खिलवत - प्रकरण १
किताब खिलवत गैब की सूरत अर्ज की जो हकसों करी है
ऐसा खेल देखाइया, जो मांग लिया है हम । अब कैसे अर्ज करूं, कहोगे मांग्या तुम ॥१॥
कछु आस न राखी आसरो, ए झूठी जिमी देखाए । ऐसी जुदागी कर दई, कछू कहयो सुन्यो न जाए ॥२॥
बैठी अंग लगाए के, ऐसी करी अन्तराए । ना कछू नैनों देखत, ना कछू आप ओलखाए ॥३॥
बैठी अंग लगाए के, ऐसी दई उलटाए । न कछू दिल की केहे सकों, न पिया सब्द सुनाए ॥४॥
बैठी आंखें खोल के, अंग सों अंग जोड़ । आसा उपजे अर्ज को, सो भी दई मोहे तोड़ ॥५॥
सदा सुख दाता धाम धनी, अंगना तेरी जोड़ । जानो सनमंध कबूं ना हुतो, ऐसा किया बिछोड़ ॥६॥
बैठी सदा चरन तले, कबूं न्यारी ना निमख नेस । पाइए न नाम ठाम दिस कहूं, ऐसा दिया विदेस ॥७॥
बैठी तले कदम के, बीच डारे चौदे तबक । दूर-दराज ऐसी करी, कहूं नजीक न पाइए हक ॥८॥
बैठी तले कदम के, ऐसी करी परदेसन । ले डारी ऐसी जुदागी, रहया हरफ न नुकता इन ॥९॥
बैठी हों आगे तुम, जानूं अर्ज करूं कर जोड़ । सो उमेद कछू ना रही, कोई ऐसो दियो दिल मोड़ ॥१०॥
ऐसी दई उलटाय के, बैठी हों कदम के पास । दरद न कहयो जाय दिल को, उमेद न रही कछू आस ॥११॥
बैठी तले कदम के, मेरो ए घर धाम धनी । ए सुख देखाए जगावत, तो भी होत नहीं जागनी ॥१२॥
बैठी इन मेले मिने, ए घर धनी सुख अखंड । आस न केहेन सुनन की, जानो बीच पड़यो ब्रह्मांड ॥१३॥
धनी धाम सुख बतावत, ए धनी सुख अखंड । आप दया बतावत अपनी, आड़े दे ब्रह्मांड पिंड ॥१४॥
जगावत कई जुगतें, दई कई विध साख गवाहे । बैठावत सुख अखंड में, तो भी जेहेर जिमी छोड़ी न जाए ॥१५॥
धनी मैं तो सूती नींद में, तुम बैठे हो जाग्रत । खेल भी तुम देखावत, बल मेरो कछू ना चलत ॥१६॥
बल बुध न रही कछू उमेद, मेरो कोई अंग चलत नाहें । ऐसी उरझाई इन खेल में, एक आस रही तुम माहें ॥१७॥
और आसा उमेद कछू ना रही, और रख्या ना कोई ठौर । एता दृढ़ तुम कर दिया, कोई नाहीं तुम बिना और ॥१८॥
बल बुध आसा उमेद, ए तुम राखी तुम पर । मुझ में मेरा कछू ना रहया, अब क्या कहूं क्योंकर ॥१९॥
स्यामाजीएँ मोहे सुध दई, तब मैं जानी न सगाई सनमंध । सुध धनी धाम न आपकी, ऐसी थी हिरदे की अंध ॥२०॥
तब जानों इन बात की, कोई देवे दूजा साख । सो हलके हलके देत गए, मैं साख पाई कई लाख ॥२१॥
मैं हुती बीच लड़कपने, तब कछुए न समझी बात । मोहे सब कही सुध धाम की, भेख बदल आए साख्यात ॥२२॥
सोई वचन मेरे धनीय के, हाथ कुंजी आई दिल को । उरझन सारे ब्रह्मांड के, मैं सुरझाऊं इन सों ॥२३॥
पेहेले पाल न सकी सगाई, ना कर सकी पेहेचान । पर हम बीच खेल के, कई पाए धनी धाम निसान ॥२४॥
कई साखें बीच कागदों, मुझ पर आया फुरमान । इनमें इसारतें रमूजें, सो मैं ही पाऊं पेहेचान ॥२५॥
मेरे धनी की इसारतें, कोई और न सके खोल । सो भी आतम ने यों जानिया, ए जो स्यामाजी कहे थे बोल ॥२६॥
ए सुध हुई त्रैलोक को, सबों जान्या इनों घर धाम । मोहे बैठाए बीच दुनी के, दिया ऐसा सुख आराम ॥२७॥
सो बातें मैं केती कहूं, मैं पाई बेसुमार । पर एक बात न सुनाई मुख की, अजूं न कछू देत दीदार ॥२८॥
अब ऐसा दिल में आवत, जेता कोई थिर चर । सब केहेसी प्रेम धनीय का, कछू बोले ना इन बिगर ॥२९॥
ऐसा आगूं होएसी, आतम नजरों भी आवत । जानों बात सुनों मैं धनीय की, पर मोहे अजूं बिलखावत ॥३०॥
ना कछू देखूं दरसन, ना कछू केहेने की आस । ना कछू सुध सनमंध की, बैठी हों कदम के पास ॥३१॥
धनी एती भी आसा ना रही, जो करूं तुमसों बात । ना बात तुमारी सुन सकों, ना देखूं तुमें साख्यात ॥३२॥
एह धनी एह घर सुख, सनमंध दियो भुलाए । लगाव न रहयो एक रंचक, ताथें मेरो कछू न बसाए ॥३३॥
कहा करूं किन सों कहूं, ना जागा कित जाऊं । एता भी तुम दृढ़ कर दिया, तुम बिना ना कित ठांऊ ॥३४॥
ना कछू एता बल दिया, जो लगी रहूं पिउ चरन । पर ए सब हाथ खसम के, और पुकारूं आगे किन ॥३५॥
रोई तो भी जाहेर, पुकारी जोस खुमार । जो देते रंचक बातूनी, तो होती खबरदार ॥३६॥
अब केहेना तो भी तुमको, ठौर तो भी तुम । अंगना तो भी धनी की, तुम हो धनी खसम ॥३७॥
आसा उमेद धनी की, बल बुध ठौर धनी । पिंड न रहयो ब्रह्मांड, तुम ही में रही करनी ॥३८॥
जोर कर जुदागी कर दई, और जोर कर जगावत तुम । केहेनी सुननी मेरे कछू ना रही, तो क्यों बोलूं मैं खसम ॥३९॥
ऐसे कायम सुख के जो धनी, किन विध दई भुलाए । इन दुख में देखावत ए सुख, हिरदे तुम ही चढ़ाए ॥४०॥
ऐसे सुख अलेखे अखंड, भुलाए दिए माहें खिन । सुख देखत उनथें अधिक, पर आवे अग्याएं अंतस्करन ॥४१॥
खेल किया हुकम सों, हम आए हुकम । हुकमें दरसन देखावहीं, कछू ना बिना हुकम खसम ॥४२॥
हुकमें इस्क आवहीं, कदमों जगावे हुकम । करनी हुकम करावहीं, कछू ना बिना हुकम खसम ॥४३॥
हुकम उठावे हँसते, रोते उठावे हुकम । हार जीत दुख सुख हुकमें, कछू ना बिना हुकम खसम ॥४४॥
हुआ है सब हुकमें, होत है हुकम । होसी सब कछू हुकमें, कछू ना बिना हुकम खसम ॥४५॥
अब ज्यों जानो त्यों करो, कछू रहया न हमपना हम । इन झूठी जिमी में बैठ के, कहा कहूं तुमें खसम ॥४६॥
ए भी दृढ़ तुम कर दिया, सब कछू हाथ हुकम । कछू मेरा मुझ में ना रहया, ताथें कहा कहूं खसम ॥४७॥
जो कहूं कई कोट बेर, तो केहेना एता ही खसम । जब कछू तुम ही करोगे, तब केहेसी आए हम ॥४८॥
अब तो केहेना कछू ना रहया, ऐसी अंतराए करी खसम । जब तुम जगाए बैठाओगे, तब केहेसी आए हम ॥४९॥
हम में जो कछू रख्या होता, तो इत केहेते तुमको हम । सो तो कछुए ना रहया, अब कहा कहूं खसम ॥५०॥
भला जो कछू जान्या सो किया, इन झूठी जिमी में आए । जब कछू उमेद देओगे, तब कहूंगी आस लगाए ॥५१॥
तुम किया होसी हम कारने, पर ए झूठी जिमी निरास । ऐसा दिल उपजे पीछे, क्यों ले मुरदा स्वांस ॥५२॥
एक आह स्वांस क्यों ना उड़े, सो भी हुआ हाथ धनी । बात कही सो भी एक है, जो कहूं इन थें कोट गुनी ॥५३॥
महामत कहे मैं सरमिंदी, सब अवसर गई भूल । ऐसी इन जुदागी मिने, क्यों कहूं करो सनकूल ॥५४॥
॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥५४॥
