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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १७

वेद का कोहेड़ा

अब कहूं कोहेड़ा वेद का, जाकी मिहीं गूंथी जाल । याकी भी नेक केहेके, देऊं सो आंकड़ी टाल ॥१॥

वैराट आकार ख्वाब का, ब्रह्मा सो तिनकी बुध । मन नारद फिरे दसों दिसा, वेदें बांध किए बेसुध ॥२॥

लगाए सब रब्दें, व्याकरण वाद अंधकार । या बुधें बेसुध हुए, विवेक खाली विचार ॥३॥

बंध बांधे या विध, हर वस्त के बारे नाम । सो बानी ले बड़ी कीनी, ए सब छल के काम ॥४॥

लुगे लुगे के जुदे माएने, द्वादस के प्रकार । उलटाए मूल माएने, बांधे अटकलें अपार ॥५॥

अर्थ को डालने उलटा, अनेक तरफों ताने । मूढ़ों को समझावने, रेहेस बीच में आने ॥६॥

ऐसी कई आंकड़ियों मिने, बोलें बारे तरफ । रेहेस रंचक धरें बीचमें, समझाए ना किन हरफ ॥७॥

बारे तरफों बोलत, एक अखर एक मात्र । ऐसे बांध बतीस श्लोक में, बड़ा छल किया है सास्त्र ॥८॥

बारे मात्र एक अखर, अखर श्लोक बतीस । छल एते आड़े अर्थके, और खोज करें जगदीस ॥९॥

अर्थ आड़े कई छल किए, तिन अर्थों में कई छल । अखरा अर्थ भी ना होवहीं, किया भाव अर्थ अटकल ॥१०॥

जाको नामै संस्कृत, सो तो संसे ही की कृत । सो अर्थ दृढ़ क्यों होवहीं, जो एती तरफ फिरत ॥११॥

सो पढ़े पंडित जुध करें, एक काने को टुकड़े होए । आपस में जो लड़ मरें, एक मात्र ना छोड़ें कोए ॥१२॥

ए वाद बानी सिर लेवहीं, सुध बुध जावे सान । त्रास स्वांत न होवे सुपने, ऐसा व्याकरण ग्यान ॥१३॥

ए बानी ले बड़ी कीनी, दियो सो छल को मान । सो खेंचा खेंच ना छूटहीं, लिए क्रोध गुमान ॥१४॥

ए छल पंडित पढ़हीं, ताए मान देवें मूढ़ । बड़े होए खोले माएने, एह चली छल रूढ़ ॥१५॥

सीधी इन भाखा मिने, माएने पाइए जित । जो सब्द सब समझहीं, सो पकड़ें नहीं पंडित ॥१६॥

एक अर्थ न कहें सीधा, ए जाहेर हिंदुस्तान । अर्थ को डालने उलटा, जाए पढ़ें छल बान ॥१७॥

ए खेल जाको सोई जाने, दूजा खेल सारा छल । ए छल के जीव न छूटे छल थें, जो देखो करते बल ॥१८॥

एक उरझन वैराट की, दूृजी वेद की उरझन । ए नेक कही मैं तुमको, पर ए छल है अति घन ॥१९॥

मुख उदर के कोहेड़े, रचे मिने सुपन । ए सुध काहू न परी, मिने झीलें मोह के जन ॥२०॥

वैराट वेदों देख के, बूझ करी सेवा एह । देव जैसी पातरी, ए चलत दुनियां जेह ॥२१॥

ए जो बोले साधू सास्त्र, जिनकी जैसी मत । ए मोहोरे उपजे मोहके, तिनको ए सब सत ॥२२॥

तबक चौदे देखे वेदों, निराकार लों वचन । उनमान आगे केहेके, फेर पड़े मांहें सुंन ॥२३॥

ए देखो तुम जाहेर, पांचों उपजे तत्व । ए मोह मिने मन खेलहीं, सब मन की उतपत ॥२४॥

ए सारों में व्यापक, थावर और जंगम । सबन थें एक है न्‍यारा, याको जाने सृष्टब्रह्म ॥२५॥

दसों दिसा भवसागर, देखत एह सुपन । आवरण गिरद मोह को, निराकार कहावे सुंन ॥२६॥

ए इंड सारा कोहेड़ा, खेल चौदे भवन । सुर असुर कई अनेक भांते, हुआ छल उतपन ॥२७॥

वनस्पति पसु पंखी, आदमी जीव जंत । मच्छ कच्छ सबसागर, रच्यो एह प्रपंच ॥२८॥

जीवों मिने जुदी जिनसें, कहियत चारों खान । थावर जंगम मिलके, लाख चौरासी निरमान ॥२९॥

कोई बैकुंठ कोई जमपुरी, कोई स्वर्ग पाताल । सब खेलें ख्वाबी पुतले, आड़ी मोह सागर पाल ॥३०॥

जो बनजारे खेल के, तिन सिर जम को डंड । कोइक दिन स्वर्ग मिने, पीछे नरक के कुंड ॥३१॥

लाठी तेरे लोक पर, संजमपुरी सिरदार । जो जाने नहीं जगदीस को, तिन सिर जम की मार ॥३२॥

ए छल बनज छोड़ के, करे बैकुंठ वेपार । ए सत लोक इनका, कोई गले निराकार ॥३३॥

तबक चौदे इंड में, जिमी जोजन कोट पचास । पहाड़ कुली अष्ट जोजन, लाख चौसठ बास ॥३४॥

पांच तत्व छठी आतमा, सास्त्र सबों ए मत । यों निरमान बांध के, ले सुपन किया सत ॥३५॥

देखे सातों सागर, और देखे सातों लोक । पाताल सातों देखिया, जागे पीछे सब फोक ॥३६॥

॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥४३१॥

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