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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण २१

दया को प्रकरण

अब तो मेरे पिया की, दया न समावे इंड । ए गुन मुझे क्यों विसरे, मोसों हुए सब अखंड । सोहागनियों पिया दया गुन कैसे कहूँ ॥टेक॥१॥

अब गली मैं दया मिने, सागर सरूपी खीर । दया सागर भर पूरन, एक बूंद नहीं मिने नीर ॥२॥

दया मुकट सिर छत्र चंवर, दया सिंघासन पाट । दया सबों अंगों पूरन, सब हुओ दया को ठाट ॥३॥

अब दया गुन मैं तो कहूं, जो कछू अंतर होए । अंगीकार करी अंगना, सो देखे साथ सब कोए ॥४॥

पल पल आवे पसरती, न पाइए दया को पार । दूजा तो सब मैं मापिया, पर होए न दया को निरवार ॥५॥

एते दिन हम घर मिने, गोप राखी सत जोत । अब बुध खेंचे तरफ अपनी, तो जाहेर सत होत ॥६॥

सब्द कोई कोई सत उठे, सो भी गए असतमें भिल । सत असत काहू न सुध, दोऊ रहे हिल मिल ॥७॥

अब दूर करूं असत को, जाहेर करूं सत जोत । गोप रही थी एते दिन, सो अब होत उद्दोत ॥८॥

असत भी करना अखंड, करके सत प्रकास । सनंध सब समझाए के, करूं तिमर सब नास ॥९॥

संसा सारा भान के, उड़ाऊं असत अंधेर । निज बुध उठ बैठी हुई, गयो सो उलटो फेर ॥१०॥

अब फेर सब सीधा फिरे, सत आया सबों दृष्ट । पेहेचान भई प्रकास थें, सुपन की जाहेर सृष्ट ॥११॥

खेल देख्या कालमाया का, सो कालमाया में भिल । अब देखो सुख जागनी, होसी निरमल दिल ॥१२॥

आवेस मुझपे पिया को, तिन भेली करूं सोहागिन । सब सोहागिन मिल के, सुख लेसी मूल वतन ॥१३॥

विलास तब विध विध के, होसी हरख अपार । करसी आनंद विनोद, आवसी सकुंडल सकुमार ॥१४॥

आए रहेसी सब सोहागनी, तब लेसी सुख अखंड । पीछे तो जाहेर होएसी, तब उलटसी ब्रह्मांड ॥१५॥

हिस्सा देऊं आवेस का, सैंयन को सब पर । होसी मनोरथ पूरन, मिल हरखे जागसी घर ॥१६॥

अब साथ न छोडूं एकला, साथ मुझे छोड़े क्यों । कह्या मेरा साथ न लोपे, साथ कहे करूं मैं त्यों ॥१७॥

लेस है कालमाया को, बढ़यो साथ में विकार । सो गालूं सीतल नजरों, दे तारतम को खार ॥१८॥

विकार काढूं विधोगतें, बढ़ाए दया विस्तार । भानूं भरम तिन भांतसों, ज्यों आल न आवे आकार ॥१९॥

सुख देऊं मूल वतन के, कोई रच के भला रंग । मन वांछे मनोरथ, देऊं सुख सबों अंग ॥२०॥

मोह बढ़यो लेस माया को, निद्रा मूल विकार । सुध होए सबों अंगों, कर देऊं तैसो विचार ॥२१॥

जोलों न काढूं विकार, तोलों क्यों करके जगाए । जागे बिना इन रास के, किन निज सुख लिए न जाए ॥२२॥

आमले उलटे मोह के, और मोह तो तिमर घोर । ए घोर रैन टालूं या बिध, ज्यों सब कोई कहे भयो भोर ॥२३॥

गुन पख अंग इन्द्री उलटे, करत हैं सब जोर । सो सब टेढ़े टाल के, कर देऊं सीधे दोर ॥२४॥

अहंकार मन चित्त बुध, इन किए सब जेर । अब हारे सब जिताए के, फेरूं सो सुलटे फेर ॥२५॥

प्रकृत सबे पिंड की, सीधी करूं सनमुख । दुख अगनी टाल के, देखाऊं ते अखंड सुख ॥२६॥

चोर फेर करूं बोलावे, सुख सीतल करूं संसार । अंग में सबों आनन्द, होसी हरख तुमे अपार ॥२७॥

कोईक दिन साथ मोह के जल में, लेहेर बिना पछटाने । कहे महामती प्यारी मोहे वासना, ना सहूं मुख करमाने ॥२८॥

॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥५९८॥

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