कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण २०
जोगमाया को प्रकरण
अब जोत पकरी न रहे, दूजा बेधिया आकास । जाए लिया इंड तीसरा, जहां अखंड रजनी रास ॥१॥
इन दोऊ थें न्यारा मंडल, जाको कहियत हैं रास । तहां खेल स्याम सखियन का, ए लीला अविनास ॥२॥
या ठौर जोगमाया रच्यो, सब सामग्री समेत । तहां हद सब्द न पोहोंचही, तुमे तो भी कहूं संकेत ॥३॥
जिनस जुगत कहूं केती, अनेक सुख अखंड । जोगमायाए उपाया, कोई सुख सरूपी ब्रह्मांड ॥४॥
ए बानी नीके विचारियो, अंतर मांहें बाहेर । तुमें जगाऊं कर जागनी, देखाए देऊं जाहेर ॥५॥
क्योंए न आवे सब्द में, जोगमाया की बिध । तो भी देखाऊं कछुयक, लीला हमारी निध ॥६॥
हम देखे वृन्दावन इतथें, तहां भी खेलें पिया साथ । करें विनोद नित नए, बनही मिने विलास ॥७॥
काहूं न पाइए जोगमाया की, हम बिना पेहेचान । वासना पांचों अछर की, भले कहावें आप सुजान ॥८॥
ए माया हमारियां, याके हमपे विचार । और उपजे सब इनथें, ए हमारी आग्या-कार ॥९॥
रास लीला पेहेले करी, जो मिने वृन्दावन । आनंद-कारी जोगमाया, अविनासी उतपन ॥१०॥
जोगमाया की जुगत जुई, एक रस एक रंग । एक संगे सदा रेहेना, अंगना एकै अंग ॥११॥
आतम सदीवे एक है, वासना एकै अंग । मूल आवेस जोगमाया पर, सुख अखंड के रंग ॥१२॥
एक अंगे रंगे संगे, तो क्यों हुई अंतराए । इन सब्द में है आंकड़ी, बिना तारतम समझी ना जाए ॥१३॥
आंकड़ी अंतरध्यान की, सो ए कहूं सनंध । कोई न जाने हम बिना, इन तारतम के बंध ॥१४॥
जगाए आवेस लेयके, तब इत भए अंतरध्यान । विलास विरह चित चौकस करने, याद देने घर धाम ॥१५॥
जोगमाया की जुगत, और न जाने कोए । और कोई तो जाने, जो कोई दूसरा होए ॥१६॥
जोगमायाए जाग्रत होए, जल जिमी वाए अगिन । थिर चर सब पसु पंखी, तत्व सबे चेतन ॥१७॥
एक जरा तिन जिमी का, ताके तेज आगे सूर कोट । सो सूरज दृष्टें न आवहीं, इन जिमी जरे की ओट ॥१८॥
हेम जवेर के बन कहूं, तो ए सब झूठी वस्त । सोभा जो अविनास की, कही न जाए मुख हस्त ॥१९॥
बरनन करूं एक पात की, सो भी इन जुबां कही न जाए । कोट ससि जो सूर कहूं, तो एक पात तले ढंपाए ॥२०॥
सुतेज ससि बन पसु पंखी, तत्व सबें सुतेज । सुतेज थिर चर जो कछू, सुतेज रेजा रेज ॥२१॥
किरना बन जिमीय की, सामी किरना ससि प्रकास । नूर हम पे खेले नूर में, प्रेमें पियासों रास ॥२२॥
वस्तर भूखन इन जिमी के, सो मुख कहे न जाए । तो सुख इन सरूप के, क्यों कर इत बोलाए ॥२३॥
इन सुख बातां बोहोत हैं, सो नेक कह्यो प्रकास । पर ए भी जोगमाया मिने, जो कहियत हैं अविनास ॥२४॥
या ठौर लीला करके, हम घर आए सब मिल । या इंड कल्पांत करके, फेर अखंड किए मिने दिल ॥२५॥
हम तो सब धाम आए, अछर आपने घर । अखंड रजनी रास लीला, खेल होत या पर ॥२६॥
हमही खेले बृज रास में, हमही आए इत । घरों बैठे हम देखहीं, एही तमासा तित ॥२७॥
देखे बृज रास नीके, खेल किया पर पर । ले भोग विरह विलास को, हम आए निज घर ॥२८॥
देखे दोऊ सुख दुख, तो भी कछुक रह्यो संदेह । सत सरूपें तो फेर, मंडल रचियो एह ॥२९॥
ए खेल किया हम वास्ते, हम देखन आइयां एह । दोऊ के मनोरथ पूरनें, ए रच्या तमासा ले ॥३०॥
खेल रचे सुपन के, देखाए मिने सुपन । ए देखे हम न्यारे रहे, कोई और न देखे जन ॥३१॥
ए खेल सोहागनियों को, देखाया भली भांत । तारतम बुध प्रकास के, पूरी सबों की खांत ॥३२॥
खेल देख्या जो हम, सो थिर होसी निरधार । सारों मिने सिरोमन, होसी अखंड ए संसार ॥३३॥
भगवान जी आए इत, जागवे को तत्पर । हम उठसी भेले सबे, जब जासीं हमारे घर ॥३४॥
प्रकास कह्यो मैं रास को, एह सुन्यो तुम सार । अब महामती कहें सो सुनो, दया को विस्तार ॥३५॥
॥ प्रकरण ॥२०॥ चौपाई ॥५७०॥
