कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण २४
निज बुध भेली नूर में, अग्या मिने अंकूर । दया सागर जोस का, किन रहे न पकरयो पूर ॥१॥
ए लीला है अति बड़ी, आई या इंड मांहें । कई हुए कई होएसी, पर किन ब्रह्मांडों नांहें ॥२॥
ए अगम अकथ अलख, सो जाहेर करें हम । पर नेक नेक प्रकासहीं, जिन सेहे न सको तुम ॥३॥
जो कबूं कानो ना सुनी, सो सुनते जीव उरझाए । ताथें डरती मैं कहूं, जानूं जिन कोई गोते खाए ॥४॥
नातो सब जाहेर करूं, नाहीं तुम सों अंतर । खेंच खेंच तो केहेती हूं, सो तुमारी खातिर ॥५॥
तुम दुख पाया मुझे सालहीं, अब सुख सब तुम हस्तक । दिया तुमारा पावहीं, दुनियां चौदे तबक ॥६॥
अजूं केहेती सकुचों, पर बोहोत बड़ी है बात । सोभा पाई तुम याथें बड़ी, जो पिया वतन साख्यात ॥७॥
इंड अखंड भी जाहेर, किए जागनी जोत । अब सुन्य फोड़ आगे चली, जहां थें इंड पैदा होत ॥८॥
सोभा इन मंडल की, क्यों कर कहूं वचन । सो बुध नूर जाहेर करी, जो कबूं सुनी न कही किन ॥९॥
रास बरनन भी ना हुआ, तो अछर बरनन क्यों होए । कही न जाए हद में, पर तो भी कहूं नेक सोए ॥१०॥
जोगमाया तो माया कही, पर नेक न माया इत । ख्वाबी दम सत होवहीं, सो अछर की बरकत ॥११॥
ताथें कालमाया जोगमाया, दोऊ पल में कई उपजत । नास करे कई पल में, या चित्त थिर थापत ॥१२॥
तहां एक पलक न होवहीं, इत कई कल्प वितीत । कई इंड उपजे होए फना, ऐसे पल में इन रीत ॥१३॥
जागते ब्रह्मांड उपजे, पाव पल में अनेक । सो देखे सब इत थें, बिध बिध के विवेक ॥१४॥
ए लीला है अति बड़ी, दृष्टें उपजे ब्रह्मांड । ए खेल खेले नित नए, याकी इछा है अखंड ॥१५॥
ए मंडल है सदा, जाए कहिए अछर । जाहेर इत थें देखिए, मिने बाहेर थें अंतर ॥१६॥
उतपन देखी इंड की, न अंतर रत्ती रेख । सत वासना असत जीव, सब विध कही विवेक ॥१७॥
मोह उपज्यो इतथें, जो सुन्य निराकार । पल मीच ब्रह्मांड किया, कारण कारन सार ॥१८॥
मोह अग्यान भरमना, करम काल और सुंन । ए नाम सारे नींद के, निराकार निरगुन ॥१९॥
मन पोहोंचे इतलो, बुध तुरिया वचन । उनमान आगे केहेके, फेर पड़े मांहे सुंन ॥२०॥
जो जीव होसी सुपन के, सो क्यों उलंघे सुंन । वासना सुन्य उलंघ के, जाए पोहोंचे अछर वतन ॥२१॥
ए सबे तुम समझियो, वासना जीव विगत । झूठा जीव नींद न उलंघे, नींद उलंघे वासना सत ॥२२॥
सुपने नगरी देखिए, तिन सब में एक रस । आपै होवे सब में, पांचों तत्व दसो दिस ॥२३॥
तिनमें भी दोए भांत है, एक वासना दूजे जीव । संसा न राखूं किनका, मैं सब जाहेर कीव ॥२४॥
देखो सुपनमें कई लड़ मरें, सबे आपे पर ना दुखात । जब देखें मारते आपको, तब उठे अंग धुजात ॥२५॥
वासना उतपन अंग थें, जीव नींद की उतपत । कोई ना छोड़े घर अपना, या बिध सत असत ॥२६॥
ब्रह्मांड चौदे तबक, सब सत का सुपन । इन दृष्टांतें समझियो, विचारो वासना मन ॥२७॥
सुपन सत सरूप को, तुम कहोगे क्यों कर होए । ए बिध सब जाहेर करूं, ज्यों रहे न धोखा कोए ॥२८॥
एक तीर खेंच के छोड़िए, तिन बेधाए कई पात । सो पात सब एक चोटें, पाव पल में बेधात ॥२९॥
पर पेहेले पात एक बेध के, तो दूजा बेधाए । यामें सुपन कई उपजें, बेर एती भी कही न जाए ॥३०॥
तो बेर एक की कहा कहूं, इत हुआ कहां सुपन । पर सत ठौर का असत में, दृष्टांत नहीं कोई अन ॥३१॥
इत भेले रूह नूर बुध, और अग्या दया प्रकास । पूरों आस अछर की, मेरा सुख देखाए साख्यात ॥३२॥
इत भी उजाला अखंड, पर किरना न इत पकराए । ए नूर सब एक होए चल्या, आगूं अछरातीत समाए ॥३३॥
ए नूर आगे थें आइया, अछर ठौर के पार । ए सब जाहेर कर चल्या, आया निज दरबार ॥३४॥
वतन देखाया इत थें, सो केते कहूं प्रकार । नूर अखंड ऐसा हुआ, जाको वार न काहूं पार ॥३५॥
किए विलास अंकूर थें, घर के अनेक प्रकार । पिया सुंदरबाई अंग में, आए कियो विस्तार ॥३६॥
ए बीज वचन दो एक, पिया बोए कियो प्रकास । अंकूर ऐसा उठिया, सब किए हाँस विलास ॥३७॥
सूर ससि कई कोट कहूं, नूर तेज जोत प्रकास । ए सब्द सारे मोहलों, और मोह को तो है नास ॥३८॥
अब इन जुबां मैं क्यों कहूं, निज वतन विस्तार । सब्द ना कोई पोहोंचहीं, मोह मिने हुआ आकार ॥३९॥
मोह सो जो ना कछू, इनसे असंग बेहद । सत को असत ना पोहोंचहीं, या बिध ना लगे सब्द ॥४०॥
बेहद को सब्द ना पोहोंचहीं, तो क्यों पोहोंचे दरबार । लुगा न पोहोंच्या रास लों, इन पार के भी पार ॥४१॥
कोट हिस्से एक लुगे के, हिसाब किया मिहीं कर । एक हिस्सा न पोहोंच्या रास लों, ए मैं देख्या फेर फेर ॥४२॥
मैं अंगे रंगे अंगना संगे, करूं आप अपनी बात । अब बोलते सरमाऊं, ताथें कही न जाए निध साख्यात ॥४३॥
वतन बातें केहेवे को, मैं देखती नहीं कोई काहूं । देखां तो जो होए दूसरा, नहीं गांउं नांउं न ठांऊं ॥४४॥
जहां नहीं तहां है कहे, ए दोऊ मोह के वचन । ताथें विस्तार अन्दर, बाहेर होत हूं मुंन ॥४५॥
एता भी मैं तो कह्या, जो साथ को भरम का घैन । वचन दो एक केहेके, टालूं सो दुतिया चैन ॥४६॥
साथ के सुख कारने, इंद्रावती को मैं कह्या । ताथें मुख इंद्रावती के, कलस सबन का भया ॥४७॥
॥ प्रकरण ॥२४॥ चौपाई ॥७७१॥
प्रकरण तथा चौपाइयों का संपूर्ण संकलन
प्रकरण १७२, चौपाई ४६६९
॥ कलस हिन्दुस्तानी - तौरेत सम्पूर्ण ॥
