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विषय-सूची

कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण ७

राग सोख मलार

इस्क बड़ा रे सबन में, ना कोई इस्क समान । एक तेरे इस्क बिना, उड़ गई सब जहान ॥१॥

चौदे तबक हिसाब में, हिसाब निरंजन सुंन । न्यारा इस्क हिसाब थें, जिन देख्या पिउ वतन ॥२॥

लोक अलोक हिसाब में, हिसाब जो हद बेहद । न्यारा इस्क जो पिउ का, जिन किया आद लों रद ॥३॥

एक अनेक हिसाब में, और निराकार निरगुन । न्यारा इस्क हिसाब थें, जो कछू ना देखे तुम बिन ॥४॥

और इस्क कोई जिन कथो, इस्कें ना पोहोंच्या कोए । इस्क तहां जाए पोहोंचिया, जहां सुन्य सब्द ना होए ॥५॥

नाहीं कथनी इस्क की, और कोई कथियो जिन । इस्क तो आगे चल गया, सब्द समाना सुंन ॥६॥

सब्द जो सूकया अंग में, हले नहीं हाथ पाए । इस्क बेसुध न करे, रही अंदर बिलखाए ॥७॥

पांपण पल ना लेवही, दसो दिस नैन फिराऊं । देह बिना दौड़ो अन्दर, पिया कित मिलसी कहां जाऊं ॥८॥

इस्क को ए लछन, जो नैनों पलक ना ले । दौड़े फिरे न मिल सके, अन्दर नजर पिया में दे ॥९॥

नजरों निमख ना छूटहीं, तो नाहीं लागत पल । अन्दर तो न्यारा नहीं, पर जाए न दाह बिना मिल ॥१०॥

जो दुख तुमहीं विछुरे, मोहे लाग्यो जो तासों प्यार । एता सुख तेरे विरह में, तो कौन सुख होसी विहार ॥११॥

॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥१४८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-