कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण ६
राग धना मेवाड़
विरहा गत रे जाने सोई, जो मिलके बिछुरी होए, मेरे दुलहा । ज्यों मीन बिछुरी जलथें, या गत जाने सोए, मेरे दुलहा । विरहनी विलखे तलफे तारूनी, तारूनी तलफे कलपे कामनी ॥१॥
बिछरो तेरो वल्लभा, सो क्यों सहे सुहागिन । तुम बिना पिंड ब्रह्मांड, हो गई सब अगिन ॥२॥
विरहा जाने विरहनी, वाके आग ना अंदर समाए । सो झालां बाहेर पड़ी, तिन दियो वैराट लगाए ॥३॥
विरहा ना छूटे वल्लभा, जो पड़े विघन अनेक । पिंड ना देखों ब्रह्मांड, देखो दुलहा अपनो एक ॥४॥
विरहनी विरहा बीच में, कियो सो अपनों घर । चौदे तबक की साहेबी, सो वारूं तेरे विरहा पर ॥५॥
आंधी आई विरह की, तिन दियो ब्रह्मांड उड़ाए । विरहिन गिरी सो उठ ना सकी, मूल अंकूर रही भराए ॥६॥
विरहा सागर होए रहया, बीच मीन विरहनी नार । दौड़त हों निसवासर, कहूं बेट ना पाऊं पार ॥७॥
॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥१३७॥
