कलस हिन्दुस्तानी - प्रकरण ९
विरह को प्रकास - राग आसावरी
एह बात मैं तो कहूं, जो कहने की होए । पर ए खसमें रीझ के, दया करी अति मोहे ॥१॥
सुनियो बानी सुहागनी, दीदार दिया पिउ जब । अंदर परदा उड़ गया, हुआ उजाला सब ॥२॥
पिया जो पार के पार हैं, तिन खुद खोले द्वार । पार दरवाजे तब देखे, जब खोल देखाया पार ॥३॥
कर पकर बैठाए के, आवेस दियो मोहे अंग । ता दिन थें पसरी दया, पल पल चढ़ते रंग ॥४॥
हुई पेहेचान पिउसों, तब कह्यो महामती नाम । अब मैं हुई जाहेर, देख्या वतन श्री धाम ॥५॥
बात कही सब वतन की, सो निरखे मैं निसान । प्रकास पूरन दृढ़ हुआ, उड़ गया उनमान ॥६॥
आपा मैं पेहेचानिया, सनमंध हुआ सत । ए मेहेर कही न जावहीं, सब सुध परी उतपत ॥७॥
मुझे जगाई जुगतसों, सुख दियो अंग आप । कंठ लगाई कंठसों, या विध कियो मिलाप ॥८॥
खासी जान खेड़ी जिमी, जल सींचिया खसम । बोया बीज वतन का, सो ऊग्या वाही रसम ॥९॥
बीज आतम संग निज बुध के, सो ले उठिया अंकूर । या जुबां इन अंकूर को, क्यों कर कहूं सो नूर ॥१०॥
नातो ए बात जो गुझ की, सो क्यों होए जाहेर । सोहागिन प्यारी मुझ को, सो कर ना सकों अंतर ॥११॥
नेक कहूं या नूर को, कछुक इसारत अब । पीछे तो जाहेर होएसी, तब दुनी देखसी सब ॥१२॥
ए जो विरहा बीतक कही, पिया मिले जिन सूल । अब फेर कहूं प्रकास थें, जासों पाइए माएने मूल ॥१३॥
ए विरहा लछन मैं कहे, पर नाहीं विरहा ताए । या विध विरह उदम की, जो कोई किया चाहे ॥१४॥
विरह सुनते पिउ का, आह ना उड़ गई जिन । ताए वतन सैयां यों कहें, नाहीं न ए विरहिन ॥१५॥
जो होवे आपे विरहनी, सो क्यों कहे विरहा सुध । सुन विरहा जीव ना रहे, तो विरहिन कहां थें बुध ॥१६॥
पतंग कहे पतंग को, कहां रह्या तूं सोए । मैं देख्या है दीपक, चल देखाऊं तोहे ॥१७॥
के तो ओ दीपक नहीं, या तूं पतंग नाहें । पतंग कहिए तिनको, जो दीपक देख झंपाए ॥१८॥
पतंग और पतंग को, जो सुध दीपक दे । तो होवे हांसी तिन पर, कहे नाहीं पतंग ए ॥१९॥
दीपक देख पीछा फिरे, साबित राखे अंग । आए देवे सुध और को, सो क्यों कहिए पतंग ॥२०॥
जब मैं हुती विरह में, तब क्यों मुख बोल्यो जाए । पर ए वचन तो तब कहे, जब लई पिया उठाए ॥२१॥
ज्यों ए विरहा उपज्या, ए नहीं हमारा धरम । विरहिन कबहूं ना करे, यों विरहा अनूकरम ॥२२॥
विरहा नहीं ब्रह्मांड में, बिना सोहागिन नार । सोहागिन आतम पिउ की, वतन पार के पार ॥२३॥
अब कहूं नेक अंकूर की, जाए कहिए सोहागिन । सो विरहिन ब्रह्मांड में, हुती ना एते दिन ॥२४॥
सोई सुहागिन आइयां, खसम की विरहिन । अंतरगत पिया पकरी, ना तो रहे ना तन ॥२५॥
ए सुध पिया मुझे दई, अन्दर कियो प्रकास । तो ए जाहेर होत है, जो गयो तिमर सब नास ॥२६॥
प्यारी पिया सोहागनी, सो जुबां कही न जाए । पर हुआ जो मुझे हुकम, सो कैसे कर ढंपाए ॥२७॥
अनेक करहीं बंदगी, अनेक विरहा लेत । पर ए सुख तिन सुपने नहीं, जो हमको जगाए के देत ॥२८॥
छलथें मोहे छुड़ाए के, कछू दियो विरहा संग । सो भी विरहा छुड़ाइया, देकर अपनों अंग ॥२९॥
अंग बुध आवेस देए के, कहे तूं प्यारी मुझ । देने सुख सबन को, हुकम करत हों तुझ ॥३०॥
दुख पावत हैं सोहागनी, सो हम सह्यो न जाए । हम भी होसी जाहेर, पर तूं सोहागनियां जगाए ॥३१॥
सिर ले आप खड़ी रहो, कहे तूं सब सैयन । प्रकास होसी तुझ से, दृढ़ कर देखो मन ॥३२॥
तोसों ना कछू अन्तर, तूं है सोहागिन नार । सत सब्द के माएने, तूं खोलसी पार द्वार ॥३३॥
जो कदी जाहेर न हुई, सो तुझे होसी सुध । अब थें आद अनाद लों, जाहेर होसी निज बुध ॥३४॥
सब ए बातें सूझसी, कहूं अटके नहीं निरधार । हुकम कारन कारज, पार के पारै पार ॥३५॥
चौदे तबक एक होएसी, सब हुकम के प्रताप । ए सोभा होसी तुझे सोहागनी, जिन जुदी जाने आप ॥३६॥
जो कोई सब्द संसार में, अर्थ ना लिए किन कब । सो सब खातिर सोहागनी, तूं अर्थ करसी अब ॥३७॥
तूं देख दिल विचार के, उड़ जासी सब असत । सारों के सुख कारने, तूं जाहेर हुई महामत ॥३८॥
पेहेले सुख सोहागनी, पीछे सुख संसार । एक रस सब होएसी, घर घर सुख अपार ॥३९॥
ए खेल किया जिन खातिर, सो तूं कहियो सोहागिन । पेहेले खेल दिखाए के, पीछे मूल वतन ॥४०॥
अंतर सैयों से जिन करे, जो सैयां हैं इन घर । पीछे चौदे तबक में, जाहिर होसी आखिर ॥४१॥
तें कहे वचन मुख थें, होसी तिनथें प्रकास । असत उड़सी तूल ज्यों, जासी तिमर सब नास ॥४२॥
तूं लीजे नीके माएने, तेरे मुख के बोल । जो साख देवे तुझे आतमा, तो लीजे सिर कौल ॥४३॥
खसम खड़ा है अंतर, जेती सोहागिन । तूं पूछ देख दिल अपना, कर कारज दृढ़ मन ॥४४॥
आप खसम अजूं गोप है, आगे होत प्रकास । उदया सूर छिपे नहीं, गयो तिमर सब नास ॥४५॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥२०४॥
