खुलासा - प्रकरण ७
हक की सूरत
हाए हाए देखो मुस्लिम जाहेरी, जिन पाई नहीं हकीकत । हक सूरत अर्स माने नहीं, जो दई महंमद बका न्यामत ॥१॥
आसमान जिमी की दुनियां, करी सबों ने दौर । तरफ न पाई हक सूरत, पाई ना अर्स बका ठौर ॥२॥
खोज करी सब दुनियां, किन पाई न सूरत हक । खोज खोज सुन्य में गए, कोई आगूं न हुए बेसक ॥३॥
दौड़ थके सब सुन्य लो, किन ला हवा को न पायो पार । तब खुदा याही को जानिया, कहे निरंजन निराकार ॥४॥
पीछे आए रसूल, कहे मैं पाई हक सूरत । बोहोत करी रद-बदलें, वास्ते सब उमत ॥५॥
अर्स बका हौज जोए, पानी बाग जिमी जानवर । और देखी अरवाहें अर्स की, कहे मैं हक का पैगंमर ॥६॥
बोहोत देखी बका न्यामतें, करी हक सों बड़ी मजकूर । ख्वाब जिमी झूठी मिने, किया हक बका जहूर ॥७॥
कौल किया हके मुझसे, हम आवेंगे आखिरत । हिसाब ले भिस्त देयसी, आखिर करसी कयामत ॥८॥
वास्ते खास उमत के, मैं ल्याया फुरमान । सो आखिर को आवसी, तब काजी होसी सुभान ॥९॥
जो इन पर आकीन ल्याइया, ताए भिस्त होसी बेसक । जो इन बातों मुनकर, ताए होसी आखिर दोजक ॥१०॥
खुदा काजी होए बैठसी, होसी फजर को दीदार । ले पुरसिस लैलत कदर में, होसी फजर तीसरे तकरार ॥११॥
सब पैगंमर आवसी, होसी मेला बुजरक । तब बदफैल की दुनियां, ताए लगसी आग दोजक ॥१२॥
जलती जलती दुनियां, जासी पैगंमरों पे । ताए सब पैगंमर यों कहे, तुम छूट न सको हम से ॥१३॥
कहें पैगंमर हम सरमिंदे, हक सों होए न बात । तुम जाओ महंमद पे, वे करसी सबों सिफात ॥१४॥
ए बात पसरी दुनी में, जो कोई ल्याया आकीन । सो नाम धराए मुस्लिम, माहें आए महंमद दीन ॥१५॥
खुदा के नूर से महंमद, हुई दुनियां महंमद के नूर । इन बात में सक जो ल्याइया, सो रहया दीन से दूर ॥१६॥
कोईक पूरा ईमान ल्याइया, बिन ईमान रहे बोहोतक । कई जुबां ईमान दिल में नहीं, सो तो कहे मुनाफक ॥१७॥
केते कहावें मोमिन, और दिल में मुनकर । एक नाजी फिरका असल, और दोजखी बहत्तर ॥१८॥
कहया फिरके नाजीय को, होसी हक की हिदायत । सब फिरके इनमें आवसी, होसी एक दीन आखिरत ॥१९॥
तब होसी कुरान का माजजा, और नबी की नबुवत । ए कौल तोड़ जुदे पड़त हैं, सो कौल मेंहेदी करसी साबित ॥२०॥
कुरान में ऐसा लिख्या, खुदा एक महंमद साहेद हक । तिनको न कहिए मोमिन, जो इनमें ल्यावे सक ॥२१॥
जो हक बका सूरत में, मुस्लिम ल्यावे सक । तो क्यों खुदा एक हुआ, क्यों हुआ महंमद बरहक ॥२२॥
हाए हाए गिरो महंमदी कहावहीं, कहे हक को निराकार । जो जहूदों ने पकड़या, इनों सोई किया करार ॥२३॥
जो कहे खुदा को बेचून, तब बरहक न हुआ महंमद । खुदा महंमद वाहेदत में, सो कलाम होत है रद ॥२४॥
गैर दीन बेचून कहे, पर क्यों कहे मुसलमान । कहावें दीन महंमदी, तो इत कहां रहया ईमान ॥२५॥
खुदा एक महंमद बरहक, सो गैर दीन माने क्यों कर । हक सूरत की दई साहेदी, हकें तो कहया पैगंमर ॥२६॥
दे साहेदी खुदा की सो खुदा, ऐसा लिख्या बीच कुरान । एक छूट दूजा है नहीं, यों बरहक महंमद जान ॥२७॥
महामत कहे सुनो मोमिनों, दीन हकीकी हक हजूर । हक अमरद सूरत माने नहीं, सो रहे दीन से दूर ॥२८॥
॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥४३५॥
