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विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण ४८

राग केदारो

खिन एक लेहु लटक भंजाए । जनमत ही तेरो अंग झूठो, देखतहीं मिट जाए ॥१॥

हे जीव निमख के नाटक में, तूं रहयो क्यों बिलमाए । देखतहीं चली जात बाजी, भूलत क्यों प्रभू पाए ॥२॥

आपको पृथीपति कहावे, ऐसे केते गए बजाए । अमरपुर सिरदार कहिए, काल न छोड़त ताए ॥३॥

जीव रे चतुरमुख को छोड़त नाहीं, जो करता सृष्ट केहेलाए । चारों तरफों चौदे लोकों, काल पोहोंच्यो आए ॥४॥

पवन पानी आकास जिमी, ज्यों अगिन जोत बुझाए । अवसर ऐसो जान के, तूं प्राणपति लौ लाए ॥५॥

देखन को ए खेल खिन को, लिए जात लपटाए । महामत रूदे रमे तांसों, उपजत जाकी इछाए ॥६॥

॥ प्रकरण ॥४८॥ चौपाई ॥५०६॥

इसी सन्दर्भ में देखें-