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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण १९

गोकुल लीला

जिन किनको धोखा रहे, जुदे कहे अवतार । तो ए किनकी बुधें विष्णु को, जगाए पोहोंचाए पार ॥१॥

सुकें अवतार सब कहे, पर बुध में रह्या उरझाए । ए भी सीधा न कहे सक्या, तो क्यों इन कही जाए ॥२॥

ए तो अछरातीत की, लीला हमारी जेह । पेहेले संसा सबका भान के, पीछे भी नेक कहूं बिध एह ॥३॥

वैराट की बिध कही तुमको, जिन कछू राखों संदेह । अखंड गोकुल और प्रतिबिंब, ए भी समझाऊं दोए ॥४॥

ए खेल देख्या तो सांचा, जो अखंड करूं इन बेर । पार वतन देखाय के, सब उड़ाऊं अंधेर ॥५॥

अंतराए नहीं एक खिन की, अखंड हम पे उजास । रास लीला श्रीकृष्ण गोपी, खेले सदा अविनास ॥६॥

प्रतिबिंब लीला या दिन थें, फेर के गोकुल आए । चले मथुरा द्वारका, बैकुंठ बैठे जाए ॥७॥

तारतम नूर प्रगट्या, तिन तेजें फोरयो आकास । लागी सिखर पाताल लो, अब रहे ना पकरयो प्रकास ॥८॥

किरना सबमें कुलांभियां, गयो वैराट को अग्यान । दृढ़ाए चित चौदे लोकको, उड़ाए दियो उनमान ॥९॥

अब जोत पकरी ना रहे, बीच में बिना ठौर । पसरके देखाइया, बृज अखंड जो और ॥१०॥

बताए देऊं बिध सारी, बृज बस्यो जिन पर । अग्यारा बरस लीला करी, रास खेल के आए घर ॥११॥

गोकुल जमुना त्रट भला, पुरा ब्यालीस बास । पुरा पासे एक लगता, ए लीला अखंड विलास ॥१२॥

बास बस्ती बसे घाटी, तीन खूने गाम । कांठे पुरा टीवा ऊपर, उपनंद का ए ठाम ॥१३॥

तरफ दूजी पुरे सारे, बीच बाट धेन का सेर । इत खेले नंद नंदन, संग गोवालों के घेर ॥१४॥

पुरा पटेल सादूल का, बसे तरफ दूजी ए । तरफ तीसरी वृखभानजी, बसे नाके तीनों ले ॥१५॥

नंदजी के पुरे सामी, दिस पूरव जमुना त्रट । छूटक छाया वनस्पति, बृध आड़ी डालों बट ॥१६॥

सकल बन छाया भली, सोभित जमुना किनार । अनेक रंगे बेलियां, फल सुगंध सीतल सार ॥१७॥

तीन पुरे तीन मामों के, बसे ठाट बस्ती मिल । आप सूरे तीनों ही, पुरे नंद के पाखल ॥१८॥

गांगा चांपा और जेता, ए मामा तीनों के नाम । दखिन दिस और पछिम दिस, बसे फिरते गाम ॥१९॥

नंदजी के आठ मंदिर, मांडवे एक मंडान । पीछे वाड़े गौओं के, तामें आथ सर्वे जान ॥२०॥

रेत झलके आंगने, दूध चरी चूल्हा आगल । आईजी इन ठौर बैठें, और बैठें सखियां मिल ॥२१॥

मंदिर मोदी तेजपाल को, इत चरी चूल्हा पास । कोइक दिन आए रहे, याको मथुरा में बास ॥२२॥

सरूप दस इत आरोगें, पाक साक अनेक । भागवंती बाई भली पेरे, रसोई करे विवेक ॥२३॥

लाड़लो नंद जसोमती, रोहिनी बलभद्र बाल । पालक पुत्र कल्यानजी, वाको पुत्र गोपाल ॥२४॥

बेहेने दोऊ जीवा रूपा, भेलियां रहें मोहोलान । और बाई भागवंती, नारी घर कल्यान ॥२५॥

पुरो जो वृखभान को, भेलो भाई लखमन । नंदजी के उत्तर दिसे, बसत बास पूरन ॥२६॥

सरूप साते भली भांते, आरोगें अंन पाक । कल्यान बाई रसोई करे, विध विध के बहु साक ॥२७॥

राधाबाई पिता वृखभानजी, प्रभावती बाई मात । सुदामा कल्यानजी, याथें छोटो कृष्णजी भ्रात ॥२८॥

कल्याण बाई नारी सुदामा, अंग धरत अति बड़ाई । करत हांसी कई भांतें, याकी स्यामसों सगाई ॥२९॥

मंदिर छे मांडवे आगे, चरी चढ़े दूध माट । स्यामा गोद प्रभावती, ले बैठत हैं खाट ॥३०॥

मांगा किया राधाबाई का, पर ब्याहे नहीं प्राणनाथ । मूल सनमंधे एके अंगे, विलसत वल्लभ साथ ॥३१॥

घुरसे गोरस हेत में, घर घर होत मथन । खेले सब में सांवरो, मिने बाहेर आंगन ॥३२॥

पुरे सारे बीच चौरे, बैठे गोप बूढ़े भराए । चारों पोहोर गोठ घूघरी, खेलते दिन जाए ॥३३॥

और सबे गौचारने, गोप गोवाला जाए बन । भोर के बन संझा लों, यों होत बृज वरतन ॥३४॥

तेजपाल मोदी वलोट पूरे, जो कछू चाहिए सोए । घृत लेवे बड़े बड़े ठौरों, और बिरतिया होए ॥३५॥

घोलिए इत घोल करने, आवत बृज में जे । फेर जाए रहे मथुरा, वस्त भाव ले दे ॥३६॥

स्याम संग गोवाल ले, खेलत जमुना घाट । विनोद में हम आवें जाएँ, जल भरने इन बाट ॥३७॥

विलास बृज में पियाजीसों, बरतत एह बात । वचन अटपटे वेधें सब को, अहनिस एही तात ॥३८॥

पिउ प्रेमें भीगा खेलहीं, पुरे सारो मांहें । खेले खिन जासों ताए दूजा, सूझे नहीं कछु क्यांहें ॥३९॥

हम संग खेलें कई रंगे, जाते जमुना पानी । आठों पोहोर अटकी अंगे, एह छब एह बानी ॥४०॥

घर घर आनंद उछव, उछरंग अंग न माए । विलास विनोद पिया संगे, अह निस करते जाए ॥४१॥

सुंदर बालक मधुरी बानी, घर ल्यावें गोद चढ़ाए । सेज्याऐं खिन में प्रेमें पूरा, सुख देवें चित चाहे ॥४२॥

बाछरू ले बन पधारे, आठवें दसवें दिन । कबूं गोवरधन फिरते, मांहें खेलें बारे बन ॥४३॥

अखंड लीला अहनिस, हम खेलें पिया के संग । पूरे पिउजी मनोरथ, ए सदा नवले रंग ॥४४॥

श्री राज बृज आए पीछे, बृज वधू मथुरा ना गई । कुमारका संग खेल करते, दान लीला यों भई ॥४५॥

खेल खेलें कुमारका, चीले कुल अभ्यास । दूध दधी छोटे बासन, करे रंग रस बन विलास ॥४६॥

बृज वधू मिने खेलने, संग केतिक जाए । सांवरो इत दान लेने, करे आड़ी लकुटी ताए ॥४७॥

दूध दधी माखन ल्यावें, हम पियाजी के काज । तित दधी हमारा छीन के, देवें गोवालों को राज ॥४८॥

भाग जांए गोवाल न्यारे, हम पकड़ राखें पिउ पास । पीछे हम एकांत पिया संग, करें बन में विलास ॥४९॥

कुमारका हम संग रेहेती, पिउ खेलते सखियन । मूल सनमंध कुमारकाओं का, या दिन थें उतपन ॥५०॥

अखंड लीला अति भली, नित नित नवले रंग । इन जोतें सब जाहेर किया, हम सखियां पिया के संग ॥५१॥

आवे जब उजालियां, हम खेलें लेकर ढ़ोल । पिया करें विनोद हांसियां, सो कहे न जाए बोल ॥५२॥

उलसे गोकुल गाम सारा, हेत हरख अपार । धन धान वस्तर भूखन, द्रव्य अखूट भंडार ॥५३॥

जनम व्याह नित प्रते, सारे पुरे अनेक होए । नेक कारज करे कछुए, तो बुलावे सब कोए ॥५४॥

नाटारंभ कई बाजंत्र, धन खरचें अहीर उमंग । साथ सब सिनगार कर, हम आवें अति उछरंग ॥५५॥

बलगें विनोदें हमसों, देखते सब जन । पर कोई न विचारे उलटा, सब कहे एह निसन ॥५६॥

बात याकी हम जाने, और जाने हमारी एह । ना समझे कोई दूसरा, ए अंदर का सनेह ॥५७॥

ए होत है हम कारने, पिया पूरे मनोरथ मन । इन समें की मैं क्यों कहूं, साथ सबे धंन धंन ॥५८॥

बृज सारी करी दिवानी, और पिया तो वचिखिन । जहां मिले तहां एही बातें, विनोद हांस रमन ॥५९॥

नंद जसोदा गोवाल गोपी, धेन बछ जमुना बन । थिर चर सब पसु पंखी, नित नित लीला नौतन ॥६०॥

अब ए लीला कहूं केती, अलेखे अति सुख । बरस अग्यारे खेले प्रेमें, सखियनसों सनमुख ॥६१॥

एक दिन गौ चारने, पिउ पोहोंचे वृन्दावन । गोवाल गौ सब ले वले, पीछे जोग माया उतपन ॥६२॥

ए लीला यामें एते दिन, कालमाया को ब्रह्मांड । एह कल्पांत करके, फेर उपज्यो अखंड ॥६३॥

सदा लीला जो बृज की, मैं कही जो याकी बिध । अब कहूं वृन्दावन की, ए तो अति बड़ी है निध ॥६४॥

॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥५३५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-