श्री किरन्तन
श्री कुलजम सरूप के चौदह ग्रन्थों में से एक किरन्तन है । यह ज्ञान परब्रह्म के आवेश स्वरूप श्री प्राणनाथ जी के मुख से अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुआ और इसकी शैली चौपाइयों के रूप में है ।
विषय सूची-
- पेहेले आप पेहेचानो रे साधो
- बिंद में सिंध समाया रे साधो
- साधो भाई चीन्हो सब्द कोई चीन्हो
- साधो हम देख्या बड़ा तमासा
- सुनो रे सत के बनजारे
- भाई रे बेहद के बनजारे
- हो मेरी वासना तुम चलो अगम के पार
- हो भाई मेरे वैष्णव कहिये वाको
- कहा भयो जो मुखथें कह्यो
- सुनो भाई संतो कहूं रे महंतो
- रे हूं नाहीं रे हूं नाहीं सिध साध संत री भगत
- वचन विचारो रे मीठड़ी
- आज सांच केहेना सो तो काहू ना रुचे
- धनी न जाए किनको धूत्यो
- पतित सिरोमन यों कहे
- दुख रे प्यारो मेरे प्रान को
- सखी री आतम रोग बुरो लग्यो
- मैं तो बिगड़या विश्व थें बिछुरया
- तुम समझ के संगत कीजो रे बाबा
- साधो या जुग की ए बुध
- चल्यो जुग जाए री सुध बिना
- रे हो दुनियां बावरी
- रे हो दुनियां को तूं कहा पुकारे
- रे मन भूल ना महामत
- रस मगन भई सो क्या गावे
- खोज बड़ी संसार रे तुम खोजो साधो
- कहो कहो जी ठौर नेहेचल (किरंतन वेदांत के)
- मैं पूछों पांड़े तुम को
- संत जी सुनियो रे
- चीन्हे क्यों कर ब्रह्म को
- कलि में देख्या ग्यान अचंभा
- भाई रे ब्रह्मग्यानी ब्रह्म देखलाओ
- रे जीव जी जिन करो यासों नेहड़ा
- रे जीव जी तुमें लागी दाझ मुझ बिछड़ते (अब देह की तरफ का जवाब)
- वालो विरह रस भीनों रंग विरहमां रमाड़तो
- हांरे वाला रल झलावियो रामतें रोवरावियो
- हांरे वाला बंध पड़या बल हरया तारे फंदड़े
- केम रे झंपाए अंग ए रे झालाओ
- हांरे वाला कांरे आप्या दुख अमने अनघटतां
- हांरे वाला अगिन उठे अंग ए रे अमारड़े
- करनी तुमारी मेरी मैं तौली
- मीठडा मीठा रे
- विनता विनवे रे
- म्हारा वस कीधल वाला रे
- आवोजी वाला म्हारे घेर
- प्रीत प्रगट केम कीजिए
- खोज थके सब खेल खसमरी
- खिन एक लेहु लटक भंजाए
- बाई रे वात अमारी हवे कोण सुणें
- बाई रे गेहेलो वालो गेहेली वात करे रे
- आज वधाई वृज घर घर
- सतगुर मेरा स्याम जी
- धनी जी ध्यान तुमारे रे
- हो साथ जी वेगे न वेगे
- आए आगम बानी इत मिली
- भई नई रे नवों खंडों आरती (आरती)
- कृपा निध सुंदरवर स्यामा (भोग)
- राजा ने मलो रे राणें राए तणों
- ऐसा समे जान आए बुध जी
- कुली बल देखो रे
- साहेब तेरी साहेबी भारी
- मांगत हों मेरे दुलहा
- जिन सुध सेवा की नहीं
- तमें वाणी विचारी न चाल्या रे वैष्णवो
- ए माया आद अनाद की
- सैयां मेरी सुध लीजियो
- वाटडी विसमी रे साथीडा वेहद तणी
- अटकलें ए केम पांमिए
- सुन्य मण्डल सुध जो जो मारा संमंधी
- हवे वासना हसे जे वेहदनी (मूलगी चाल)
- लाडलियां लाहूत की (किरंतन आखिर के)
- जंजीरां मुसाफ की
- जो कोई सास्त्र संसार में (सास्त्रों की प्रनालिका)
- भवजल चौदे भवन
- मेरे धनी धाम के दुलहा
- निज नाम सोई जाहेर हुआ
- वतन बिसारिया रे
- सखी री जान बूझ क्यों खोइए
- साथजी पेहेचानियो
- मेरे मीठे बोले साथ जी
- सुन्दर साथजी ए गुन देखो रे
- सखीरी मेहेर बड़ी मेहेबूब की
- धंन धंन ए दिन साथ आनंद आयो
- धंन धंन सखी मेरे सोई रे दिन
- ए जो कही जागन (तीन विध का चलना)
- साथ जी जागिए
- आग परो तिन कायरों
- सैयां हम धाम चले
- चलो चलो रे साथ
- साथ जी सोभा देखिए
- आगूं आसिक ऐसे कहे
- अब हम धाम चलत हैं
- अब हम चले धाम को
- सुनो साथजी सिरदारो
- सोई सोहागिन धाम में
- तो भी घाव न लग्या रे कलेजे
- इन धनी के बान मोको ना लगे
- तो भी चोट न लगी रे आतम को
- धिक धिक पड़ो मेरी बुध को
- धनी एते गुन तेरे देख के
- साथ जी सुनो सिरदारो
- बुजरकी मारे रे साथजी
- जो तूं चाहे प्रतिष्ठा
- कयामत आई रे साथजी
- मैं पूछत हों ब्रह्मसृष्ट को
- ए सुच कैसे होवहीं
- झूठ सब्द ब्रह्मांड में
- फुरमान मेरे मेहेबूब का
- मासूक मेरे रूह चाहे सिफत करूं
- कारी कामरी रे
- फरेबी लिए जाए
- सरूप सुन्दर सनकूल सकोमल
- चतुर चौकस चेतन अति चोपसों
- नूर को रूप सरूप अनूप है
- हुब मेहेबूब की आसिक प्यास ले
- नूर नगन चेतन भूखन रचे
- मिली मासूक के मोहोल में माननी
- मोमिन लिखे मोमिन को
- वारी रे वारी मेरे प्यारे
- साथजी ऐसी मैं तुमारी गुन्हेगार
- सिफत तो सारी सब्द में
- ब्रह्मसृष्टि बीच धाम के
- स्यामाजी स्याम के संग
- हम चडी सखी संग रे
- वृथा कां निगमो रे
- तमें जो जो रे मारा साध संघाती (किरंतन पुराने)
- पर न आवे तोले एकने
- हांरे मारा साध कुलीना सांभलो
- हांरे मारा साध कुली ना जो जो
- वाटडी विस्मी गाडी भार भरी (धोरीडा मा मूके तारी धूसरी)
- आवो अवसर केम भूलिए
- अंदर नाहीं निरमल
- विसराई गिंन्यो वंजे (किरंतन हुकाको सिंधी भाखा में)
