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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण २३

जागनी का प्रकरण

अब जाग देखो सुख जागनी, ए सुख सोहागिन जोग । तीन लीला चौथी घर की, इन चारों को यामें भोग ॥१॥

कह्या न जाए सुख जागनी, सत ठौर के सनेह । तो भी कहूं जिमी माफक, नेक प्रकासूं एह ॥२॥

अब जगाऊं जुगत सों, उड़ाऊं सब विकार । रंगे रास रमाए के, सुफल करूं अवतार ॥३॥

अब दुख ना देऊं फूल पांखड़ी, देखूं सीतल नैन । उपजाऊं सुख सब अंगों, बोलाऊं मीठे बैन ॥४॥

आगे कलकली कलकलाए, तोहे ना गयो विकार । कठिन सही तुम खंडनी, वचन खांडा धार ॥५॥

सो ए वचन मोहे सालहीं, कठिन तुमको जो कहे । सोहागनियों को निद्रा मिने, मूल घर विसर गए ॥६॥

अब गालूं ताओ दिए बिना, करूं सो रस कंचन । कस चढ़ाऊं अति रंगे, दोऊ पेर करूं धंन धंन ॥७॥

जानूं साथजी विदेस आए, दुख देखे कई भांत । जो लों ना इत सुख पावहीं, तो लों ना मोहे स्वांत ॥८॥

नैन चढ़ाए साथ न जागे, यों न जागनी होए । मूल घर देखाइए, तब क्यों कर रेहेवे सोए ॥९॥

खंडनी कर खीजिए, जागे नहीं इन भांत । दीजे आप ओलखाए के, यों साख देवाए साख्यात ॥१०॥

जगाऊं सुख याद देने, करूं आप अपनी बात । पीछे हम तुम मिलके, जाहेर कीजे विख्यात ॥११॥

आगे आवेस मोपे पिया को, दे अंग लई जगाए । निसंक निद्रा उड़ाए के, साख्यात लई बैठाए ॥१२॥

अब रह्यो न जाए नेक न्यारे, यों किए जागनी ले । अहंमेव जाग्या धाम का, हम मिने आया जे ॥१३॥

पेहेले जोगमाया भई रास में, ताको सो अति उजास । पर साथ जोग होसी जागनी, ताको कह्यो न जाए प्रकास ॥१४॥

अब विछोहा खिन एक साथ को, सो मैं सह्यो न जाए । अब नेक वाओ इन माया की, जानों जिन आवे ताए ॥१५॥

साथजी इन जिमी के, सुख देऊं अति अपार । हँस हँस हेते हरख में, तुम नाचसी निरधार ॥१६॥

प्रीतम मेरे प्राण के, अंगना आतम नूर । मन कलपे खेल देखते, सो ए दुख करूं सब दूर ॥१७॥

मुख करमाने मन के, सो तुमारे मैं ना सहूं । ए दुख सुख को स्वाद देसी, तो भी दुख मैं ना देऊं ॥१८॥

सत सुख में सुख देयसी, इन जिमी के दुख जेह । तुम हंसोगे हरख में, रस देसी दुखड़ा एह ॥१९॥

हम उपाया सुख कारने, ए जो मांग्या खेल तुम । दुख दे वतन बोलावहीं, ए इन घर नहीं रसम ॥२०॥

सेहेजल सुख तुमें है सदा, अलप नहीं असुख । तुम सुख को स्वाद लेने, खेल मांग्या ए दुख ॥२१॥

खेल मांग्या दुख का, तब कह्या हम तुम । दुख का खेल तुमको, क्यों देखावें हम ॥२२॥

दुख तो क्योंए देऊं नहीं, तो खेल देख्या क्यों जाए । खंत लगी खरी खेल की, तिनको सो एह उपाए ॥२३॥

पिया हम खेल जान्या घरका, ज्यों खेल करत सदाए । हम खेल खड़े यों देखसी, ए भी इन अदाए ॥२४॥

वस्तोगते दुख ना कछू, जो पीछे फेरो दृष्ट । जो देखो वचन जागके, तो नाहीं कछुए कष्ट ॥२५॥

लगोगे जो दुख को, तो दुख तुमको लागसी । याद करो जो निज सुख, तो दुख तुमथें भागसी ॥२६॥

फेर देखो जो नजरों, तो रेहेसी न्‍यारे दुख । करोगे इत खेल रंगे, विनोद बातें मुख ॥२७॥

सागर सुख में झीलते, तहां दुख नहीं प्रवेस । तो दुख तुम मांगिया, सो देखाया लवलेस ॥२८॥

पौढ़े भेले जागसी भेले, खेल देख्या सबों एक । बातां करसी जुदी जुदी, बिध बिध की विसेक ॥२९॥

दुख तुमारे मैं न सहूं, सो जानो चित्त चौकस । ए दुख देसी बोहोत सुख, खेल होसी रंग रस ॥३०॥

साथ को इन जिमी के, सुख देने को हरख अपार । रास में रंग खेल के, भेले जागिए निरधार ॥३१॥

अब ल्योरे मेरे साथ जी, इन जिमी ए सुख । मैं तुमारे न सेहे सकों, जो देखे तुम दुख ॥३२॥

लेहेर लगे तुमें मोह की, सो आतम मेरी न सहे । अब खंडनी भी न करूं, जानों दुखाऊं क्यों मुख कहे ॥३३॥

अब क्यों देऊं कसनी, मुख करमाने न सहूं । तिन कारन सब्द कठन, मेरे प्यारों को मैं क्यों कहूं ॥३४॥

अब तारूं तुमें या बिध, ज्यों लगे न लेहेर लगार । सुखपाल में बैठाए सुखें, घर पोहोंचाऊं निरधार ॥३५॥

उपजाए देऊं अंग थें, रस प्रेम के प्रकार । प्रकास पूरन करके, सब टालूं रोग विकार ॥३६॥

अंग दिए बिना आवेस, नाहीं प्रेम उपाए । आवेस दे करूं जागनी, लेऊं अंग में मिलाए ॥३७॥

अब भेले तो सब चलिए, जो अंग न काहूं अटकाए । तो तुमें होवे जागनी, जो सांचवटी बटाए ॥३८॥

अब दुख आवे तुमको, तहां आड़ा देऊं मेरा अंग । सुख देऊं भली भांतसों, ज्यों होए न बीच में भंग ॥३९॥

ए लीला करूं इन भांतें, तो रास रंग खेलाए । बिध बिध के सुख विलसिए, विरह जागनी सह्यो न जाए ॥४०॥

जगाए नीके सुख देऊं, रेहेस खेलाऊं रंग । सत सुख क्यों आवहीं, जोलों ना दीजे अंग ॥४१॥

अंगना को अंग दीजिए, अंगना लीजे अंग । पास देऊं पूरा प्रेम का, नेहेचल का जो रंग ॥४२॥

असत सों उलटाए के, सत सों कराऊं संग । परआतम सों बंध बांधूं, ज्यों होए ना कबहूं भंग ॥४३॥

पिउ जगाई मुझे एकली, मैं जगाऊं बांधे जुथ । ए जिमी झूठी दुख की, सो कर देऊं सत सुख ॥४४॥

सब साथ करूं आपसा, तो मैं जागी प्रमान । जगाए सुख देऊं धाम के, मिलाए मूल निसान ॥४५॥

आवेस जाको मैं देखे पूरे, जोगमाया की नींद होए । पर जो सुख दीसे जागनी, हम बिना न जाने कोए ॥४६॥

जो जाग बैठे धाम में, ताए आवेस को क्या कहिए । तारतम तेज प्रकास पूरन, तिनथें सकल बिध सुख लहिए ॥४७॥

आवेस को नहीं अटकल, पर जागनी अति भारी । आवेस जागनी तारतमें, जो देखो जाग विचारी ॥४८॥

ए पैए बतावे पार के, नहीं तारतम को अटकल । आवेस जागनी हाथ पिया के, एह हमारा बल ॥४९॥

तारतम के सुख साथ आगे, बिध बिध पियाने कहे । पीछे ए सुख इंद्रावती को, दया कर सारे दिए ॥५०॥

धंन पिया धंन तारतम, धंन धंन सखी जो ल्याई । धंन धंन सखी मैं सोहागनी, जो मो में ए निध आई ॥५१॥

पिया ल्‍याए मुझ कारने, और हुआ न काहूं जान । मैं लिया पिया विलसिया, विस्तारिया प्रमान ॥५२॥

ए बानी सबमें पसरी, पर किया न साथे विचार । पीछे दया कर दई धनिएँ, अंग इंद्रावती विस्तार ॥५३॥

बोहोत धन ल्याए धनी धामथें, बिध बिध के प्रकार । सो ए सब मैं तोलिया, तारतम सबमें सार ॥५४॥

तारतम का बल कोई न जाने, एक जाने मूल सरूप । मूल सरूप के चित्त की बातें, तारतम में कई रूप ॥५५॥

साख्यात सरूप इंद्रावती, तारतम को अवतार । वासना होसी सो बलगसी, इन वचन के विचार ॥५६॥

सरूप साथकी पेहेचान, तारतममें उजास । जोत उद्दोत प्रगट पूरन, इंद्रावती के पास ॥५७॥

वासनाओं की पेहेचान, बानी करसी तिन ताल । निसंक निद्रा उड़ जासी, सुनते ही तत्काल ॥५८॥

एक लवा सुने जो वासना, सो संग न छोड़े खिन मात्र । होसी सब अंगों गलित गात्र, प्रगट देखाए प्रेम पात्र ॥५९॥

ए बानी सुनते जिनको, आवेस न आया अंग । सो नहीं नेहेचे वासना, ताको करूं जीव भेलो संग ॥६०॥

वासना जीव का बेवरा एता, ज्यों सूरज दृष्टें रात । जीव का अंग सुपनका, वासना अंग साख्यात ॥६१॥

भी बेवरा वासना जीवका, याके जुदे जुदे हैं ठाम । जीव का घर है नींद में, वासना घर श्री धाम ॥६२॥

ना होए नया न पुराना, श्री धाम इन प्रकार । घटे बढ़े नहीं पत्र एक, सत सदा सर्वदा सार ॥६३॥

जो किन जीवे संग किया, ताको करूं ना मेलो भंग । सो रंगे भेलूं वासना, वासना सत को अंग ॥६४॥

तारतम तेज प्रकास पूरन, इंद्रावती के अंग । ए मेरा दिया मैं देवाए, मैं इंद्रावती के संग ॥६५॥

इंद्रावती के मैं अंगे संगे, इंद्रावती मेरा अंग । जो अंग सौंपे इंद्रावती को, ताए प्रेमें खेलाऊं रंग ॥६६॥

बुध तारतम जित भेले, तित पेहेले जानो आवेस । अग्या दया सब पूरन, अंग इंद्रावती प्रवेस ॥६७॥

सुख देऊं सुख लेऊं, सुख में जगाऊं साथ । इंद्रावती को उपमा, मैं दई मेरे हाथ ॥६८॥

मैं दया तुमको करी, जो देखो नैना खोल । ना खोलो तो भी देखोगे, छाया निकसी ब्रह्मांड फोड़ ॥६९॥

ए खेल देख्या बैठे घर, अग्याऐं सैयों नजर । जब अंतर आंखां खुली, तब दृष्ट घर की घर ॥७०॥

निज नैना देऊं खोलके, ज्यों आड़ी न आवे मोह सृष्ट । होसी पेहेचान सत सुख, निज वतन देखो दृष्ट ॥७१॥

तारतम का जो तारतम, अंग इन्द्रावती विस्तार । पैए देखावे पार के, तिन पार के भी पार ॥७२॥

ब्रह्मांड दोऊ अखंड किए, तामें लीला हमारी । तीसरा ब्रह्मांड अखंड करना, ए लीला अति भारी ॥७३॥

तीन लीला माया मिने, हम प्रेमें विलसी जेह । ए लीला चौथी विलसते, अति अधिक जानी एह ॥७४॥

एक सुख सुपनके, दूजे जागते ज्यों होए । तीन लीला पेहेले ए चौथी, फरक एता इन दोए ॥७५॥

पेहेले दृष्टें हमारे जो आइया, तेते मिने उजास । हम खेलें तिन उजासमें, और लोक सब को नास ॥७६॥

अब लोक चौदे तरफ चारों, प्रकास होसी साथ जोग । जीव सबको जगाए के, टालूं सो निद्रा रोग ॥७७॥

हम जाहेर होए के चलसी, सब भेले निज घर । वैराट होसी सनमुख, एक रस सचराचर ॥७८॥

जब हम जाहेर हुए, सुध होसी संसार । दुनियां सारी दौड़सी, करने को दीदार ॥७९॥

हम सदा संग पिया के, जो रूहें सोहागिन । सो अग्यांऐं उठ बैठसी, सब अपने वतन ॥८०॥

अव्वल सब सोहागनी, एक ठौर पिया पास । सबों सुख होसी सोहागनी, रंग रस प्रेम विलास ॥८१॥

जो जोत होसी जागनी, ए नूर बिना हिसाब । लोक चौदे पसरसी, तब उड़ जासी ए ख्वाब ॥८२॥

ए बानी तो करूं जाहेर, जो करना सबों एक रस । वस्त देखाए बिना, वैराट न होवे बस ॥८३॥

वैराट बस किए बिना, क्यों कर होए अखंड । हम खेल देख्या इछाए कर, सो भंग ना होए ब्रह्मांड ॥८४॥

अनेक आगे होएसी, इन बानी को विस्तार । ए नेक कह्या मैं करने, अखंड ए संसार ॥८५॥

ए बानी कही मैं जाहेर, सो विस्तरसी विवेक । मैं गुझ कही है साथ को, पर सो है अति विसेक ॥८६॥

संसार सब के अंग में, मेरी बुध को करूं प्रवेस । असत सब होसी सत, मेरे नूर के आवेस ॥८७॥

बुध मूल अछर की, आई हमारे पास । जोगमाया को ब्रह्मांड, तिन हिरदे था रास ॥८८॥

ए हुती पिया चरने, दिन एते गोप । वचन कोई कोई सत उठे, सोए करूं क्यों लोप ॥८९॥

बृज रास में हम रमे, बुध हती रास में रंग । अब आए जाहेर हुई, इत उदर मेरे संग ॥९०॥

इंद्रावती पिया संगे, उदर फल उतपन । एक निज बुध अवतरी, दूजा नूर तारतम ॥९१॥

दोऊ सरूप प्रगटे, लई मिनों मिने बाथ । एक तारतम दूजी बुध, देखसी सनमुख साथ ॥९२॥

अछर केरी वासना, कहे जो पांच रतन । कागद ‍ल्याया बेहद का, सुकदेव मुनी धंन धंन ॥९३॥

विष्णु मन खेल ले खड़ा, पकड़ के दोऊ पार । भली भांत भेले विष्णु के, सनकादिक थंभ चार ॥९४॥

महादेवजीऐं बृज लीला, ग्रह्यो अखंड ब्रह्मांड । अछर चित सदासिव, ए यों कहावे अखंड ॥९५॥

कबीर साख जो पूरने, ल्‍याया सो वचन विसाल । प्रगट पांचो ए भए, दूजे सागर आड़ी पाल ॥९६॥

हम बुध नूर प्रकास के, जासी हमारे घर । बैकुंठ विष्णु जगावसी, बुध देसी सारी खबर ॥९७॥

खबर देसी भली भांतें, विष्णु जागसी तत्काल । तब आवसी नींद इन नैनों, प्रलेय होसी पंपाल ॥९८॥

अछर खेल इछाए कर, छर रच के उड़ात । वासना पांचों पोहोंचे इत, ए सत मंडल साख्यात ॥९९॥

पांचो बुध ले वले पीछे, तामें बुध विसेक विचार । अछर आंखां खोलसी, होसी हरख अपार ॥१००॥

लीला तीनों थिर होएसी, अखंड इन प्रकार । निमख एक ना विसरसी, रेहेसी दिल में सार ॥१०१॥

उत्तम भी कहूं इनमें, जहां तारतम को विस्तार । वासना पांचों बुध ले, साख पूरसी संसार ॥१०२॥

मेरी संगते ऐसी सुधरी, बुध बड़ी हुई अछर । तारतमें सब सुध परी, लीला अंदर की घर ॥१०३॥

मेरे गुन अंग सब खड़े होसी, अरचासी आकार । बुध वासना जगावसी, तिन याद होसी संसार ॥१०४॥

बुध तारतम लेयके, पसरसी वैराट के अंग । अछर हिरदे या बिध, अधिक चढ़सी रंग ॥१०५॥

॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥७२४॥

इसी सन्दर्भ में देखें-