किरन्तन - प्रकरण १०३
राग श्री गौड़ी
जो तूं चाहे प्रतिष्ठा, धराए वैरागी नाम । साध जाने तोको दुनियां, वह तो साधों करी हराम ॥१॥
मार प्रतिष्ठा पैजारों, जो आए दगा देत बीच ध्यान । एही सरूप दज्जाल को, उड़ाए दे इनें पेहेचान ॥२॥
इस दुनियां के बीच में, कोई भला बुरा केहेवत । तूं जिन देखे तिन को, ले अपनी अर्स खिलवत ॥३॥
दिल दलगीरी छोड़ दे, होत तेरा नुकसान । जानत है गोविंद भेड़ा, याको पीठ दिए आसान ॥४॥
ए भोम देखे जिन फेर के, एही जान महामत । ढील होत तरफ धाम की, जहां तेरी है निसबत ॥५॥
॥ प्रकरण ॥१०३॥ चौपाई ॥१५२०॥
