थ करें कई रंग ॥१९॥
अब कहो काके छुए, अंग लागे छोत । अधम तम विप्र अंगे, चंडाल अंग उद्दोत ॥२०॥
पेहेचान सबों को देह की, आतम की नहीं दृष्ट । वैराट का फेर उलटा, इन बिध सारी सृष्ट ॥२१॥
एक देखो ए अचंभा, चाल चले संसार । जाहेर है ए उलटा, जो देखिए कर विचार ॥२२॥
सांचे को झूठा कहें, और झूठे को कहें सांच । सो भी देखाऊं जाहेर, सब रहे झूठे रांच ॥२३॥
आकार को निराकार कहें, निराकार को आकार । आप फिरे सब देखें फिरते, असत यों निरधार ॥२४॥
मूल बिना वैराट खड़ा, यों कहे सब संसार । तो ख्वाब के जो दम आपे, ताए क्यों कहिए आकार ॥२५॥
आकार न कहिए तिनको, काल को जो ग्रास । काल सो निराकार है, आकार सदा अविनास ॥२६॥
जिन राचो मृग जल दृष्टे, जाको नाम प्रपंच । ए छल मायाऐं किया, ऐसे रचे उलटे संच ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥१६॥ चौपाई ॥३९५॥
