खिलवत - प्रकरण ७
बेसकी का प्रकरण
ए इलम इन वाहेदत का, हकें सो बेसकी दई मुझ । नूर के पार द्वार बका के, सो खोले अर्स के गुझ ॥१॥
चौदे तबकों ढूंढ़या, सब रहे दूर से दूर । रूह-अल्ला के इलम बिना, हुआ न कोई हजूर ॥२॥
कई दुनियां में बुजरक हुए, किन बका तरफ पाई नाहें । सो इलम नुकता ईसे का, बैठावे बका माहें ॥३॥
सो साहेदी देवाई महंमद की, सेहेरग से नजीक हक । नूर के पार नूर-तजल्ला, इलम माहें बैठावे बेसक ॥४॥
गिन तूं सुख बेसक के, जो इलम दिया नसीहत । मेहेर करी मेहेबूब ने, हकें जान निसबत ॥५॥
सक ना तीन उमत में, सक ना खास उमत । सक ना उमत फरिस्ते, सक ना कुंन कुदरत ॥६॥
खासल खास रूहें इस्क, और खासे बंदगी दिल । आम वजूद जदल से, जिनों नासूती अकल ॥७॥
रूहों लई हकीकत मारफत, गिरो फरिस्तों हकीकत । आम खलक जाहेरी, जो करम कांड सरीयत ॥८॥
दो गिरो पोहोंची वतन अपने, तीसरी आम जो दीन । सो तेता ही नजीक, जिनका जेता आकीन ॥९॥
पाई तीनों की बेसकी, कुफर बंदगी इस्क । ऐसा इलम इन दुनी में, हुई बका की बेसक ॥१०॥
सक ना पैदा फना की, सक ना दोजख भिस्त । हिसाब ठौर की सक नहीं, सक ना ठौर कयामत ॥११॥
सक ना आठों भिस्त में, सक ना काजी कजाए । बेसक किए आखिर लो, अव्वल से इप्तदाए ॥१२॥
क्यों कर मुरदे उठसी, क्यों होसी हक दीदार । क्यों कर हिसाब होएसी, ए सब रूह-अल्ला खोले द्वार ॥१३॥
केते दिन कयामत के, क्यों कयामत के निसान । ए सक कछुए ना रही, जो लिखी बीच कुरान ॥१४॥
सक ना दाभ-तूल-अर्ज की, सक ना सूर मगरब । बेसक हक कौल मोमिनों, रही ना सक कोई अब ॥१५॥
सक ना आजूज माजूज की, आड़ी अष्ट धात दिवाल । लिख्या टूटेगी आखिर, ए बेसक दुनी के काल ॥१६॥
रूह-अल्ला सब रूहन को, पाक कर देवें आकीन । कुफर दज्जाल को तोड़ के, बेसक करें एक दीन ॥१७॥
ल्याया ईसा वास्ते मोमिनों, बेसक बका न्यामत । करें हक जात पर सिजदा, इमाम मोमिनों इमामत ॥१८॥
सक ना किसी अर्स की, सक न नूर-मकान । सक ना बेचून बेचगून, सक ना चार आसमान ॥१९॥
कहूं बेसक तिनका बेवरा, नासूती मलकूत । ना सक आसमान जबरूत, ना सक आसमान लाहूत ॥२०॥
सक नाहीं सरीयत में, न सक रही तरीकत । सक नाहीं हकीकत में, सक ना हक मारफत ॥२१॥
सक ना जुदी जुदी कयामत, सक नाहीं वाहेदत । बेसक जुदी जुदी पैदास, ए जो कादर की कुदरत ॥२२॥
सक ना पेहेचान रसूल की, जो कही तीन सूरत । बसरी मलकी और हकी, जो जाहेर होसी आखिरत ॥२३॥
सक ना जबराईल में, और सक ना मेकाईल । सक ना सूर बजाए की, सक ना असराफील ॥२४॥
सक ना अरवाहें अर्स की, जो तीन बेर उतरे । लैल में आए जिन वास्ते, कछू सक ना रही ए ॥२५॥
सक ना आए खेल देखने, ए जो रूहें आइयां बिछड़ । कर मेला नासूत में बेसक, ले नसीहत आए अर्स चढ़ ॥२६॥
महंमद ईसा अर्स में, पोहोंचे हक हजूर । कर अर्ज सब मेयराज में, बेसक करी मजकूर ॥२७॥
महंमद ईसे किए जवाब, तिन में रही न सक । सक नहीं पड़उत्तर में, जो हकें दिए बुजरक ॥२८॥
बीच सब मेयराज के, जेती भई मजकूर । ए सक जरा ना रही, जो खिलवत तजल्ला-नूर ॥२९॥
छिपी बातें बीच अर्स के, कोई रही न माहें सक । पाई ऐसी बेसकी, जो लई दिल की बातें हक ॥३०॥
आगूं बेसक बड़े अर्स के, नूर रोसन जोए किनार । दोऊ तरफों जरी जोए के, नूर रोसन अति झलकार ॥३१॥
सक नाहीं जल उजले, मीठा ज्यों मिश्री । सक ना गिरदवाए बाग की, कई मोहोल जवेर जरी ॥३२॥
खुसबोए जिमी अति उज्जल, ज्यों सोने जवेर दरखत । बेसक जंगल जवेर ज्यों, रोसन नूर झलकत ॥३३॥
सक नाहीं हौज ताल की, इत बोहोत मोहोल बुजरक । बिरिख पानी ताल पाल के, सब पाट घाट बेसक ॥३४॥
बेसक बड़े अर्स की, क्यों कहूं बड़ी मोहोलात । बाग बड़ा गिरदवाए का, इन जुबां कह्या न जात ॥३५॥
इत सक मोहे जरा नहीं, बन गलियों पसु खेलत । गिरदवाए गून्जे अर्स के, कई विध जिकर करत ॥३६॥
यों केती कहूं बेसकी, इनका नहीं हिसाब । महामत देखावे हक इस्क, जो साकी पिलावे सराब ॥३७॥
॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥३४२॥
