कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण ३
विरह तामस का प्रकरण - राग सिंधूड़ो कड़खा
मैं चाहत न स्वांत इन भांत, अजूं आउध अंग चले, इन नैनों दोनों नेक न आवे नीर । दरद देहा जरद गरद रद करे, मैं क्यों धरूं धीर अस्थिर सरीर ॥१॥
कठिन निपट विकट घाटी प्रेम की, त्रबंक बंको सूरो किनों न अगमाए । धार तरवार पर सचर सिनगार कर, सामी अंग सांगा रोम रोम भराए ॥२॥
सागर नीर खारे लेहेरां मार मारे फिरें, बेटो बीच बेसुध पछाड़ खावे । खेलें मछ मिले गलें ले उछाले, संधो संध बंधे अंधों यों जो भावे ॥३॥
दाहो दसे दसों दिस सबे धखे, लाल झालां चले इंड न झलाए । फोड़ आकास फिरे सिर सिखरों, ए फलंग उलंघ संग खसम मिलाए ॥४॥
घाट अवघाट सिलपाट अति सलवली, तहां हाथ ना टिके पपील पाए । वाओ वाए बढ़े आग फैलाए चढ़े, जले पर अनलें ना चले उड़ाए ॥५॥
पेहेन पाखर गज घंट बजाए चल, पैठ सकोड़ सुई नाके समाए । डार आकार संभार जिन ओसरे, दौड़ चढ़ पहाड़ सिर झांप खाए ॥६॥
बोहोत बंध फंद धंध अजूं कई बीच में, सो देखे अलेखे मुख भाख न आवे । निराकार सुन्य पार के पार पिउ वतन, इत हुकम हाकिम बिना कौन आवे ॥७॥
मन तन वचन लगे तिन उतपन, आस पिया पास बांध्यो विस्वास । कहे महामती इन भांत तो रंग रती, दई पिया अग्या जाग करूं विलास ॥८॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥१००॥
