श्री परिकरमा
श्री कुलजम सरूप के चौदह ग्रन्थों में से एक परिकरमा है । यह ज्ञान परब्रह्म के आवेश स्वरूप श्री प्राणनाथ जी के मुख से पन्ना में प्रकट हुआ और इसकी शैली चौपाइयों के रूप में है ।
विषय सूची-
- अब कहूं रे इस्क की बात (इस्क का प्रकरण)
- ब्रह्मसृष्टी लीजियो (श्री धाम को बरनन मंगला चरन)
- अब आओ रे इस्क भानूं हाम (और ढाल चली)
- तुमको इस्क उपजावने (सूरत इस्क पैदा होने की)
- वतन आपनो (बन में सरूप सिनगार)
- कतरे कई केलन के (जमुना जोए किनारे सात घाट)
- सातों घाट बीच में (कुंज बन मंदिर)
- अब कहूं मैं ताल की (हौज कौसर ताल जित जोए कौसर मिली)
- बन्यो ताल के बीच में (टापू के बीच मोहोलात चौसठ पांखड़ी की)
- और पीछल पाल तलाव के (फूलबाग)
- ए जो बड़ा चबूतरा (लाल चबूतरा बड़े जानवरों के मुजरे की जागा)
- फेर कहूं तले बन की
- सुख लीजो मोमिन (मोहोल पहाड़ पुखराजी)
- मोहोल के तले ताल जो (ताल बंगले जोए मोहोलात)
- किनारे मोहोल जोए के (जमुनाजी का मूलकुंड कठेड़ा चबूतरा ढांपी खुली सात घाट)
- तुम देखो दिल में (पुल मोहोल दोऊ जवेर के)
- पार जमुना जो बन (पार जोए के बन खूबी)
- क्यों दियो रे बिछोहा दुलहा (परिकरमा बड़ी फिराक की)
- भोम तले की बैठाए के (खिलवत से चांदनी ताँईं)
- दोऊ कमाड़ों की क्यों कहूं (अर्स आगूं खुली चांदनी)
- और सुख सातों घाट के (सात घाट पुल हौज)
- अब ताल पाल की क्यों कहूं (हौज कौसर)
- सुख नेहेरों का अलेखे (नेहेरें मोहोलों में)
- पहाड़ मानिक मोहोल कई (मानिक पहाड़ के हिंडोले)
- बन छाया है मोहोल जो (बन के मोहोल नेहेरें)
- सुख क्यों कहूं पहाड़ पुखराज के (पुखराज से पाट घाट ताँईं)
- एह निमूना ख्वाब का (पसु पंखियों की पातसाही)
- खावंद इनों में खेलहीं (पसु पंखियों का इस्क सनेह)
- अस्वारी पसु पंखियन पर (पसु पंखियों की अस्वारी)
- पेहेले किया बरनन अर्स का (तीनों सरूपों की पेहेचान बल अर्स की तरफ का)
- बड़ा चौक सोभा लेत है (दसों भोम बरनन)
- गैब बातें बका अर्स की (बाब अर्स अजीम का मता जाहेर किया याने एक जवेर का अर्स)
- अब देखो अन्दर अर्स के (खिलवत में हाँसी फरामोसी दई)
- बेवरा अगली भोम का (परिकरमा नजीक अर्स के)
- बड़ीरूह रूहें नूर में (नूर परिकरमा अंदर दस भोम - मंगला चरन)
- नूर तरफ पाट घाट नूर का (नूर परिकरमा अन्दर तांई)
- कहे आमर नूर अर्स का
- बरनन धाम को (धाम बरनन)
- प्रेम देखाऊं तुमको साथजी (प्रेम को अंग बरनन)
- एक चित्रामन दिवालें बन (धाम की रामतें)
- एक अंग अभिलाखी देवें साखी (रामत दूसरी)
- कहियत नेहेचल नाम (बड़ी रामत)
- नूर कुन्जी अगिन मुसाफ की (सागरों रांग मोहोलात मानिक पहाड़)
- साथजी देखो मोहोल मानिक (मोहोल मानिक पहाड़)
