मारफत सागर - प्रकरण ९
दज्जाल का निसान
कह्या दज्जाल अस्वार गधे पर, काना आंख न एक । हक को न देखे आंख जाहेरी, रूह नजर न बातून नेक ॥१॥
अजाजील काना तो रानियां, जो बातून नजर करी रद । देख्या उपली आंखसों, आदम वजूद गलद ॥२॥
गधा बड़ा दज्जाल का, कह्या ऊंचा लग आसमान । पानी सात दरियाव का, पोहोंच्या नहीं लग रांन ॥३॥
गधा एता बड़ा तो है नहीं, कह्या हवा तारीक मकान । ए जो कुंन केहेते पैदा हुई, सिफली दुनी जहान ॥४॥
ना तो एता बड़ा गधा, होसी कैसा कद दज्जाल । सो दज्जाल गधा जब गिर पड़े, तले दुनी रहे किन हाल ॥५॥
लानत जो अजाजील की, ले अबलीस बैठा दिल । सो राह न लेने देवे बातून, जो जोर करें सब मिल ॥६॥
सोई दाभा या गधा दज्जाल, अबलीस दिलों पातसाह । सो दुनी आंख फोड़ी दुस्मने, लेने देवे न बातून राह ॥७॥
ना तो लानत जो दज्जाल की, सो दुनी को लगे क्योंकर । सो वास्ते ताबे दज्जाल के, हुई बातून आंख बिगर ॥८॥
दुनी सिजदा न किया, रूह महंमद आदम पर । इन भी देख्या वजूद को, ना खोले बातून नजर ॥९॥
तो हुआ दिलों पर पातसाह, सोई राह चलावत । जिन राह चलते अबलीस को, दूर किया दे लानत ॥१०॥
इन बिध लगी लानत, अजाजील की दुनी को । जैसी हुई सिरदार से, हुई तैसी ताबे हुए सों ॥११॥
सिपारे उनईस में, कह्या निकाह आदम हवा । सो पसरी बीच दुनी के, इत अबलीस जो पैदा ॥१२॥
जेता कोई बनी आदम, कह्या निकाह अबलीस से । कह्या दुनी बीच अबलीस, लोहू ज्यों तन में ॥१३॥
कह्या वजूद आदमी, सैतान अमल दिल पर । दुनी होसी इन बिध की, कहे बीच हदीस पैगंमर ॥१४॥
दोऊ तरफों कह्या पेटमें, और दुनी हाथ बीच दोए । इन बिध रहे बीच आदम, याको किन बिध मारे कोए ॥१५॥
कह्या पैदा आदम हवा से, याकी असल बिध इन । सो बाहेर ढूंढे माएना जाहेरी, बिना मगज सुकन ॥१६॥
और हदीस में यों कह्या, दुनी राह देखे जाहिर दज्जाल । माएना न पावें ढूंढ़ें जाहेर, कहे हम लड़सी तिन नाल ॥१७॥
सोई सूरत धुआं दज्जाल, दुनी तिन दई उरझाए । मुसाफ बरकत ईमान बिन, छूटी आखिर हक हिदायत ताए ॥१८॥
कयामत फल जिन सों गया, उलट बलाए लगी आए । आग नजर आई दोजख, रही बदफैल देहेसत भराए ॥१९॥
धुआं करे मार दिवाना, कह्या ऐसे ही ईमान बिन । छूटी मुसाफ नसीहत बरकत, तब ऐसा क्यों न होए हाल तिन ॥२०॥
कहे अबलीस मैं घेरोंगा, राह मारों तरफ चार । वह जाने लई राह दीन की, इन बिध देऊं राह मार ॥२१॥
ढूंढ़े जाहेर निसान जाहेरी, सो तो कहे कयामत के दिन । जो कोई ताबे दज्जाल के, ताए रूह आंख नहीं बातन ॥२२॥
सिपारे चौबीस में, बड़ी साहेबी दज्जाल । पोहोंचे दरियाव जंगलों, चले याके फिरके नेहेरें मिसाल ॥२३॥
जो लिख्या अव्वल ताले मिने, सोई दुनी से होए । और बात फुरमाए बिना, क्यों कर करे कोए ॥२४॥
॥ प्रकरण ॥९॥ चौपाई ॥५४५॥
