किरन्तन - प्रकरण २७
किरंतन वेदान्त के
राग श्री जेतसी
कहो कहो जी ठौर नेहेचल, वतन कहां ब्रह्म को ॥ टेक ॥
तुम तीन सरीर तज भए ब्रह्म, पायो है पूरन ग्यान । जो लों संसे ना मिटे, साधो तो लों होत हैरान ॥१॥
वेदांती संतो महंतो, तुम पायो अनुभव सार । निज वतन जो आपनों, तुम सोई करो निरधार ॥२॥
पेहेले पेड़ देखो माया को, जाको न पाइए पार । जगत जनेता जोगनी, सो कहावत बाल कुमार ॥३॥
मात पिता बिन जनमी, आपे बंझा पिंड । पुरूख अंग छूयो नहीं, और जायो सब ब्रह्मांड ॥४॥
आद अंत याको नहीं, नहीं रूप रंग रेख । अंग न इंद्री तेज न जोत, ऐसी आप अलेख ॥५॥
जल जिमी न तेज वाए, न सोहं सब्द आकास । तब ए आद अनाद की, जब नहीं चेतन प्रकास ॥६॥
पढ़ पढ़ थाके पंडित, करी न निरने किन । त्रिगुन त्रिलोकी होए के, खेले तीनों काल मगन ॥७॥
विष्णु ब्रह्मा रूद्र जनमें, हुई तीनों की नार । निरलेप काहू न लेपहीं, नारी है पर नाहीं आकार ॥८॥
गगन पाताल मेर सिखरों, अष्टकुली बनाए । पचास कोट जोजन जिमी, सागर सात समाए ॥९॥
तेज तिमर यामें फिरें, रवि ससि तारे ना थिर । सेस नाग कर ब्रह्मांड, ले धरयो वाके सिर ॥१०॥
देव दानव रिखि मुनि, ब्रह्मग्यानी बड़ी मत । सास्त्र बानी सबद मात्र, ए बोली सबे सरस्वत ॥११॥
बरन चारों विद्या चौदे, ए पढ़ाए भली पर । कर आवरण मोह नींद को, खेलावे नारी नर ॥१२॥
लाख चौरासी जीव जंत, ए बांधे सबे निरवान । थिर चर आद अनाद लों, ए भरी सो चारों खान ॥१३॥
पांच तत्व चौदे लोक, पाउ पल में उपजाए । खेल ऐसे अनेक रचे, नार निरंजन राए ॥१४॥
ए काली किन पाई नहीं, सब छाया में रहे उरझाए । उपजे मोह अहंकार थें, सो मोहै में भरमाए ॥१५॥
बुध तुरिया दृष्ट श्रवना, जेती पोते वचन । उतपन सब होसी फना, जो लों पोहोंचे मन ॥१६॥
ऊपर तले मांहें बाहेर, दसो दिसा सब एह । सो सब्द काहूं न पाइए, कहया ठौर अखण्ड घर जेह ॥१७॥
तो कहयो न जाए मन वचन, ना कछू पोंहोंचे चित । बुधें सुनी न निसानी श्रवनों, तो क्यों कर जाइए तित ॥१८॥
वेदांती माया को यों कहें, काल तीनों जरा भी नाहें । चेतन व्यापी जो देखिए, सो भी उड़ावें तिन मांहें ॥१९॥
ना कछु ना कुछ ए कहें, ओ सत-चिद-आनंद । असत सत को ना मिले, ए क्यों कर होए सनमंध ॥२०॥
ए जो व्यापक आतमा, परआतम के संग । क्यों ब्रह्म नेहेचल पाइए, इत बीच नार को फंद ॥२१॥
निबेरा खीर नीर का, महामत करे कौन और । माया ब्रह्म चिन्हाए के, सतगुर बतावें ठौर ॥२२॥
॥ प्रकरण ॥२७॥ चौपाई ॥३१०॥
