खिलवत - प्रकरण ४
ज्यों जानो त्यों रखो, धनी तुमारी मैं । ए केहेने को भी ना कछू, कहा कहूं तुमसे ॥१॥
कछू कछू दिल में उपजत, सो भी तुमहीं उपजावत । दिल बाहेर भीतर अंतर, सब तुम हीं हक जानत ॥२॥
जो लों रखी तुम होस में, तब लग उपजत ए । ए मैं मांगे तुमारी तुम पे, तुम मंगावत जे ॥३॥
मैं मांगत डरत हों, सो भी डरावत हो तुम । मैं मांगे तुमारी तुम पे, ना तो क्यों डरे अंगना खसम ॥४॥
हजरत ईसे मांगया, हक अपनायत कर । तिन पर ए गुनाह लिख्या, ए देख लगत मोहे डर ॥५॥
फुरमान देख के मैं डरी, देख रूहअल्ला पर गुना । ए खासी रूह खुदाए की, मोमिनों रहया न आसंका ॥६॥
तो डर बड़ा मोहे लगत, जो गुनाह कहया इन पर । माफक रूह अल्लाह के, कोई मरद नहीं बराबर ॥७॥
ए खावंद है अर्स अजीम का, हादी हमारा सोए । इस मानंद चौदे तबक में, हुआ न होसी कोए ॥८॥
मैं नेक बात याकी कहूं, पाक रूहों सुनो सब मिल । मैं की खुदी सखत है, ए लीजो देकर दिल ॥९॥
रूहअल्ला करी बन्दगी, तिन में उनकी मैं । तो गुनाह कहया इन पर, इन मैं मांग्या हक पे ॥१०॥
मेरे ना कछू बन्दगी, ना कछू करी करनी । ओ मैं मुझमें ना रही, ए तो मैं हकें करी अपनी ॥११॥
मैं थी बीच लड़कपने, धनी तुमारी पढ़ाएल । मेरे उमेद न आसा बंदगी, हक तुमारी निवाजल ॥१२॥
मैं जो मांगी बेखबरी, सो उमेद पूरी सब तुम । तब उस खुदी की मैं को, दिल चाहया दिया हुकम ॥१३॥
अब मांगूं सिर हुकम, हुज्जत लिए खसम । अब क्यों न होए सो उमेद, दिया हाथ हुकम ॥१४॥
खसम खसम तो करत हों, पर खसम न आवत भार । ना हुज्जत रूह अर्स की, तो होत ना दिल करार ॥१५॥
जो मांगूं हक जान के, अर्स रूह कर हुज्जत । तो तब हीं उमेद पोहोंचहीं, जो दिल में यों उपजत ॥१६॥
जैसा हक है सिर पर, तैसा तेहेकीक जानत नाहें । बिसर जात है नींद में, दृढ़ होत न ख्वाब के माहें ॥१७॥
जो मांग्या है ख्वाब में, सो हकें पूरा सब किया । सो बोहोत ना मोहे सुध परी, जो ख्वाब के मिने दिया ॥१८॥
जो मैं मांगूं जाग के, और जागे ही में पाऊं । तो कारज सब सिद्ध होवहीं, जो फैलें नींद उड़ाऊं ॥१९॥
ए जो नींद उड़ाई कौल में, जो कदी फैल में उड़त । तो निसबत इन की हक सों, आवत अर्स लज्जत ॥२०॥
जो पाइए इत लज्जत, तो होवे सब विध । कायम सुख इन अर्स के, सब काम होवें सिध ॥२१॥
तो न पाइए इत लज्जत, जो फैल न आवत हाल । हाल आए क्यों सेहे सके, बिछोहा नूर-जमाल ॥२२॥
ऐसा हक है सिर पर, कर दई हक पेहेचान । ऐसी हक की मैं जोरावर, क्यों रहे दीदार बिन प्रान ॥२३॥
ए जो मैं खुदाए की, क्यों रहे दीदार बिन । क्यों रहे सुने बिना, मीठे पिउ के वचन ॥२४॥
एक पल जात पिउ दीदार बिना, बड़ा जो अचरज ए । ए जो मैं है हक की, सो क्यों खड़ी बिछोहा ले ॥२५॥
छल में आप देखाइया, दिया अपना इलम । मैं आप पेहेचान ना कर सकी, न कछू चीन्हया खसम ॥२६॥
धनी मेरा अर्स का, मैं तुमारी अरधंग । भेख बदल सुनाए वचन, दिया दीदार बदल के अंग ॥२७॥
मैं बीच फरामोसी के, तुम आए सूरत बदल । पेहेचान क्यों कर सकूं, इन वजूद की अकल ॥२८॥
तालब तो भी तुमसे, इस्क नहीं तुम बिन । सब्द सुख भी तुमसे, तुमहीं दिया दरसन ॥२९॥
ए उपजावत तुमहीं, तुमहीं दिखलावत । तुमहीं खेल खेलावत, तुमहीं समें बदलत ॥३०॥
मैं को तुम खड़ी करी, मैं को देखाई तुम । मैं को तले कदम के, खड़ी राखी माहें हुकम ॥३१॥
तुमहीं साथ जगाइया, तुम दई सरत देखाए । तुमहीं तलब करावत, तो दरसन को हरबराए ॥३२॥
तुमहीं दिल में यों ल्यावत, मैं देखों हक नजर । सो पट तुमहीं से खुले, तुमसे टले अन्तर ॥३३॥
श्रवनों सब्द सुनाए के, दिल दीदे दीदार । अनेक हक मेहेरबानगी, सो कहां लो कहूँ सुमार ॥३४॥
जोस इस्क और बंदगी, चलना हक के दिल । ए बकसीस सब तुम से, खुसबोए वतन असल ॥३५॥
और कई इनाएतें तुम से, सो कहाँ लो कहूं वचन । सो कई आवत हैं नजरों, पर कहयो न जाए सुकन ॥३६॥
मैं अपनी अकलें केती कहूं, तुम करावत सब । बाहेर अंदर अन्तर, या तबहीं या अब ॥३७॥
जानो तो राजी रखो, जानो तो दलगीर । या पाक करो हादीपना, या बैठाओ माहें तकसीर ॥३८॥
अब मेरा केहेना ना कछू, तुमहीं केहेलावत ए । मेरे कहे मैं रेहेत है, पर सब बस हुकम के ॥३९॥
अब सब के मन में ए रहे, इत दिल चाहया होए । तो पाइए खेल खुसाली, हक जानत सब सोए ॥४०॥
ए भी तुम केहेलावत, कारन उमत के । अर्स वजूद के अंतर में, तुम पेहेले उपजावत ए ॥४१॥
असल हमारी अर्स में, ताए ख्वाब देखावत तुम । जैसा उत ओ देखत, तैसा करत हैं हम ॥४२॥
इन विध गुनाह हम पर, लागत नाहीं कोए । मैं तो इत नाहीं कितहूं, इत उत किया हक का होए ॥४३॥
भुलाए दिया तुम हम को, आप वतन खसम । ताथें खुदी मैं ले खड़ी, झूठे खेल में आतम ॥४४॥
आप छिपाया तुम हम सें, झूठे खेल में डार । फेर कर तुम खड़ी करी, करके गुन्हेगार ॥४५॥
फेर तुम हमको अकल दई, मैं खुदी पकड़ी सोए । जो जैसी करेगा, तैसी पावेगा सोए ॥४६॥
आप भी भेख बदल के, आए अपना दिया इलम । सब बातें कही वतन की, पर पेहेचान न सकें हम ॥४७॥
इत भी गुनाह सिर पर हुआ, याद न आया असल । तुम रोए लरखीज कहया, तो भी रही न मूल अकल ॥४८॥
यों गुनाह अनेक भांत का, हुआ हमारे सिर । हम कछू न कर सके, तो भी खबर लई हकें फेर ॥४९॥
कई सुख हमको अर्स के, भांत भांत दिए अपार । तो भी नींद हमारी न गई, इत भी हुए गुन्हेगार ॥५०॥
कर मनसा वाचा करमना, सब अंगों कर हेत । केहे केहे हारे हमसों, पर मैं न हुई सावचेत ॥५१॥
यों कई गुनाह केते कहूं, सब ठौरों गई भूल । कई देखाए गुन अपने, ताको तौल न मोल ॥५२॥
सो गुन देखे में नजरों, जिनको नहीं सुमार । तो भी पेहेचान न हुई, ना छूटी नींद विकार ॥५३॥
पीछे आप जुदे होए के, भेज दिया फुरमान । सो पढ़या मैं भली भांत सों, करी सब पेहेचान ॥५४॥
सो कुन्जी दई हाथ मेरे, कोई खोले न मुझ बिन । सक्त नहीं त्रैलोक को, न कछू सक्त त्रैगुन ॥५५॥
इन विध गुन केते कहूं, कई देखे मैं नजर । मेरे हाथ खुलाए के, करी ब्रह्मांड में फजर ॥५६॥
कई लिखी इसारतें अर्स की, कई रमूजें अनेक । पेहेले पढ़ाई मुझ को, मैं ही खोलूं एही एक ॥५७॥
महामत कहे मैं हक की, खोले मगज मुसाफ कलाम । और हक कलाम कौन खोल सके, जो मिले चौदे तबक तमाम ॥५८॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥२०९॥
