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विषय-सूची

परिकरमा - प्रकरण १

श्री किताब इलाही-दुलहिन अर्स अजीम की

इस्क का प्रकरण

अब कहूं रे इस्क की बात, इस्क सब्दातीत साख्यात । जो कदी आवे मिने सब्द, तो चौदे तबक करे रद ॥१॥

ब्रह्म इस्क एक संग, सो तो बसत वतन अभंग । ब्रह्मसृष्टी ब्रह्म एक अंग, ए सदा आनंद अतिरंग ॥२॥

एते दिन गए कई बक, सो तो अपनी बुध माफक । अब कथनी कथूं इस्क, जाथें छूट जाए सब सक ॥३॥

वोए वोए इस्क न था एते दिन, कैयों ढूंढया गुन निरगुन । धिक धिक पड़ो सो तन, जो तन इस्क बिन ॥४॥

इस्क नाहीं मिने सृष्ट सुपन, जो ढूंढया चौदे भवन । इस्क धनिएँ बताया, इस्क बिना पिउ न पाया ॥५॥

इस्क है तित सदा अखंड, नाहीं दुनियां बीच ब्रह्मांड । और इस्क का नहीं निमूना, दूजा उपजे न होवे जूना ॥६॥

इस्क है हमारी निसानी, बिना इस्क दुलहा मैं रानी । इस्क बिना मैं भई वीरानी, बिना इस्क न सकी पेहेचानी ॥७॥

वृथा गए एते दिन, जो गए इस्क बिन । मैं हुती पिया के चरन, मैं रेहे ना सकी सरन ॥८॥

क्यों रहया जीव बिना जीवन, क्यों न आया हो मरन । अंग क्यों न लागी अगिन, याद आया न मूल वतन ॥९॥

इस्क जाने सृष्ट ब्रह्म, जाके नजीक न काहूं भरम । जब इस्क रहया भराए, तब धाम हिरदे चढ़ आए ॥१०॥

इस्क तो कहया सब्दातीत, जो पिउजी की इस्क सों प्रीत । देखी इस्क की ऐसी रीत, बिना इस्क नाहीं प्रतीत ॥११॥

इस्क नेहेचे मिलावे पिउ, बिना इस्क न रहे याको जिउ । ब्रह्मसृष्टी की एही पेहेचान, आतम इस्कै की गलतान ॥१२॥

इस्क याही धनिएँ बताया, इस्क याही सृष्टें गाया । इस्क याही में समाया, इस्क याही सृष्टें चित ल्‍याया ॥१३॥

इस्क पिया को बतावे विलास, इस्क ले चले पिउ के पास । इस्क मिने दरसन, इस्क होए न बिना सोहागिन ॥१४॥

इस्क ब्रह्मसृष्टी जाने, ब्रह्मसृष्ट एही बात माने । खास रूहों का एही खान, इन अरवाहों का एही पान ॥१५॥

पिया इस्क रस, ब्रह्मसृष्ट को अरस परस । काहूं और न इस्क खोज, औरों जाए न उठाया बोझ ॥१६॥

बात इस्क की है अति घन, पर पावे सोई सोहागिन । ब्रह्मसृष्ट बिना न पावे, सनमंध बिना इस्क न आवे ॥१७॥

धनीजी को इस्क भावे, बिना इस्क न कछू सोहावे । यों न कहियो कोई जन, धनी पाया इस्क बिन ॥१८॥

इस्क बसे पिया के अंग, इस्क रहे पिउ के संग । प्रेम बसत पिया के चित, इस्क अखंड हमेसा नित ॥१९॥

इस्क बतावे पार के पार, इस्क नेहेचल घर दातार । इस्क होए न नया पुराना, नई ठौर न आवत आना ॥२०॥

इस्क साहेब सों नहीं अंतर, जो अरस-परस भीतर । ए सुगम है सोहागिन, जाको अंकूर याही वतन ॥२१॥

ए औरों नाहीं दृष्ट, औरों छूटे न मोह अहं भ्रष्ट । याको जाने ब्रह्मसृष्ट, जाको एही है इष्ट ॥२२॥

इस्क की बात बड़ी रोसन, जासों सुख लेसी चौदे भवन । सो भी सुख नेहेचल, इस्क दृष्टें न रहे जरा मैल ॥२३॥

इस्क राखे नहीं संसार, इस्क अखंड घर दातार । इस्क खोल देवे सब द्वार, पार के पार जो पार ॥२४॥

इस्क घाए करे टूक टूक, अंग होए जाए सब भूक । लोहू मांस गया सब सूक, चित चल न सके कहूं चूक ॥२५॥

इस्क आगूं न आवे माया, इस्कें पिंड ब्रह्मांड उड़ाया । इस्कें अर्स वतन बताया, इस्कें सुख पेड़ का पाया ॥२६॥

कोई नहीं इस्क की जोड़, ना कोई बांधे इस्क सों होड़ । इस्क सुध कोई न जाने, दुनी ख्वाब की कहा बखाने ॥२७॥

इस्क आवे धनी का चाहया, इस्क पिया जी ने सिखाया । पिया इस्क सरूप बताया, इस्कें पिंड ही को पलटाया ॥२८॥

इस्क सोभा बड़ी है अत, इस्क दृष्टें न पाइए असत । जो कदी पेड़ होवे असत, इस्क ताको भी करे सत ॥२९॥

इस्क की सोभा कहूं मैं केती, ए भी याही जुबां कहे एती । याको जाने सृष्ट ब्रह्म, जाको इस्कै करम धरम ॥३०॥

इस्क है याको आहार, और इस्कै याको वेहेवार । इस्क है याकी दृष्ट, ए इस्कै की है सृष्ट ॥३१॥

ए तो प्रेमैं के हैं पात्र, याके प्रेमैं है दिन रात्र । याके प्रेमैं के अंकूर, याके प्रेम अंग निज नूर ॥३२॥

याके प्रेमैं के भूखन, याके प्रेमैं के हैं तन । याके प्रेमैं के वस्तर, ए बसत प्रेम के घर ॥३३॥

याके प्रेम श्रवन मुख बान, याको प्रेम सेवा प्रेम गान । याको ग्यान भी प्रेम को मूल, याको चलन न होए प्रेम भूल ॥३४॥

याको प्रेमैं सेहेज सुभाव, ए प्रेमैं देखे दाव । बिना प्रेम न कछुए पाइए, याके सब अंग प्रेम सोहाइए ॥३५॥

याकी गत भांत सब प्रेम, याके प्रेमैं कुसलखेम । याके प्रेम इंद्री अंग गुन, बुध प्रकृती नहीं प्रेम बिन ॥३६॥

याको प्रेमैं को विस्तार, याको प्रेमैं को आचार । याके प्रेमैं के तेज जोत, याके प्रेमैं अंग उद्दोत ॥३७॥

याको प्रेमैं है रस रंग, याको प्रेम सबों में अभंग । याको प्रेम सनेह सुख साज, याको प्रेम खेलन संग राज ॥३८॥

याके प्रेम सेज्या सिनगार, वाको वार न पाइए पार । प्रेम अरस परस स्यामा स्याम, सैयां वतन धनी धाम ॥३९॥

प्रेम पिया जी के आउध, प्रेम स्यामा जी के अंग सुध । ब्रह्मसृष्टी की एही विध, ए दूजे काहू ना दिध ॥४०॥

प्रेम सेन्या है अति बड़ी, जब मूल आउध ले चढ़ी । सो रहे न काहू की पकड़ी, यासों सके न कोई लड़ी ॥४१॥

प्रेम आप पर कोई ना लेखे, बिना धनी काहूं न देखे । प्रेम राखे धनी को संग, अपनो भी न देखे अंग ॥४२॥

और सबन सों चित भंग, एक पिया जी सों रस रंग । प्रेम पिया जी के अंग भावे, पिया बिना आपको भी उड़ावे ॥४३॥

जो कोई पिउ के अंग प्यारा, ताको निमख न करे प्रेम न्यारा । प्रेम पिया को भावे सो करे, पिया के दिल की दिल धरे ॥४४॥

प्रेम आतम दृष्ट न छोड़े, प्रेम बाहेर दृष्ट न जोड़े । प्रेम पिया के चितसों चित न मोड़े, प्रेम और सबन सों तोड़े ॥४५॥

पिया के दिल की दिल लेवे, रैन दिन पिया दिल सेवे । पिया के दिल बिना सब जेहेर, औरों सों होए गयो सब वैर ॥४६॥

पिया के दिल की सब जाने, पिया जी को दिल पेहेचाने । अंग पिउजी के दिल आने, पिउ बिना आग जैसी कर माने ॥४७॥

प्रेम अंदर ऐसी भई, नींद माहें की उड़ कहूं गई । गुन अंग इंद्री पख, पिया प्रेमें हुए सब लख ॥४८॥

सब देखे पिया दिल सामी, दिल देखे अंतरजामी । पिउ के दिल की पेहेले आवे, पिया मुख थें केहेने न पावें ॥४९॥

आतम एक हुई निसंक, ना रही जुदागी रंचक । प्रेम दिल भर हुई दिल, पिया प्रेमे रहे हिल मिल ॥५०॥

प्रेम आप न देखे कित, दृष्ट पियाई देखे जित । निज नजर प्रेम खोलत, जाग धाम देखावे सर्वत्र ॥५१॥

पिया प्रेमैं सों पेहेचान, प्रेम धाम के देवे निसान । प्रेम ऐसी भांत सुधारे, ठौर बैठे पार उतारे ॥५२॥

पंथ होवे कोट कलप, प्रेम पोहोंचावे मिने पलक । जब आतम प्रेमसों लागी, दृष्ट अंतर तबहीं जागी ॥५३॥

जब आया प्रेम सोहागी, तब मोह जल लेहेरां भागी । जब उठे प्रेम के तरंग, ले करी स्याम के संग ॥५४॥

पेहेचान हुती न एते दिन, प्रेम नाहीं पिया सों भिंन । पिया प्रेम पेहेचान जो एक, भेली होसी सबों में विवेक ॥५५॥

जब चढ़े प्रेम के रस, तब हुए धाम धनी बस । जब उपजे प्रेम के तरंग, तब हुआ धाम धनी सों संग ॥५६॥

प्रेम नजरों जो कछू आया, ताको इतहीं अखंड पोहोंचाया । प्रेम है बड़ो विस्तार, भवजल हुतो जो खार ॥५७॥

सो मेट किया सुधा रस, सुख अखंड धनी को परस । प्रेमें गम अगम की करी, सो सुध वैराट में विस्तरी ॥५८॥

प्रेमें करी अलख की लख, त्रैलोकी की खोली चख । तब छूट्या सबों से अभख, सब हुए स्याम सनमुख ॥५९॥

जब प्रेम सबों अंग पिआ, अपना अनुभव कर लिया । तब वार फेर जीव दिया, अब न्यारे न जीवन जिया ॥६०॥

मूल अंग आया इस्क, दूजा देखे न बिना हक । जब छूटे प्रेम के पूर, प्रगट्या निज वतनी सूर ॥६१॥

जब प्रेम हुआ झकझोल, तब अंतर पट दिए खोल । जब चढ़े प्रेम के पुन्ज, निज नजरों आया निकुंज ॥६२॥

जब प्रेम हुआ प्रघल, अंग आया धाम का बल । तुम यों जिन जानो कोए, बिन सोहागिन प्रेम न होए ॥६३॥

प्रेम खोल देवे सब द्वार, पारै के पार जो पार । प्रेम धाम धनी को विचार, प्रेम सब अंगों सिरदार ॥६४॥

इस्कै में पोहोंचाया, इस्कें धाम में ले बैठाया । इस्कें अंतर आंखें खुलाई, धनी साथ मिलावा देखाई ॥६५॥

कहे महामत प्रेम समान, तुम दूजा जिन कोई जान । ले उछरंग ते घर आए, पिया प्रेमें कंठ लगाए ॥६६॥

॥ प्रकरण ॥१॥ चौपाई ॥६६॥

इसी सन्दर्भ में देखें-