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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण २२

हांसी का प्रकरण

मेरे साथ सनमंधी चेतियो, ए हांसी का है ठौर । पिउ वतन आप भूल के, कहा देखत हो और ॥१॥

साथ जी तुमको उपज्या, खेल देखन का ख्याल । जाको मूल नहीं बांधे तिन, ए हांसी का हवाल ॥२॥

मांग्या खेल विनोद का, तिन फेरे तुमारे मन । सो सब तुमको विसरे, जो कहे मूल वचन ॥३॥

गूंथो जाली दोरी बिना, आप बांधत हो अंग । अंग बिना तलफत हो, ए ऐसे खेल के रंग ॥४॥

आप बंधाने आप सों, इन कोहेड़े अंधेर । अमल चढ़या जानों जेहेर का, फिरत वाही में फेर ॥५॥

अमल चढ़या क्यों जानिए, कोई फिसले कोई गिरे । कोई मिने जाग के, कर पकर सीढ़ी चढ़े ॥६॥

एक गिरे पगथी बिना, वाको दूजी पकरे कर । सो खाए दोनों गड़थले, ए हांसी है या पर ॥७॥

एक पड़ी जिमी जान के, वाको दूजी उठावन जात । उलट पड़ी सो उलटी, ए खेल है या भांत ॥८॥

ओठा लेवे जिमी बिना, पांव बिना दोड़ी जाए । जल बिना भवसागर, यामें गलचुए खाए ॥९॥

देखो अंत्रीख खड़ियां, हाथ बिना हथियार । नींद बड़ी है जागते, पिंड बिना आकार ॥१०॥

एक नई कोई आए मिले, सो कहावे आप अजान । बड़ी होए दूजी मिने, समझावत सुजान ॥११॥

कोई वचन करड़े कहे, किन खण्डनी न खमाए । सो कलपे दोऊ कलकले, वाको अमल यों ले जाए ॥१२॥

खंडी खांड़ी रोए रोलाए, दुख देखे दोऊ जन । जागे पीछे जो देखिए, तो कमी न मांहें किन ॥१३॥

हांसी होसी साथ में, इन खेल के रस रंग । पूर बिना बहे जात हैं, कोई आड़ी होत अभंग ॥१४॥

हरखे हांसी हेत में, करसी साथ कलोल । मांगी माया सो देखी नीके, कोई ना हांसी या तोल ॥१५॥

मूल बिना ए बिरिख खड़ा, ताको फल चाहे सब कोए । फेर फेर लेने दौड़ही, ए हांसी इन बिध होए ॥१६॥

ए खेल देख्या छल का, बैकुंठ लो पाताल । फल फूल पात ना दरखत, काष्ट तुचा मूल ना डाल ॥१७॥

खुले ना बंध बिना बांधे, बिध बिध खोले जाए । ए माया मोहोरे देख के, उरझ रहे सब मांहें ॥१८॥

जागो जगाऊं जुगत सों, छोड़ो नींद विकार । पेहेचान कराऊं पिउ सों, सुफल करूं अवतार ॥१९॥

वतन देखाऊँ पिउ का, और अपनी मूल पेहेचान । एह उजाला करके, धोखा देऊं सब भान ॥२०॥

ए भोम हांसी देख के, आप होत सावचेत । मूल सुख कहे महामती, तुमको जगाए के देत ॥२१॥

॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥६१९॥

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