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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण ५

विरह के प्रकरण - राग देसांकी

तलफे तारूनी रे, दुलही को दिल दे । सनमंध मूल जानके रे, सेज सुरंगी पर ले ॥१॥

सब तन विरहे खाइया, गल गया लोहू मांस । न आवे अंदर बाहेर, या विध सूकत स्वांस ॥२॥

हाड़ हुए सब लकड़ी, सिर श्रीफल विरह अगिन । मांस मीज लोहू रगां, या विध होत हवन ॥३॥

रोम रोम सूली सुगम, खंड खंड खांडा धार । पूछ पिया दुख तिनको, जो तेरी विरहिन नार ॥४॥

ए दरद जाने सोई, जिन लगे कलेजे घाव । ना दारू इन दरद का, फेर फेर करे फैलाव ॥५॥

ए दरद तेरा कठिन, भूखन लगे ज्यों दाग । हेम हीरा सेज पसमी, अंग लगावे आग ॥६॥

विरहिन होवे पिउ की, वाको कोई ना उपाए । अंग अपने वैरी हुए, सब तन लियो है खाए ॥७॥

ए लछन तेरे दरद के, ताए गृह आँगन न सुहाए । रतन जड़ित जो मंदिर, सो उठ उठ खाने धाए ॥८॥

ना बैठ सके विरहनी, सोए सके ना रोए । राजप्रथी पाँउ दाब के, निकसी या विध होए ॥९॥

विरहा ना देवे बैठने, उठने भी ना दे । लोट पोट भी ना कर सके, हूक हूक स्वांस ले ॥१०॥

आठों जाम विरहनी, स्वांस लिए हूक हूक । पत्थर काले ढिग हुते, सो भी हुए टूक टूक ॥११॥

एह विध मोहे तुम दई, अपनी अंगना जान । परदा बीच टालने, ताथें विरहा परवान ॥१२॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥१३०॥

इसी सन्दर्भ में देखें-