कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १८
प्रकरण अवतारों का
ए ऐसा था छल अंधेर, काहूं हाथ ना सूझे हाथ । बंध पड़े दृष्ट देखते, तामें आया सारा साथ ॥१॥
तो पिया मिने आए के, सब छुड़ाई सोहागिन । बोए के नूर प्रकासिया, बीज ल्याए मूल वतन ॥२॥
ए खेल किया तुम खातिर, तुम देखन आइयां जेह । खेल देख के चलसी, घर बातां करसी एह ॥३॥
तुम खेल देखन कारने, किया मनोरथ एह । ए माप्या तुम वास्ते, कोई राखूं नहीं संदेह ॥४॥
ए खेल सांचा तो देख्या, जो अखंड करूं फेर । पार वतन देखाय के, उड़ाऊं सब अंधेर ॥५॥
ए दसों दिस लोक चौद के, विचार देखे वचन । मोह सागर मथ के, काढ़े सो पांच रतन ॥६॥
पेहेले कहे मैं साथ को, इन पांचों के नाम । सुकदेव और सनकादिक, कबीर सिव भगवान ॥७॥
नारायन विष्णु एक अंग, लखमी याथें उतपन । एह समावे याही में, ए नहीं वासना अन ॥८॥
और एक कागद काढ़िया, सुकदेवजी का सार । हदियों का कोहेड़ा, बेहदी समाचार ॥९॥
अवतार चौबीस विष्णु के, बैकुंठ थें आवें जाएँ । ए बिध जाहेर त्यों करूं, ज्यों सनंध सब समझाए ॥१०॥
अवतार एकैस इनमें, तिन आड़ा हुआ कल्पांत । और कहावें तीन बड़े, भी कहूं तिनकी भांत ॥११॥
अवतार एक श्रीकृष्ण का, मूल मथुरा प्रगट्या जेह । दीदार देवकी वसुदेव को, दिया चतुरभुज एह ॥१२॥
वचन कहे वसुदेव को, फिरे बैकुंठ अपनी ठौर । पीछे प्रगटे दोए भुजा, सो सरूप सनंध और ॥१३॥
वसुदेव गोकुल ले चले, ताए न कहिए अवतार । सो तो नहीं इन हद का, अखंड लीला है पार ॥१४॥
ए कही सब तुम समझने, भानने मन की भ्रांत । बेहद विस्तार है अति बड़ा, या ठौर आड़ा कल्पांत ॥१५॥
भी कहूं तुमें समझाए के, तुम भानो धोखा मन । अवतार सो अक्रूर संगे, जाए लई मथुरा जिन ॥१६॥
इनमें भी है आंकड़ी, बिना तारतम समझी न जाए । सो तुम दिल दे समझियो, नीके देऊं बताए ॥१७॥
सात चार दिन भेख लीला, खेले गोवालों संग । सात दिन गोकुल मिने, दिन चार मथुरा जंग ॥१८॥
धनक भान गज मल मारे, तब हुए दिन चार । पछाड़ कंस वसुदेव छोड़े, या दिन थें अवतार ॥१९॥
अब आई बात हद की, हिसाब चौदे भवन । सब बात इत याही की, कहे अटकलें और वचन ॥२०॥
जुध किया जरासिंध सों, रथ आयुध आए खिन मांहें । तब कृष्ण विष्णु मय भए, बैकुंठ में विष्णु तब नांहें ॥२१॥
बैकुंठ थें जोत फिर आई, सिसुपाल किया हवन । मुख समानी श्रीकृष्ण के, यों कहे वेद वचन ॥२२॥
किया राज मथुरा द्वारका, बरस एक सौ और बार । प्रभास सब संघार के, जाए खोले बैकुंठ द्वार ॥२३॥
गोप हुता दिन एते, बड़ी बुध का अवतार । नेक अब याकी कहूं, ए होसी बड़ो विस्तार ॥२४॥
कोइक काल बुध रास की, लई ध्यान में सकल । अब आए बसी मेरे उदर, वृध भई पल पल ॥२५॥
अंग मेरे संग पाई, मैं दिया तारतम बल । सो बल ले वैराट पसरी, ब्रह्मांड कियो निरमल ॥२६॥
दैत कालिंगा मार के, सब सीधा होसी तत्काल । लीला हमारी देखाए के, टालसी जम की जाल ॥२७॥
दैत ऐसा जोरावर, देखो व्याप रह्या वैराट । काम क्रोध अहंकार ले, सब चले उलटी बाट ॥२८॥
याको संघारसी एक सब्द सों, बेर ना होसी लगार । लोक चौदे पसरसी, इन बुध सब्द को मार ॥२९॥
वैराट सारा लोक चौदे, चले आप अपनी मत । मन माने खेलें सब कोई, ग्रास लिए असत ॥३०॥
मैं मारूं तो जो होए कछुए, ना खमें हरफ की डोट । मेरी बुधें एक लवे से, ऐसे मरे कोटान कोट ॥३१॥
उठी है बानी अनेक आगम, याको गोप है उजास । वैराट सनमुख होयसी, बुध नूर के प्रकास ॥३२॥
चलसी सब एक चालें, दूजा मुख ना बोले वाक । बोले तो जो कछू होए बाकी, फोड़ उड़ायो तूल आक ॥३३॥
अब एह वचन कहूं केते, देसी दुनियां को उद्धार । मेरे संग आए बड़ी निध पाई, सो निराकार के पार ॥३४॥
पार बुध पाए पीछे, याको होसी बड़ो मान । अछर नेक ना छोड़े न्यारी, ए उदयो नेहेचल भान ॥३५॥
अवतार जो नेहेकलंक को, सो अश्व अधूरो रह्यो । पुरूख देख्यो नहीं नैनों, तुरी को कलंकी तो कह्यो ॥३६॥
अवतार या बुध के पीछे, अब दूसरा क्यों कर होए । विकार काढ़े विश्व के, सब किए अवतार से सोए ॥३७॥
अवतार से उत्तम हुए, तहां अवतार का क्या काम । जहां जमे हुआ सब का, दूजा नेक न राख्या नाम ॥३८॥
जहां पैए पाए पार के, हुआ नेहेचल नूर प्रकास । तित अगिए अवतार में, क्या रह्या उजास ॥३९॥
समझियो तुम या बिध, अवतार ना होवे अन । पुरूख तो पेहेले ना कह्यो, विचार देखो वचन ॥४०॥
॥ प्रकरण ॥१८॥ चौपाई ॥४७१॥
