परिकरमा - प्रकरण १०
फूलबाग
और पीछल पाल तलाव के, कई बन सोभा लेत । ए बन आगूं फिरवल्या, परे धाम लों देखाई देत ॥१॥
ताल को बीच लेय के, मिल्या धाम दिवालों आए । कई मेवे केते कहूं, अगनित गिने न जाए ॥२॥
तरफ पीछल धाम के, अंन बन मेवे अनंत । फल फूल पात कंदमूल, ए कहांलों को गिनत ॥३॥
ऊपर झरोखे धाम के, बन आए लग्या दिवाल । वाही छाया तले रेती रोसन, जैसा आगे कहया बन हाल ॥४॥
बाग बने फूलन के, लगत झरोखे दिवाल । जब आवत हैं इन छज्जों, रूहें इत होत खुसाल ॥५॥
लग लग होए के बैठत, ऊपर छज्जों के आए । आगूं उठत ऊँचे फुहारे, जल झलकत मोती गिराए ॥६॥
आगूं सबन के फुहारे, और आगूं सबों के फूल । देख देख ए चेहेबच्चे, सबे होत सनकूल ॥७॥
छलकत छोले चेहेबच्चे, नेहेरें चलत तेज नूर । सो विचरत सब बगीचों, पीवत हैं भरपूर ॥८॥
जो लग्या चबूतरे चेहेबच्चा, बुजरक बड़ा विसाल । उतरता जल इतथें, नेहेरें चलत इन हाल ॥९॥
विचरत जल चेहेबच्चों, सो सिरे लगे पोहोंचत । इसी भांत झरोखे बगीचे, माहें रूहें केलि करत ॥१०॥
इन ऊपर छज्जे बिराजत, सिरे लगे एकै हार । ऊपर खूबी इन विध, सोभा लेत किनार ॥११॥
इत खेलत कई जानवर, मृग मोर बांदर । कई मुरग तीतर लवा लरें, कई विध कबूतर ॥१२॥
कई विध देत गुलाटियां, कई उलटे टेढ़े चलत । कई कूदें फांदें उड़ें लड़ें, कई विध खेल करत ॥१३॥
एक नाचें गावें स्वर पूरें, एक बोलत बानी रसाल । नए नए रूप रंग ल्यावहीं, किन विध कहूं इन हाल ॥१४॥
और केते कहूं जानवर, छोटे बड़े करें खेलि । ए खुसाली खावन्द की, रूहों करावें इस्क केलि ॥१५॥
ए खेलौने खावन्द के, सब विध के सुखकार । कोई विद्या छिपी ना रहे, जानें खेल अपार ॥१६॥
जित तले दस खिड़कियां, इतथें रूहें उतरत । फिरत सैर इन बन को, जब कबूं आवें हक इत ॥१७॥
कई बन हैं फूलन के, इन बन को नाहीं सुमार । कई भांतें रंग कई जुगतें, कई कांगरियां किनार ॥१८॥
हिसाब नहीं फूलन को, हिसाब ना चित्रामन । हिसाब नहीं खुसबोए को, हिसाब ना रंग रोसन ॥१९॥
कई मेवे फलन के, कई मेवे हैं फूल । कई मेवे डार पात के, कई मेवे कन्दमूल ॥२०॥
कई बन आगूं आए मिल्या, जो बन बड़ा कहियत । ऊंचे बिरिख अति सुन्दर, जित हिंडोलों हींचत ॥२१॥
कई बिरिख कई हिंडोले, कई जुदी जुदी जिनस । स्याम स्यामाजी साथजी, सुख लेवें अरस-परस ॥२२॥
कहूं कहूं लम्बे हिंडोले, कहूं तिनसें बड़े अतंत । कहूं कहूं छोटे बने, कई जुदी जुदी जुगत ॥२३॥
कहूं कहूं सेज्या हिंडोले, कहूं हिंडोले सिंघासन । कहूं कहूं खड़ियां हींचत, यों खेल होत इन बन ॥२४॥
एक सोए हिंडोले लेवहीं, एक बैठके हींचत । एक उठें एक बैठत हैं, यों जुगल केलि करत ॥२५॥
इन बन जिमी की रोसनी, मावत नहीं आकास । इन रोसन हिंडोलों हींचत, क्यों कहूं खूबी खास ॥२६॥
इस तरफ चबूतरा धाम का, आए मिल्या बन इत । महामत कहे इन अकलें, क्यों कर करूं सिफत ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥१०॥ चौपाई ॥६४३॥
