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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण २

प्रकरण खोज का - राग श्री मारू

पिया मैं बोहोत भांत तोको खोजिया, छोड़ धंधा सब और । पूछत फिरों सोहागनी, कोई बताओ पिया ठौर ॥१॥

मैं नेक बात याकी कहूं, तुम कारन खोज्या खेल । कोई ना कहे मैं देखिया, जिनों नीके कर खोजेल ॥२॥

सास्त्र साधू जो साखियां, मैं देखी सबों की मत । पिया सुध काहू में नहीं, कोई न बतावे तित ॥३॥

छोटे बड़े जिन खोजिया, न पाया करतार । संसा सब कोई ले चल्या, पर छूटा नहीं विकार ॥४॥

झूठा ए छल कठन, काहूं ना किसी की गम । कहां वतन कहां खसम, कौन जिमी कौन हम ॥५॥

ए देखी बाजी छल की, छल की तो उलटी रीत । इनमें सीधा दौड़के, कोई ना निकस्या जीत ॥६॥

मैं देख्या दिल विचार के, चितसों अर्थ लगाए । इस मंडल में आतमा, चल्या ना कोई जगाए ॥७॥

मेहेनत तो बोहोतों करी, अहनिस खोज विचार । तिन भी छल छूटा नहीं, गए हाथ पटक कई हार ॥८॥

मोहादिक के आद लों, जेती उपजी सृष्ट । तिन सारों ने यों कहया, जो किनहूं ना देख्या दृष्ट ॥९॥

वरना वरनो खोजिया, जेती बनिआदम । एता दृढ़ किने ना किया, कहां खसम कौन हम ॥१०॥

आद मध और अबलों, सब बोले या विध । केवल विदेही हो गए, तिन भी ना कही सुध ॥११॥

वेदों कथ कथ यों कथ्या, सब मिथ्या चौदे लोक । बकते बकते यों बके, एक अनेक सब फोक ॥१२॥

बुध तुरिया दृष्ट श्रवना, जहांलों पोहोंचे मन । ए होसी उतपन सब फना, जो आवे मिने वचन ॥१३॥

वेदांती भी कहे थके, द्वैत खोजी पर पर । अद्वैत सब्द जो बोलिए, तो सिर पड़े उतर ॥१४॥

मन चित बुध श्रवना, पोहोंचे दृष्ट ना सब्दा कोए । खट प्रमान थें रहित है, सो दृढ़ कैसे होए ॥१५॥

द्वैत आड़े अद्वैत के, सब द्वैतई को विस्तार । छोड़ द्वैत आगे वचन, किने ना कियो निरधार ॥१६॥

ए अलख किनहूं ना लखी, आदै थें अकल । ऐसी निराकार निरंजन, व्याप रही सकल ॥१७॥

चेतन व्यापी व्याप में, सो फेर फेर आवे जाए । जड़ को चेतन ए करे, चेतन को मुरछाए ॥१८॥

ऊपर तले मांहें बाहेर, दसो दिसा सब एह । छोड़ याको कोई ना कहे, ठौर खसम का जेह ॥१९॥

जो कछू कहिए वचने, सो तो सब अनित । वतन सरूप कोई न कहे, तो क्यों कर जाइए तित ॥२०॥

पेड़ काली किन न देखी, सब छाया में रहे उरझाए । गम छाया की भी न पड़ी, तो पेड़ पार क्यों लखाए ॥२१॥

ए जाए न उलंघी देखीती, ना कछू होए पेहेचान । तो दुलहा कैसे पाइए, जाको नेक ना सुन्यो निसान ॥२२॥

खसम जो न्यारा द्वैत से, और ठौरों सब द्वैत । किने ना कहया ठौर नेहेचल, तो पाइए कैसी रीत ॥२३॥

ए मत वेद वेदांत की, सास्त्र सबों ए ग्यान । सो साधू लेकर दौड़हीं, आगे मोह न देवे जान ॥२४॥

या विध ग्यान जो चरचही, सो मैं देख्या चित ल्याए । ज्यों मनुआ सुपने मिने, बेसुध गोते खाए ॥२५॥

खिन में कहे सब ब्रह्म है, खिन में बंझा पूत । मद माते मरकट ज्यों, करे सो अनेक रूप ॥२६॥

खिन में कहे सत असत, माया कछुए कही न जाए । यो संग संसा दृढ़ हुआ, सब धोखे रहे फिराए ॥२७॥

खिन में कहे है आप में, खिन में कहे बाहेर । खिन में मांहें न बाहेर, याको शब्द न कोई निरधार ॥२८॥

खिन में कछू और कहे, खिन में और की और । सो बात दृढ़ क्यों होवहीं, जाको वचन ना रेहेवे ठौर ॥२९॥

जैसे बालक बावरा, खेले हंसता रोए । ऐसे साधू सास्त्र में, दृढ़ ना सब्दा कोए ॥३०॥

ए सब सींग ससिक, बंझा पूत वैराट । फूल गगन नाम धर के, उड़ाए देवें सब ठाट ॥३१॥

आप होत फूल गगन, बढ़त जात गुमान । देखीतां छल छेतरे, हाए हाए ऐसी नार सुजान ॥३२॥

कोई ना परखे छल को, जिन छल में है आप । तो न्यारा खसम जो छल थें, सो क्यों पाइए साख्यात ॥३३॥

अटक रहे सब इतहीं, आगे सब्द न पावे सेर । ए इंड गोलक बीच में, याके मोह तत्व चौफेर ॥३४॥

सब्द जो सारे मोह लों, एक लवा न निकस्या पार । खोज खोज ताही सब्द को, फेर फेर पड़े अंघार ॥३५॥

ए ख्वाबी दम सब नींद लों, ए दम नींदै के आधार । जो कदी आगे बल करे, तो गले नींदै में निराकार ॥३६॥

तबक चौदे ख्वाब के, याको पेड़ै नींद निदान । नींद के पार जो खसम, सो ए क्यों करे पेहेचान ॥३७॥

बड़ी बुध वाले जो कहावहीं, सो सीतल भए इन भांत । ना पेहेचान छल वतन की, सो सुन्य गले ले स्वांत ॥३८॥

ए पुकार साधू सुनके, हट रहे पीछे पाए । पार सुध किन ना परी, सब इतहीं रहे उरझाए ॥३९॥

जिनहूं जैसा खोजिया, सो बोले बुध माफक । मैं देखे सब्द सबन के, जो गए जाहेर मुख बक ॥४०॥

या बिध तो हुई नास्त, सो नास्त जानो जिन । सार सब्द मैं देख के, लिए सो दृढ़ कर मन ॥४१॥

जिन जानो पाया नहीं, है पावनहार प्रवान । सो ए छिपे इन छल थें, वाकी मिले न कासों तान ॥४२॥

सो तो प्रेमी छिप रहे, वाको होए गयो सब तुच्छ । ओ खेले पिया के प्रेम में, और भूल गए सब कुछ ॥४३॥

सुरत न वाकी छल में, वाही तरफ उजास । प्रेमै में मगन भए, और होए गयो सब नास ॥४४॥

प्रेमी तो नेहेचे छिपे, उन मुख बोल्यो न जाए । सब्द कदी जो निकसे, सो ग्यानी क्यों समझाए ॥४५॥

सब्द जो सीधे प्रेम के, सास्त्र तो स्यानप छल । या विध कोई ना समझहीं, बात पड़ी है वल ॥४६॥

साधू सास्त्र जो बोलहीं, सो तो सुनता है संसार । पर मूल माएने गुझ हैं, सोई गुझ सब्द हैं पार ॥४७॥

सब कोई देखे सास्त्र को, सास्त्र तो गोरख धंध । मूल कड़ी पाए बिना, तोलो देखीता ही अंध ॥४८॥

ऐसा तो कोई न मिल्या, जो दोनों पार प्रकास । मगन पिया के प्रेम में, उधर भी उजास ॥४९॥

जो कोई ऐसा मिले, सो देवे सब सुध । सब्दें सब समझावहीं, कहे वतन की विध ॥५०॥

कड़ी बतावे मूल की, सास्त्र निकाले वल । ठौर खसम सब केहेवहीं, जो है सदा नेहेचल ॥५१॥

आप ओलखावे आप में, आप पुरावे साख । आतम को परआतमा, नजरों आवे साख्यात ॥५२॥

और सब्द भी हैं सही, पिया करसी परदा दूर । सब मिल कदमों आवसी, तब हम पिया हजूर ॥५३॥

आगम की बानी कहे, पिया आवेंगे तेहेकीक । तिन आसा मेरी बंधी, पूरन आई परतीत ॥५४॥

मन चित बुध दृढ़ किया, पिया न करें निरास । महामत नेहेचें कहें, होसी दुलहे सों विलास ॥५५॥

॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥९२॥

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