खिलवत - प्रकरण २
मैं खुदी काढ़े का इलाज
हम लिए कौल खुदाए के, हक के जो परवान । लई कई किताबें साहेदियां, कई हदीसें फुरमान ॥१॥
कई साखें सास्त्रन की, कई साखें साधों की बान । ए ले ले रूह को दृढ़ करी, आखिर वसीयत नामें निदान ॥२॥
जाहेर बाहेर बातून, अंदर अन्तर तुम । कहूं जरे जेती जाएगा, नहीं खाली बिना खसम ॥३॥
सब ठौरों सुध तुमको, कछू छूट न तुम इलम । ए सक मेट बेसक तुम करी, कछू न बिना हुकम खसम ॥४॥
जरा न हुकम सुध बिना, सबन के दम दम । साइत ना खाली पाइए, बिना हुकम खसम ॥५॥
एते दिन मैं यों जान्या, मैं बैठी नाहीं के माहें । तो इत का संदेसा, हक को पोहोंचत नाहें ॥६॥
सो तेहेकीक तुम कर दिया, जो खेल नूर से उपजत । इलम खुदाई हुकम बिना, कहूं खाली न पाइए कित ॥७॥
सांच झूठ बड़ी तफावत, ज्यों नाहीं और है । सो हुकमे खेल बनाए के, सत गिरो को देखावें ॥८॥
बनाए कबूतर खेल के, ज्यों देखावे दुनियां को । यों देखावें सत गिरो को, ए जो पैदा कुंन सों॥९॥
हम बैठे वतन कदम तले, तहां बैठे खेल देखत । तित ख्वाब से संदेसा, तुमें क्यों ना पोहोंचत ॥१०॥
ए इलम हकें दिया, किया नाहीं थें मुकरर हक । रूहअल्ला महंमद मेहेर थें, कहूं जरा न रही सक ॥११॥
हम बैठे लैलत-कदर में, संदेसा पोहोंचावें तुम । इलम सूरत हमारी रूह की, पोहोंची चाहिए खसम ॥१२॥
ए तेहेकीक तुम कर दिया, मैं तो बैठी बीच नाहें । इन विध खेल खेलावत, हक नाहीं के माहें ॥१३॥
अब धनी जानो त्यों करो, पर इत कहूं कहूं रूह तरसत । कोई कोई चाह जो उठत है, सो हकै उपजावत ॥१४॥
मैं तो बीच नाहीं के, मोहे खेल देखाया जड़ मूल । ताथें जानो त्यों करो, सरमिंदी या सनकूल ॥१५॥
अब क्या करूं किन सों कहूं, कोई रहया न केहेवे ठौर । ए भी कहावत तुमहीं, कोई नाहीं तुम बिना और ॥१६॥
बिन फुरमाए हक के, दिल जरा न उपजत । तो क्यों दिल ऐसा आवत, जो हक मांग्या ना देवत ॥१७॥
हक उपजावत देवे को, सो हकै देवनहार । मैं दोष हक का देख के, क्यों होत गुन्हेगार ॥१८॥
उपजे उपजावे सब हक, हक देवें दिलावें । मैं जो करत गुन्हेगारी, सो बीच काहे को आवे ॥१९॥
हकें पोहोंचाई इन मजलें, और दोष हक को देवत । एही मैं मारी चाहिए, जो बीच करे हरकत ॥२०॥
मैं तो बीच नाहीं मिने, सो हक को पोहोंचत नाहें । सो बीच दिल के बैठ के, गुनाह देत रूह के तांए ॥२१॥
मैं मैं करत मरत नहीं, और हक को लगावे दोस । अब मेहेर हक ऐसी करें, जो इन मैं थें होऊं बेहोस ॥२२॥
झूठ न भेदे सांच को, सांच अंग सत साबित । बाहेर उपली अंधेर देखाए के, होए जात असत ॥२३॥
ए जो फना सब झूठ है, जो ऊपर से देखाया । सो क्यों भेदे हक को, जो नाहीं असत माया ॥२४॥
सत को सत भेदत है, बीच झूठ के हक । ए सन्देसा तब पोहोंचही, जब रूह निपट होए बेसक ॥२५॥
ए सांच सन्देसा हक को, तोलों ना पोहोंचत । गेहेरा जल है मैंय का, आड़ा जो असत ॥२६॥
सो मैं मैं झूठी दिल पर, जब लग करे कुफर । सत सन्देसा तौहीद को, तोलों पोहोंचे क्यों कर ॥२७॥
ए मैं मैं क्यों ए मरत नहीं, और कहावत है मुरदा । आड़े नूर-जमाल के, एही है परदा ॥२८॥
ए पट नीके पाइया, जो मैं को उड़ावे कोए । ए दृढ़ हकें कर दिया, अब जुदा हक से होए ॥२९॥
मारा कहया काढ़ा कहया, और कहया हो जुदा । एही मैं खुदी टले, तब बाकी रहया खुदा ॥३०॥
पेहेले पी तूं सरबत मौत का, कर तेहेकीक मुकरर । एक जरा जिन सक रखे, पीछे रहो जीवत या मर ॥३१॥
एही पट आड़े तेरे, और जरा भी नाहें । तो सुख जीवत अर्स का, लेवे ख्वाब के माहें ॥३२॥
ए सुन्या सीख्या पढ़या, कहया विचारया विवेक । अब जो इस्क लेत है, सो भी और उड़ाए पावने एक ॥३३॥
तो सोहोबत तेरी सत हुई, सांचा तूं मोमिन । सब बड़ाइयां तुझ को, जो पोहोंचे मजल इन ॥३४॥
महामत कहे ए मोमिनों, सुनो मेरे वतनी यार । खसम करावे कुरबानियां, आओ मैं मारे की लार ॥३५॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥८९॥
