खिलवत - प्रकरण ३
मैं बिन मैं मरे नही, मैं सों मारना मैं । किन विध मैं को मारिए, या विध हुई इनसे ॥१॥
और भी हकीकत मैंय की, जिन विध मरे जो ए । सो ए खसम बतावत, बल अपने इलम के ॥२॥
अब मैं मरत है इन विध, और न कोई उपाए । खुदाई इलम सों मारिए, जो हकें दिया बताए ॥३॥
जो मैं मारत अव्वल, तो कौन सुख लेता ए । है नाहीं के फरेब में, सुख नूर पार का जे ॥४॥
मैं दुनी की थी सो मर गई, इन मैं को मारया मैं । अब ए मैं कैसे मरे, जो आई है खसम से ॥५॥
मैं चल आई कदमों, ऐसा दिया बल तुम । इन विध मैं मरत है, ना कछू बिना खसम ॥६॥
जो मैं मारत आपको, तो आवत कौन कदम । मैं ना होने में कछू ना रहया, किया कराया खसम ॥७॥
ना मैं अव्वल ना आखिर, मैं नाहीं बीच में । बन्या बनाया आप ही, सो सब तुम हीं से ॥८॥
मैं तो तुमारी कीयल, अव्वल बीच और हाल । तुम बिना जो कछू देखत, सो सब मैं आग की झाल ॥९॥
जब लग मैं ना समझी, तब लग थी मैं मैं । समझे थें मैं उड़ गई, सब कछू हुआ तुम से ॥१०॥
अव्वल आखिर सब तुम, बीच में भी तुम । मैं खेली ज्यों तुम खेलाई, खसम के हुकम ॥११॥
इन मैं को तो तुम किया, आद मध्य और अब । और मैं तो नेहेचे नहीं, कितहूं न देखी कब ॥१२॥
केहेत केहेलावत तुम ही, करत करावत तुम । हुआ है होसी तुमसे, ए फल खुदाई इलम ॥१३॥
अब ए मैं जो हक की, खड़ी इलम हक का ले । चौदे तबक किए कायम, सो भी मैं है ए ॥१४॥
ए मैं है हक की, ए है हक का नूर । खास गिरो जगाए के, पोहोंचत हक हजूर ॥१५॥
ए मैं इन विध की, सो मैं मरे क्योंकर । पोहोंचे पोहोंचावे कदमों, जाग जगावे घर ॥१६॥
एही मैं है हुकम, एही मैं नूर जोस । एही मैं इलम हक का, एही मैं हक करे बेहोस ॥१७॥
हक चलाए चल हीं, हक बैठाए रहे बैठ । सोवे उठावे सब हक, नहीं हुकम आड़े कोई ऐंठ ॥१८॥
रोए हँसे हारे जीते, ईमान या कुफर । जरा न हुकम सुध बिना, बंदगी या मुनकर ॥१९॥
ए जो मैं हक की, सो भी निकसे हक हुकम । इन मैं में बंधन नहीं, बंधाए जो होवे हम ॥२०॥
हम बंधे बंधाए मिट गए, कछू रहया न हमपना हम । यों पोहोंचाई बका मिने, इन विध मैं को खसम ॥२१॥
अब सिर ले हुकम हक का, बैठी धनी की मैं । जरा इन में सक नहीं, इलम हक के सें ॥२२॥
जुदे सब थें इन विध, इन विध सब में एक । साँच झूठ के खेल में, ए जो बेवरा कहया विवेक ॥२३॥
हुकम जोस नूर खसम, मैं ले खड़ी इलम ए । ए पांचों काम कर हक के, पोहोंचे गिरो दोऊ ले ॥२४॥
ए सातों भए इन विध, पोहोंचे बका में जब । आप उठ खड़े हुए, पीछे खेल कायम किया सब ॥२५॥
मैं तो तेहेकीक न कछू, और न कछू मुझसे होए । ए मैं विध विध देखिया, इन मैं में खतरा न कोए ॥२६॥
मैं ना अव्वल ना बीच में, ना कछू मैं आखिर । किया कराया करत हैं, सो सब हक कादर ॥२७॥
ए तेहेकीक हकें कर दिया, हकें लई कदम । बुलाई अपना इलम दे, कर विध विध रोसन हुकम ॥२८॥
हकें गिरो बुलाई मोमिन, हकें कराई सोहबत । नूर पार वचन विध विध के, हकें दई नसीहत ॥२९॥
मैं नाहीं न जानों कछुए, मैं नाहीं जरा रंचक । हकें इलम जोस देय के, करी सो हुकमें हक ॥३०॥
हकें किया हक करत हैं, और हकै करेंगे । ए रूह को तेहेकीक भई, और नजरों भी देखे ॥३१॥
ए सब हक करत हैं, कौल फैल या हाल । और मुझ में जरा न देखिया, बिना नूर जमाल ॥३२॥
अब इन बीच में खतरा, हक न आवन दे । जिन दिल अर्स खावंद, तित क्यों कर कोई मूसे ॥३३॥
दूजा तो कोई है नहीं, ए जो माया मन दज्जाल । इलम देखे ए ना कछू, इत जरा नहीं जवाल ॥३४॥
जब हकें इलम ए दिया, तेहेकीक रूह को तुम । कर मनसा वाचा करमना, कोई ना बिना खसम हुकम ॥३५॥
ज्यों ज्यों एह विचारिए, त्यों तेहेकीक होता जाए । इत जरा नूर-जमाल बिना, रूह में कछू न समाए ॥३६॥
रूहें तन हादीय का, हादी तन हैं हक । नूर तन नूर-जमाल का, इत जरा नाहीं सक ॥३७॥
ए मैं तैं सब हक की, ए इलम अकल धनी । नूर जोस हुकम हक का, या विध है अपनी ॥३८॥
एह खेल हकें किया, आप भी संग इत आए । अर्स में बैठे देखाइया, ऐसा खेल बनाए ॥३९॥
भुलाए वतन आप खसम, खेल देखाए के जुदागी । मेहेर करी इन विध की, बैठे खेलै में जागी ॥४०॥
जगाए लई रूहें अपनी, कदमों जो असल । यामें संदेसा कहे, इत बैठे हैं सामिल ॥४१॥
इत ना मैं आई ना फिरी, ए तो हुकमें किया पसार । ए मैं हुकमें मैं करी, अब हुकम देत मैं मार ॥४२॥
जब लग मैं सुपने मिने, नहीं खसम पेहेचान । तब लग मैं सिर अपने, बोझ लिया सिर तान ॥४३॥
अब खसम ख्वाब की सुध परी, और सुध परी हुकम । तब मैं में जरा ना रही, मैं बैठी तले कदम ॥४४॥
इलम खुदाई ना होता, तो क्यों संदेसा पोहोंचत । नूर-तजल्ला के अन्दर की, कौन इसारतें खोलत ॥४५॥
सब मेयराज की इसारतें, कौन साहेदी कलमें देत । जो अर्स अरवाहें इत ना होती, तो मता खिलवत का कौन लेत ॥४६॥
चौथे आसमान लाहूत में, रूहअल्ला बसत । पेहेले बताई फुरकानें, सो मोमिन भेद जानत ॥४७॥
कुन्जी नूर के पार की, रूहअल्ला दई मुझ । केहे बातून मगज मुसाफ का, करों जाहेर जो है गुझ ॥४८॥
जो रखे रसूलें हुकमें, और सबन थें छिपाए । सो मोको कुंजी देय के, कौल पर जाहेर कराए ॥४९॥
तो गुनाह अर्स अजीम में, लिख्या सब मेयराज के माहें । करें जाहेर अर्स दिल मोमिन, जित जबराईल पोहोंच्या नाहें ॥५०॥
ए मैं बोले जो कछू, सो संदेसा रूहअल्ला जान । ए इलम हकीकत वतनी, कहूं हक बिना न पेहेचान ॥५१॥
हक पैगाम भेजत है, सो देत साहेदी कुरान । दे साहेदी खुदा खुदाए की, सो खुदाई करे बयान ॥५२॥
सो भी रूह साहेदी देत है, जो नूर-जलाल पास नाहें । सो रोसनी नूरजमाल की, लज्जत आवत मोमिनों माहें ॥५३॥
जब लग ख्वाब नजरों, तब लों देत देखाई यों कर । ना तो सुख नूर-जमाल को, बैठे लेवें कायम घर ॥५४॥
इलहाम आवत परदे से, सो नाहीं चौदे तबक । सो मोमिन इन ख्वाब में, लेत सुख बेसक ॥५५॥
झूठ न सुन्यो कबूं इत थें, जिन करो झूठी उमेद । ए गुझ हक के दिल का, आवत तुमको भेद ॥५६॥
आवत संदेसे परदे से, बीच गिरो मोमिन । क्यों ना विचारो अकल सों, कर पाक दिल रोसन ॥५७॥
इतथें अर्ज भेजत हैं, सो पोहोंचत हैं हक को । जो असल अकलें विचारिए, तो आवे दिल मों ॥५८॥
तेहेकीक अर्ज पोहोंचत है, जो भेजिए पाक दिल । ऐसी पोहोंचाई हक ने, दिल पोहोंचे मोहोल-असल ॥५९॥
ए जो पाक दिलें विचारिए, देखो आवत इलहाम ए । पर उपली नजरों न देखिए, ए जो पोहोंचत हकीकत जे ॥६०॥
आवत जात जो खबरें, सो परदे से देखत । बैठी तले कदम के, लेवत एह लज्जत ॥६१॥
महामत कहे मैं हक की, पोहोंची बका में । ए मैं असल अर्स की, ए मैं मोमिनों हक से ॥६२॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥१५१॥
