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विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण ३८

केम रे झंपाए अंग ए रे झालाओ, वली वली वाध्यो विख विस्तार । जीव सिर जुलम कीधो फरी-फरी, हठियो हरामी अंग इंद्री विकार ॥१॥

झांप झालाओ हवे उठतियो अंगथी, सुख सीतल अंग अंगना ने ठार । बाल्या वली वली ए मन ए कबुधें, कमसील काम कां कराव्या करतार ॥२॥

गुण पख इंद्री वस करी अबलीस ने, अंगना अंग थाप्यो दई धिकार । अर्थ उपले एम केहेवाइयो वासना, फरी एणे वचने दीधी फिटकार ॥३॥

मांहेले माएने जोपे ज्यारे जोइए, त्यारे दीधी तारूणी तन तछकार । कलकली महामती कहे हो कंथजी, एवा स्या रे दोष अंगनाओं ना आधार ॥४॥

॥ प्रकरण ॥३८॥ चौपाई ॥४४८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-