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विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण ५

राग श्री केदारो

सुनो रे सत के बनजारे, एक बात कहूं समझाई । या फंद बाजी रची माया की, तामें सब कोई रह्या उरझाई ॥१॥

आंटी आन के फांसी लगाई, वे भी उलटीऐं दई उलटाई । बंध पर बंध दिए बिध बिध के, सो खोली किनहूं न जाई ॥२॥

चौदे भवन लग एही अंधेरी, झूठे को खेल झुठाई । प्रगट नास व्यास पुकारे, सुकदेव साख पुराई ॥३॥

लोक लाज मरजादा छोड़ी, तब ग्यान पदवी पाई । एक आग ज्यों छोटी बुझाई, त्यों दूजी मोटी लगाई ॥४॥

कोट सेवक करो नाम निकालो, इष्ट चलाओ बड़ाई । सेवा कराओ सतगुर केहेलाओ, पर अलख न देवे लखाई ॥५॥

अब छोड़ो रे मान गुमान ग्यान को, एही खाड़ बड़ी भाई । एक डारी त्यों दूजी भी डारो, जलाए देओ चतुराई ॥६॥

सास्त्र पुरान भेख पंथ खोजो, इन पैडों में पाइए नाहीं । सतगुर न्यारा रहत सकल थें, कोई एक कुली में कांही ॥७॥

सत चाहो सो सब्दा चीन्हो, सो आप न देवे देखाई । जिन पाया तिन मांहें समाया, राखत जोर छिपाई ॥८॥

सुध सबे पाइए सब्दों से, जो होवे मूल सगाई । खिन एक बिलम न कीजे तब तो, लीजे जीव जगाई ॥९॥

पर मनुआ दिए बिन हाथ न आवे, सत की बड़ी ठकुराई । और उपाय याको कोई नाहीं, जिन देवे आप बड़ाई ॥१०॥

महामत कहें सावचेत होइयो, मिल्या है अंकूरों आई । झूठी छूटे साँची पाइए, सतगुर लीजे रिझाई ॥११॥

॥ प्रकरण ॥५॥ चौपाई ॥४८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-