किरन्तन - प्रकरण ८७
राग श्री
आग परो तिन कायरों, जो धाम की राह न लेत । सरफा करे जो सिर का, और सकुचे जीव देत ॥१॥
पाइयत झूठ के बदले, सत सुख अखंड । सो देख पीछे क्यों होवहीं, करते कुरबानी पिंड ॥२॥
इन विध कहे संसार में, धनी रंचक दिलासा दे । टूक टूक होए जाए फना, सब अंग आसिक के ॥३॥
धनिएँ दई दिलासा मुझको, कई पदमों लाख करोड़ । तब आतम ने यों कहया, परआतम धनी संग जोड़ ॥४॥
देख दिलासा धनीय की, भी साख दई सबन । मांहें बाहेर अंतर मिने, सब अंग किए रोसन ॥५॥
तूं पूछ मन चित बुध को, और गुन अंग इंद्री पख । देख तत्व सब सास्त्रों का, फेर कर नीके लख ॥६॥
तूं बल कर कछू अपना, चल राह तामसी सूर । ब्रह्मसृष्ट निकसी बृज से, देख क्यों कर पोहोंची हजूर ॥७॥
कर कबीला पार का, अंकूर बल सूर धीर । एक धनी नजर में लेय के, उड़ाए दे सरीर ॥८॥
पूछ नीके अपने धनी को, भी नीके देख तारतम । नीके देख फुरमान को, भी पूछ नीके आतम ॥९॥
भी पूछ संगी तूं अपने, जो हुए पिंडथें दूर । कई साखें अजूं ले खड़ी, देख रोसन अपना नूर ॥१०॥
एती साखें लेय के, कहा लगत झूठे अंग । अजूं न लगे तोकों धाम को, सांचो सनमंध संग ॥११॥
सास्त्र संगी सब यों कहें, विचार देख महामत । जैसी होए हिरदे मिने, तैसी पाइए गत ॥१२॥
महामत कहें पीछे न देखिए, नहीं किसी की परवाहे । एक धाम हिरदे में लेय के, उड़ाए दे अरवाहे ॥१३॥
॥ प्रकरण ॥८७॥ चौपाई ॥१२२७॥
