कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण ४
राग श्री सामेरी
पिया मोहे स्वांत न आवहीं, ना कछू नैनों नीर । पिया बिना पल जो जात है, अहनिस धखे सरीर ॥१॥
सब अंग अगनी जलके, जात उड़े ज्यों गरद । क्यों इत स्वांत जो आवहीं, जित दुलहे का दरद ॥२॥
हाड़े हाड़ पिसात हैं, चकी बीच जिन भांत । आराम ना जीवरा होवहीं, तो क्यों कर उपजे स्वांत ॥३॥
सब अंग सारन होए के, सारे सकल संधान । अपनी इंद्री आप को, उलट लगी है खान ॥४॥
उड़ी जो नींद अंदर की, पड़त न क्यों ही चैन । प्यारी पिउ के दरस की, कब देखूं मुख नैन ॥५॥
पिया बिन कछुए न भावहीं, जानूं कब सुनों पिया बैन । जोलों पिउ मुझे ना मिले, तोलों तलफत हों दिन रैन ॥६॥
घाटी टेढ़ी सकड़ी, तीखी खांडा धार । रोम रोम सांगा सामिया, तामें चढूं कर सिनगार ॥७॥
नीर खारे भवसागर, और लेहेरां मारे मार । बेटो बीच पछाड़हीं, वार न काहूं पार ॥८॥
तान तीखे आड़े उलटे, और लेत भमरियां जल । मिने मछ लड़ाइयां, यामें लेवें सारे निगल ॥९॥
ए दुनी दिल अंधी दिवानी, और बंधी संधों संध । हाथों हाथ न सूझहीं, तिमर तो या सनंध ॥१०॥
धखत दाह दसो दिस, झालां इंड न समाए । फोड़ आकास पर फिरे, किन जाए ना उलंघी ताए ॥११॥
घाट पाट अति सलवली, तहां हाथ न टिके पपील पाए । पवने अगनी पर जले, किन चढ़यो न उड़यो जाए ॥१२॥
इत चल तूं हस्ती होए के, पेहेन पाखर गज घंट बजाए । पैठ सकोड़ सुई नाके मिने, जिन कहूं अंग अटकाए ॥१३॥
दीजे न आल आकार को, पिउ मिलना अंग इन । दौड़ चढ़ पहाड़ झांप खा, कायर होवे जिन ॥१४॥
बोहोत फंद बंध धंध कई, कई कोटान लाखों लाख । अंदर नजरों आवही, पर मुख न देवे भाख ॥१५॥
आड़े चौदे तबक मोह, निराकार निरंजन । याके पार पोहोंचना, इन पार पिउ वतन ॥१६॥
पाँउ चले ना पर उड़े, बीच तो ऐसे पंथ । पर ए सब तोलों देखिए, जोलों ना दृष्टें कंथ ॥१७॥
आतम बंधी आस पिया, मन तन लगे वचन । कहे महामती कौन आवहीं, इत हुकम खसम के बिन ॥१८॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥११८॥
