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विषय-सूची

परिकरमा - प्रकरण २

श्री धाम को बरनन मंगला चरन

राग श्री धनाश्री

ब्रह्मसृष्टी लीजियो, हांरे सैयां ए है अपना जीवन । सखी मेरी जो है मूल वतन, ब्रह्मसृष्टी लीजियो ॥ टेक ॥१॥

सास्त्र सब्द मात्र जो बानी, ताको कलस बानी सब्दातीत । ताको भी कलस हुओ अखंड को, तापर धजा धरूं तिनथें रहित ॥२॥

मगज वेद कतेब के, बंधे हुते जो वचन । आदि करके अबलों, सखी कबहूं न खोले किन ॥३॥

सुपन बुध बैकुंठ लो, या निरंजन निराकार । सो क्यों सुन्य को उलंघ के, सखी मेरी क्यों कर लेवे पार ॥४॥

सुपन बुध अटकल सों, वेद कतेब खोजे जिन । मगज न पाया माहें का, बांधे माएने बारे तिन ॥५॥

साधू बोले इन जुबां, गावें सब्दातीत बेहद । पर कहा करे बुध मोह की, आगे ना चले सब्द ॥६॥

पांच तत्व मोह अहंकार, चौदे लोक त्रैगुन । ए सुन्य द्वैत जो ले खड़ी, निराकार निरंजन ॥७॥

प्रकृती महाप्रले होवहीं, सब तत्व गुन निरगुन । द्वैत उड़े कछू ना रहे, निराकार निरंजन सुंन ॥८॥

बानी जो अद्वैत की, सो कहावे सब्दातीत । सो जाग्रत बुध अद्वैत बिना, क्यों सुध पावे द्वैत ॥९॥

पैगंमर या तीर्थंकर, कई हुए अवतार । किन ब्रोध न मेट्यो विस्व को, किए नहीं निरविकार ॥१०॥

एते दिन त्रैलोक में, हुती बुध सुपन । सो बुध जी बुध जाग्रत ले, प्रगटे पुरी नौतन ॥११॥

अब सो साहेब आइया, सब सृष्ट करी निरमल । मोह अहंकार उड़ाए के, देसी सुख नेहेचल ॥१२॥

सो मगज माएने हुकमें, खोले हम सैयन । सो कलाम जो हक के, सुख होसी उमत सबन ॥१३॥

रोसन किल्ली दई हमको, यों कर किया हुकम । खोल दरवाजे पार के, इत बुलाए लीजो सृष्टब्रह्म ॥१४॥

ब्रह्मसृष्ट जाहेर करूं, करसी लीला रोसन । अखंड धनी इत आए के, किया जाहेर मूल वतन ॥१५॥

तीन ब्रह्मांड जो अब रचे, ब्रह्मसृष्ट कारन । आप आए तिन वास्ते, सखी पूरे मनोरथ तिन ॥१६॥

अखंड सुख सबन को, होसी चौदे तबक । सो बरकत ब्रह्मसृष्ट की, पावें दीदार सब हक ॥१७॥

ख्वाब की अकल छोड़ के, कहूं अर्स के कलाम । हक बका जाहेर करूं, अखंड सुख जे ठाम ॥१८॥

दुनी द्वैत जुबां छोड़ के, कहूं जुबां अकल और। कलाम कहूं अर्स अजीम के, महामत बैठे इन ठौर ॥१९॥

ला मकान सुन्य निरगुन, छोड़ फना निरंजन । छर अछर को छोड़ के, ए ताको मंगला चरन ॥२०॥

मंगला चरन तमाम

॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥८६॥

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