परिकरमा - प्रकरण ३
और ढाल चली
अब आओ रे इस्क भानूं हाम, देखूं वतन अपना निज धाम । करूं चरन तले विश्राम, विलसों पियाजी सों प्रेम काम ॥१॥
अब बानी अद्वैत मैं गाऊं, निज सरूप की नींद उड़ाऊं । सब सैयों को भेली जगाऊं, पीछे अछर को भी उठाऊं ॥२॥
जब प्रले प्रकृती होई, ना रहे अद्वैत बिना कोई । एक अद्वैत मंडल इत, धनी अंगना के अंग नित ॥३॥
अब याही रट लगाऊं, ए प्रेम सबों को पिलाऊं । अब ऐसी छाक छकाऊं, अंग असलू इस्क बढ़ाऊं ॥४॥
धनी धाम देखन की खांत, सो तो चुभ रही मेरे चित । किन बिध बन मोहोल मंदिर, देखों धनी जी की लीला अंदर ॥५॥
विलास सरूप किन भांत, बिन देखे क्यों उपजे स्वांत । जल जिमी पसु पंखी थिर चर, सब ठौर और अछर ॥६॥
सब सोभा देखों निज नजर, अपना वतन निज घर । धनी केहे केहे चित चढ़ाई, पर नैनों अजूं न देखाई ॥७॥
तुम दई जो पिया मोहे निध, सो तो संगियों को कही सब विध । और हिरदे जो मोहे चढ़ाई, सो भी देऊं इनों को दृढ़ाई ॥८॥
अब सुनियो साथ सुनाऊं, पीछे निज नैनों देख देखाऊं । जोत जवेर चबूतरे दोए, ताकी उपमा मुख न होए ॥९॥
द्वार आगे चबूतरे तीन, दोए दोए तरफ एक भिंन । दोनों पर नंगो के फूल, चित्त निरखे होत सनकूल ॥१०॥
बेला कई रंगों कई नकस, देखो एक दूजी पे सरस । ता बीच चरनी केती कई रंग, बेलां कटाव जड़ित कई नंग ॥११॥
दोऊ तरफ किनारे कांगरी, कई भांत दोरी नंग जरी । दाहिने हाथ भिंन चबूतरा, ता बीच गली लगता तीसरा ॥१२॥
ऊपर दरखत छाया बराबर, सब रही चबूतरे भर । चारों तरफों तीन तीन चरनी, किनारे की सोभा जाए न बरनी ॥१३॥
उज्जल भोम को कहा कहूं तेज, जानो बीज चमके रेजा रेज । ए जोत आसमान लों करत, जोत आसमान सामी लरत ॥१४॥
सो परे बन पर झलकार, जोत बन की न देवे हार । इन मंदिरों को जो उजास, सो तो मावत नहीं आकास ॥१५॥
जोत तेज प्रकास जो नूर, सब ठौरों सीतल सत सूर । जोत रोसन भरयो आसमान, किरना सके न कोई काहूं भान ॥१६॥
सोभा क्यों कहूं या मुख बन, सो तो होए नहीं बरनन । इत सब तत्वों की खुसबोए, सो इन जुबां बरनन क्यों होए ॥१७॥
इत जल वाए के चलत जो पूर, सो मैं क्या कहूं ताको नूर । जल के जो उठत तरंग, ताकी किरना देखावे कई रंग ॥१८॥
चांद सूरज धनी के हजूर, सो मैं क्या कहूं ताको नूर । इत जमुना जी के सातों घाट, मध्य का जल जो बीच पाट ॥१९॥
तापर दयोहरी एक, जल पर पाट कठेड़ा विसेक । चारो थंभों के जो नंग, झलके माहें जल के तरंग ॥२०॥
आड़े ऊंचे याके तले, चार चार थंभ तीन तीन घड़नाले । याकी जोत आकास न मावे, किरना फेर फेर जिमी पर आवें ॥२१॥
तिनथें तीन घाट तरफ बाएं, ताकी जुदी तीनो बनराए । बन बड़ा इनथें भी बाएं, पिया सैयां खेलन कबूं कबूं जाएं ॥२२॥
लम्बी डारें ऊंचा बन, कई भांत हिंडोले झूलन । तीन घाट कहे सो देखाऊं, सुनो तीनों बनों के नाऊं ॥२३॥
केल लिबोई और अनार, और तीन बन दाहिनी किनार । बट नारंगी जांबू बनराए, पाट के घाट अमृत केहेलाए ॥२४॥
जल पर डारें लगियां आए, दूजियां भोम तरफ सोभाए । जमुना जी के दोऊ किनारे, बन जल पर लगी दोऊ हारें ॥२५॥
आधों आध हुइयां डारें, बन रंग सोभित दोऊ पारें । आगे बन के जो मन्दिर, ताको बरनन करूं क्यों कर ॥२६॥
बेलां बन चढ़ियां इन सूल, हुई दिवालें पात फूल । गिरद चारों तरफों फूले फूल रंग, जुदी हारें सोभा जिन संग ॥२७॥
इत लता चढ़ियां अति घन, ऊपर फूलों के फूले हैं बन । जानों जवेर रंग अनेक, कुंदन में जड़े विवेक ॥२८॥
बीच जमुना जी के और मन्दिर, अतिबन सोभित बन के अंदर । कई सेज्या बनी फूल बन में, कई रंग हुए सघन में ॥२९॥
इत खेलत जुत्थ सैयन, सदा आनन्द इन वतन । मिनें राज स्यामाजी दोए, सुख याही आतम सब कोए ॥३०॥
पेड़ जुदे जुदे लम्बी डारी, छाया घाटी सोभे नीची सारी । निकसी एक थें दूजी गली, सो तो तीसरी में जाए मिली ॥३१॥
कई आवत बीच आड़ियां, कई सिधियां कई टेढ़ियां । बन गलियों में बराबर, न कहूं अधिक न छेदर ॥३२॥
ऊपर ढांपियां सारी सनन्ध, सोभा बनी जो दोरी बंध । तले भोम नजर आवे जेती, उज्जल कहा कहूं जोत सुपेती ॥३३॥
जिमी ऊपर तले जो रेती, जानों तितके बिछाए मोती । कहूं अति बारीक कहूं छोटे, कहूं बड़े बड़े रे मोटे ॥३४॥
कित जानों हीरा कनी, हर ठौर हर भांत घनी । कित दोखूनी तीन चौखूनी, कित फिरती कहूं गोल बनी ॥३५॥
ए विध कहूं मैं केती, सो होए न याकी गिनती । बन फूल फूले बहु रंग, झलूब रहे बोए सुगंध ॥३६॥
एक खूबी और खुसबोए, याकी किन जुबां कहूं मैं दोए । एक सुगंध दूजा नूर, रहया सब ठौरों भर पूर ॥३७॥
तलाव जमुना जी के मध, बन के मंदिर या विध । ए खेलन के सब ठौर, तलाव विध है और ॥३८॥
तलाव बनें लिया घेर, ऊपर दयोहरियां चौफेर । कई पावड़ियां जो किनारे, बड़ा चौक तले जाली बारे ॥३९॥
बन लेवत सोभा पाले, कई हिंडोले लम्बी डालें । घाट पाट दयोहरी कई रंग, जल सोभा लेत तरंग ॥४०॥
गेहेरा अति सुन्दर जल, बीच में बन्यो है मोहोल । जल ऊपर मोहोल जो छाजे, बीच बीच में बन विराजे ॥४१॥
जल मोहोल तले जो खलके, मंदिर कोट प्रकास मनी झलके । बन को झुन्ड पाल पर एक, तले सोभा अति विसेक ॥४२॥
झुन्ड तले सोभा कही न जाए, धनी इत बिराजत आए । धनी बैठत साथ मिलाए, सब सिनगार साज कराए ॥४३॥
इन ठौर सोभा जो अलेखे, चित सोई जाने जो देखे । मध्य बन धाम के गिरदवाए, सोभा एक दूजी पे सिवाए ॥४४॥
बट पीपल निकट बनराए, सो देखे न दृष्ट अघाए । ज्यों ज्यों देखिए त्यों त्यों सोभाए, पेहेले थें पीछे अधिकाए ॥४५॥
फिरते बन धाम विराजे, ऊपर आए रहया लग छाजे । चारों तरफों फूले फूल बन, कई रंग सोभा अति घन ॥४६॥
बरन्यो न जाए या मुख, चित्त में लिए होत है सुख । बन में खेलें टोले टोले, मोर बांदर करत कलोले ॥४७॥
मिल मिल करें टहुंकार, मुख मीठी बानी पुकार । बांदर ठेकों पर ठेक देत, टेढ़ी उलटी गुलाटें लेत ॥४८॥
तीतर लवा कोकिला चकोर, सब्द वाले सामी टकोर । सुआ मैना करें चोपदारी, चातुरी इन आगे सब हारी ॥४९॥
सखियों के नाम ले ले बुलावें, धनीजी के आगे मुजरा करावें । पंखी पिउ पिउ तुहीं तुहीं करे, कई बिध धनी को हिरदे धरें ॥५०॥
तिमरा भमरा स्वर साधें, गुंजे गान पिया सों चित बांधें । मृग कस्तूरियां घेरों घेर, करें सुगंध बन चौफेर ॥५१॥
हाथी बाघ चीते सियाहगोस, खेलें मिलें आतम नहीं रोस । हंस गरूड़ पंखी कई जात, नाम लेऊं केते कै भांत ॥५२॥
कई मुरग सुतर कुलंग, खेल करें लड़ाई अभंग । सीनाकस गुलाटें खावें, कबूतर अपनी गत देखावें ॥५३॥
हरन सांम्हर पस्वाड़े पाड़े, खेलें सब कोई अपने अखाड़े । मुजरे को दोऊ समें आवें, खेल सब कोई अपना देखावें ॥५४॥
पसु पंखी अनेक हैं नाम, सोभे केसों पर चित्राम । अति सुन्दर जोत अपार, याके खेल बोल मनुहार ॥५५॥
जमुनाजी के जो पार, बन पसु पंखी याही प्रकार । मोहोल सामे सोभे मोहोल, सो मैं क्यों कहूं या मुख कौल ॥५६॥
दरवाजे सामी दरवाजे, नूर सामी नूर बिराजे । नूर किरना उठें साम सामी, जोत रही सबों ठौर जामी ॥५७॥
लीला दोऊ दोनों ठौर, भांत दोऊ पर नाहीं और । फिरते अछर के जो बन, लीला एकै देखियत भिंन ॥५८॥
कई मिलावे सोहने, धनी सैयों के खेलौने । पसु पंखी जुत्थ मिलत, आगे बड़े दरवाजे खेलत ॥५९॥
दोऊ कमाड़ रंग दरपन, माहें झलकत सामी बन । नंग बेनी पर देत देखाई, ए सोभा कही न जाई ॥६०॥
कई कटाव नकस जवेर, सोभित नंग चौक चौफेर । फिरते द्वारने जो मनी, ताकी जोत प्रकास अति घनी ॥६१॥
याके तीन तरफ जो दिवाल, कई जवेर भोर रंग लाल । गोख खिड़की जाली जवेर, कई जड़ाव दिवाल चौक चौफेर ॥६२॥
गिरद झरोखे के थंभ फिरते, जुदी कई जिनसों जोत धरते । नव भोम रंग बरनन, तापर खुली चांदनी उठत किरन ॥६३॥
मंदिर याकी कांगरी करे जोत, जानो तहां की बीज उद्दोत । दरवाजे में ठौर रसोई, जित बड़ा मिलावा नित होई ॥६४॥
स्याम मंदिर रसोई होत जित, जोड़े सेत मंदिर है तित । बन थें फिरें संझा जब, इन मंदिरों अरोगें तब ॥६५॥
चरनी आगे मिलावा होत, जुत्थ लाड़बाई धरे जोत । साक बांदर जो ल्यावत, आगे सखियां सब समारत ॥६६॥
कई चौक चबूतरे अंदर, कई विध गलियां मंदिर । कई जड़ाव दिवाल द्वार जोत धरे, ए जुबां बरनन कैसे करे ॥६७॥
कई नकस पुतली चित्रामन, कई बेल पसु पंखी बन । कंचन कड़े जंजीरां जड़ियां, कई झलके थंभ सीढ़ियां ॥६८॥
माहें वस्तां संदूक जोगवाई, सो तो अगनित देत देखाई । ताके खिल्ली किनारे भमरियां, ऊपर वस्तां अनेक बिध धरियां ॥६९॥
ए मैं क्यों कर करूं बरनन, तुम लीजो कर चितवन । नव भोम सबों के मंदिर, देखो वस्तां अपनी चित्त धर ॥७०॥
सेज्या सबन के सिनगार, हिरदे लीजो कर निरधार । सब जोगवाई है पूरन, कमी नाहीं काहू में किन ॥७१॥
हाँस विलास सनेह प्रेम प्रीत, सुख पिया जी को सब्दातीत । डब्बे तबके सीसे सीकियां, कई देत देखाई लटकतियां ॥७२॥
चौकियां माचियां सिंघासन, कई हिंडोले जंजीर कंचन । कई बासन धात अनेक, कई बाजंत्र विविध विसेक ॥७३॥
कई झीले चाकले दुलीचे बिछोनें, कई बिध तलाई सिरानें । कई रंग ओछाड़ गाल मसूरे, कई सिरख सोड़ मन पूरे ॥७४॥
सेज्या सिनगार के जो भवन, दोए दोए नव खण्ड सबन । दूजी भोम किनारे बाएं हाथ, कबूं कबूं सिनगार करें इत साथ ॥७५॥
इत खड़ोकली जल हिलोले, धनी साथ झीलें-झकोलें । इत सिनगार करके खेलें, ठौर जुदे जुदे जुत्थ मिलें ॥७६॥
साम सामें मन्दिरों के द्वार, नव भोम फिरती किनार । ता बीच थंभो की दोए हार, कई रंग नंग तेज अपार ॥७७॥
जेती मैं कही जोगवाई, सो देख देख आतम न अघाई । या बाहेर या अंदर, सब एक रस मोहोल मन्दिर ॥७८॥
केहेती हों करके हेत, सारे दिन की एह बिरत । तुम लीजो दृढ़ कर चित्त, अपना जीवन है नित ॥७९॥
श्री धाम की आठ पोहोर की बीतक
तीजी भोम की जो पड़साल, ठौर बड़े दरवाजे विसाल । धनी आवत हैं उठ प्रात, बन सींचत अमृत अघात ॥८०॥
पसु पंखी का मुजरा लेवें, सुख नजरों सबों को देवें । पीछे बैठ करें सिनगार, सखियां करावें मनुहार ॥८१॥
श्री स्यामाजी मन्दिर और, रंग आसमानी है वा ठौर । चार चार सखियां सिनगार करावें, स्यामाजी श्री धनी जी के पासे आवें ॥८२॥
सोभा क्यों कर कहूं या मुख, चित में लिए होत है सुख । चित्त दे दे समारत सेंथी, हेत कर कर बेनी गूंथी ॥८३॥
मिनों मिने सिनगार करावें, एक दूजी को भूखन पेहेरावें । साथ सिनगार करके आवें, जैसा धनी जी के मन भावे ॥८४॥
सैयां लटकतियां करें चाल, ज्यों धनी मन होत रसाल । सैयां आवत बोलें बानी, संग एक दूजी पे स्यानी ॥८५॥
सैयां आवत करें झनकार, पाए भूखन भोम ठमकार । झलकतियां रे मलपतियां, रंग रस में चैन करतियां ॥८६॥
कंठ कंठ में बांहों धरतियां, चित्त एक दूजी को हरतियां । सुन्दरियां रे सोभतियां, एक दूजी को हाँस हँसतिया ॥८७॥
कई फलंग दे उछलतियां, कई फूल लता जो फेरतियां । कई हलके हलके हालतियां, कई मालतियां मचकतियां ॥८८॥
कई आवत हैं ठेलतियां, जुत्थ जल लेहेरां ज्यों लेवतियां । कई आवें भमरी फिरतियां, एक दूजी पर गिरतियां ॥८९॥
कई सीधियां सलकतियां, कई विध आवें जो चलतियां । सखी एक दूजी के आगे, आए आए के चरनों लागे ॥९०॥
इत बड़ा मिलावा होई, जुदी रहे न या समें कोई । कोई छज्जों कोई जालिएं, कोई मोहोलों कोई मालिएं ॥९१॥
इत चार घड़ी लों बैठें, मेवा मिठाई आरोग के उठें । दाहिनी तरफ दूजा जो मंदिर, आए बैठे ताके अंदर ॥९२॥
नीला ने पीला रंग, ताकी उठत कई तरंग । दोऊ रंगों की उठत झांई, इन मंदिरों दिवालों के तांई ॥९३॥
पैठते दाहिने हाथ जांही, सेज्या है या मंदिर मांहीं । कई जिनस जड़ाव सिंघासन, राजस्यामाजी के दोऊ आसन ॥९४॥
झरोखे को पीठ देवें, बैठे द्वार सनमुख लेवें । संग सखियां केतिक विराजें, या समें श्री मंडल बाजे ॥९५॥
नवरंगबाई जो बजावें, मुख बानी रसीली गावें । इत बाजत बेन रसाल, बेनबाई गावें गुन लाल ॥९६॥
सखी एक निकसें एक पैठें, एक आवें उठें एक बैठें । इन समें भगवान जी इत, दरसन को आवें नित ॥९७॥
झरोखे सामी नजर करें, परनाम करके पीछे फिरें । इत और न दूजा कोए, सरूप एक है लीला दोए ॥९८॥
भगवान जी खेलत बाल चरित्र, आप अपनी इच्छा सों प्रकृत । कोट ब्रह्मांड नजरों में आवें, खिन में देखके पलमें उड़ावें ॥९९॥
और एतो लीला किसोर, सैयां सुख लेवें अति जोर । ए लीला सुख केता कहूं, याको पार परमान न लहूं ॥१००॥
सखियां केतिक बन में जावें, साक पान मेवा सब ल्यावें । घड़ी चार खेल तित करें, दिन पोहोर चढ़ते आवें घरे ॥१०१॥
ए सब इच्छा सों मंगावें, पर सखियों को सेवा भावे । सैयां सेवा करन बेल ल्यावें, लेवें एक दूजी पे छिनावें ॥१०२॥
निकसते दाहिनी तरफ जो ठौर, सैयां आए बैठें चढ़ते दिन पोहोर । मिलावा होत दिवालों के आगे, सैयां पान बीड़ी वालने लागे ॥१०३॥
मसाला समार समार के लेवें, सखी एक दूजी को देवें । डेढ़ पोहोर चढ़ते दिन, बीड़ी वाली सैयां सबन ॥१०४॥
बीड़ियों की छाब लेकर, धरी पलंग तले चौकी पर । श्री राज बैठे बातां करें, श्री स्यामाजी चित्त धरें ॥१०५॥
सैयां परसपर करें हाँस, लेवें धनीजी को विविध विलास । घड़ी दो एक तापर भई, लाड़बाई आए यों कही ॥१०६॥
श्री धनीजी की अग्या पाऊं, तो या समें रसोई ले आऊं । श्री धनीजीने अग्या करी, सैयां चौकी आन आगे धरी ॥१०७॥
सैयां दोए चाकले ल्याई, सो तो दोनों दिए बिछाई । श्री राज उतारे वस्तर, पेहेनी पिछोरी कमर पर ॥१०८॥
श्री राज चाकले आए, श्री स्यामाजी संग सोहाए । श्री राज पखाले हाथ, श्री स्यामाजी भी साथ ॥१०९॥
सैयां दौड़ दौड़ के जावें, आरोगने की वस्तां ल्यावें । मेवा अंन ने साक मिठाई, कई विध सामग्री ले आई ॥११०॥
एक ले चली साक कटोरी, तापे छीन ले चली दूसरी । तिनथे झोंट ले चली तीसरी, चौथी वापे भी ले दौरी ॥१११॥
जो कदी छीन लेत हैं जिनपे, पर रोस न काहू किनपे । इतथें जो फिर कर गैयां, तिन और कटोरी जाए लैयां ॥११२॥
यों एक एक पे लेवें, हेत एक दूजी को देवें । सब मंदिर करें झनकार, स्वर उठत मधुर मनुहार ॥११३॥
सैयां दौड़त हैं साम सामी, सब्द रहयो सबों ठौर जामी । कई स्वर उठत भूखन, पड़छंदे परें स्वर तिन ॥११४॥
कई बिध उठत मीठी बानी, मुख बरनी न जाए बखानी । इन समें की जो आवाज, सोभा धाममें रही बिराज ॥११५॥
दूध दधी ल्याई लाड़बाई, सोतो लिए मन के भाई । सब खेलें हाँसी करें, आए आए धनी जी के आगे धरें ॥११६॥
या समें दौड़त भूखन बाजे, पड़छंदे भोम सब गाजे । झारी लेके चल्लू कराई, मुख हाथ रूमाल पोंछाई ॥११७॥
श्री स्यामाजी चल्लू करी, दोए बीड़ी दो मुख में धरी । श्री राज उठ बैठे सिंघासन, संग स्यामाजी उठे ततखिन ॥११८॥
दोऊ आसन जोड़े आए, सैयां चौकी चाकले उठाए । सैयां तले आरोगने गैयां, आरोग आए पान बीड़ी लैयां ॥११९॥
सेज्या आए श्री जुगल किसोर, तब दिन हुआ दो पोहोर । सैयां बैठी जुदे जुदे टोले, करें रेहेस बातें दिल खोलें ॥१२०॥
तित कई विध रस उपजावें, कई विलास मंगल मिल गावें । कई हँस हँस ताली देवें, यों कई बिध आनंद लेवें ॥१२१॥
कई बैठत छज्जों जाए, बैठें अंगसों अंग मिलाए । मुख बानीसों हेत उपजावें, एक दूजी को प्रेम बढ़ावें ॥१२२॥
रस अनेक बातन लेवें सुख, सो मैं कहयो न जाए या मुख । सरूप सोभा जो सुन्दरता, बस्तर भूखन तेज जोत धरता ॥१२३॥
कई बैठत मिलावे आए, बैठें अंगसों अंग लगाए । सुख एक दूजी को उपजावें, मुख बानी सों प्रीत बढ़ावें ॥१२४॥
हाँस विनोद ऐसा करें, सुख प्रेम अधिक अंग धरें । यों सुख मिनों मिने लेवें, सखी एक दूजीको देवें ॥१२५॥
कई बैठत जाए हिंडोले, अनेक करत कलोलें । कई बैठत जाए पलंगे, बातां करत मिनों मिने रंगें ॥१२६॥
यों अनेक विधें सुख नित, पियाजी को सदा उपजत । सब सैयां पोहोर पीछल, टोलें तीसरी भोम आवें चल ॥१२७॥
मंदिर आइयाँ सैयां जब, खुले द्वार दरसन पाए सब । तब आए सबे सुखपाल, स्यामाजी बैठे संग लाल ॥१२८॥
दोए दोए सैयां सब संग, मिल बैठ करें कई रंग । सुखपाल चलावें मन, ज्यों चाहिए जैसा जिन ॥१२९॥
या जमुनाजी या तलावे, आए खेलें जो मन भावें । श्री राज स्यामाजी के डेरे, सुखपाल उतारे सब नेरे ॥१३०॥
जुत्थ जुदे जुदे बन खेलें, खेल नए नए रंग रेलें । तब लग खेलें साथ सब, दिन घड़ी दोए पीछला जब ॥१३१॥
सैयां मिलकर पिउ पासे आवें, झीलने की बात चलावें । श्री राज स्यामाजी उठकर, उतारे हैं वस्तर ॥१३२॥
पेहेने वस्तर जो झीलन, राज स्यामाजी सैयां सबन । इत एक घड़ी लों झीलें, जल क्रीड़ा कई रंग खेलें ॥१३३॥
बाकी दिन रहयो घड़ी एक, तामें सिनगार किए विवेक । हुओ संझाको अवसर, राज स्यामाजी बैठे सिनगार कर ॥१३४॥
मिनों मिने सिनगार करावें, एक दूजीके आगे धावें । उछरंगतियां आवें आगे, राज स्यामाजी के पांउ लागे ॥१३५॥
पांउ लागके पीछियां फिरें, खेल चित चाहया त्यों करें । कई रंग फूले फूल बास, लेत नए नए बनके विलास ॥१३६॥
ससि बन याही जोत तेज, सब तत्व तेज रेजा रेज । करें खेल अति उछरंग, तामें कबूं कबूं पियाजी के संग ॥१३७॥
इत कई विध मेवा आरोगें, बनहीं को लेवें विभोगें । इत नित विलास विसाल, पीछे आए बैठे सुखपाल ॥१३८॥
इत हुई पोहोर एक रात, सुखपाल चलावें चित चाहत । घरों आए सुखपाल सारे, राज स्यामाजी पांचमी भोम पधारे ॥१३९॥
पंद्रा दिन खेलें बन, पंद्रा दिन सुख भवन । अब कहूं भवन को सुख, जो श्री धनीजी कहयो आप मुख ॥१४०॥
बनथें आए सिनगार कर, संझा तले भोम मन्दिर । आरोग चढ़े भोम चौथी, खेलें नवरंगबाई की जुत्थी ॥१४१॥
निरत करे नवरंगबाई, पासे कई विध बाजे बजाई । निरत करें और गावें, पासे सखियां स्वर पुरावें ॥१४२॥
कर भूखन बाजे चरन, ताकी पड़ताल परे सब धरन । पांऊं ऐसी कला कोई साजे, सब में एक घूंघरी बाजे ॥१४३॥
जब दोए रे दोए बोलावें, तब तैसे ही पांउं चलावें । तीन कहें तो बाजे तीन, चार बाजे कला सब लीन ॥१४४॥
जो बोलावें झांझरी एक, जानों एही खेल विसेक । जिनको रे बोलावत जैसे, सो तो बोलत भूखन तैसे ॥१४५॥
जब बोलावें सर्वा अंगे, भूखन बोले सबे एक संगे । जब जुदे जुदे स्वर बोलावें, छब जुदी सबोंकी सोहावे ॥१४६॥
भूखन करत जुदे जुदे गान, मुख बाजे करें एक तान । क्यों कर कहूं ए निरत, सोई जाने जो हिरदे धरत ॥१४७॥
अनेक स्वरों बाजे बाजें, पड़छंदे भोम सब गाजें । सुंदरियां सोभा साजें, सो तो धनीजी के आगे बिराजे ॥१४८॥
निरत भूखन बाजे गान, देखो ठौर सैयां सब समान । इन लीला में आयो चित्त, छोड़यो जाए न काहूं कित ॥१४९॥
छुटकायो भी ना छूटे, तो आतम दृष्ट कैसे टूटे । इत बोहोत लीला कहूं केती, सोई जाने लगी जाए जेती ॥१५०॥
थंभों दिवालों नंगों तेज जोत, जानों निरत सबों ठौर होत । पिया पीछल मंदिर सेत दिवाल, तामें कई रंग नंग विसाल ॥१५१॥
दाहिने हाथ मंदिर रंग लाखी, कई कटाव दिवाल दिल साखी । बांई तरफ पीली जो दिवाल, माहें स्याम सेत रंग लाल ॥१५२॥
सामे नीला मंदिर झलकत, साम सामी किरना लरत । रहया नूर नजरों बरस, जुबां क्या कहे धनीको रंग रस ॥१५३॥
पोहोर रैनी लगे जो खेलावें, पीछे मुख अग्या करके बोलावें । इतहीं थें अग्या करी, पांउं लाग सेज्या दिल धरी ॥१५४॥
दई अग्या सबों बड़ भागी, आइयां मंदिर चरनों लागी । श्री राज स्यामाजी सेज्या पधारे, कोई कोई वस्तर भूखन वधारे ॥१५५॥
ए मंदिर रंग-परवाली, सो मैं क्या कहूं ताकी लाली । माहें अनेक रंगों की जोत, सो मैं कही न जाए उद्दोत ॥१५६॥
पीछल बीसक पिउ पासे रहियां, सो भी आइयां घरों सब सैयां । पिउजी सबों मन्दिरों पधारे, होत सेज्या नित विहारे ॥१५७॥
अब क्यों रे कहूं प्रेम इतको, सुख लेवें चाहयो चितको । सुख लेवें सारी रात, तीसरी भोम आवें उठ प्रात ॥१५८॥
अब कहूं या समें की बात, सो तो अति बड़ी विख्यात । कोई होसी सनमन्धी इन घर, सो लेसी वचन चित धर ॥१५९॥
ए बानी तिछन अति सार, सो निकसेगी वार के पार । सनमन्धियों की एही पेहेचान, वाके सालसी सकल संधान ॥१६०॥
जाको लगी सोई जाने, मुख बरनी न जाए बखाने । खेल मांग के आइयां जित, धनी आए के बैठे तित ॥१६१॥
पासे बैठके खेल देखावें, हाँसी करने को आप भुलावें । भूलियां आप खसम वतन, खेल देखाया फिराए के मन ॥१६२॥
अब केहेती हों साथ सबन, घर जागोगे इन वचन । जित मिल कर बैठियां तुम, याद करो आप खसम ॥१६३॥
तले भोम थंभों की जुगत, कही जाए न बानी सों बिगत । इत बड़ा चौक जो मध, ताकी अति बड़ी सोभा सनन्ध ॥१६४॥
आगे पीछे थंभों की हार, दाएं बाएं दोऊ पार । जोत चारों तरफों जवेर, झलकार छाई चौफेर ॥१६५॥
मंदिर दिवालों थंभों के जो पार, सोभा करत अति झलकार । जोत ऊपर की जो आवे, तले की भी सामी ठेहेरावे ॥१६६॥
इत अनेक विधों के जो नंग, ताकी किरना देखावें कई रंग । आवत साम सामी अभंग, सो मैं क्यों कहूं नूर तरंग ॥१६७॥
इत याही चौक के बीच, बिछाया है दुलीच । दुलीचा भी वाही रसम, ताकी अति जोत नरम पसम ॥१६८॥
याकी हँसत बेल फूल रंग, सो भी करत जवेरों सों जंग । किरना होत न पीछी अभंग, ए भी सोभित जवेरों के संग ॥१६९॥
इत धरया जो सिंघासन, राज स्यामा जी के दोऊ आसन । ताको रंग सोभित कंचन, जड़े मानिक मोती रतन ॥१७०॥
पीछले तीन थंभ जो खड़े, ता बीच कई नकसों नंग जड़े । तकियों के बीच दोऊ सिरे, ताके फूलन पर नंग हरे ॥१७१॥
उतरती कांगरी जो हार, बने आसमानी नंग तरफ चार । कई बेल फूल जड़े माहीं, ताकी उठत अनेक रंग झांई ॥१७२॥
कई रंग नंग कहूं केते, हर एक तरंग कई देते । बांई बगलों तकिए दोए, बेलां बारीक बरनन कैसे होए ॥१७३॥
जो जनम सारे लो कहिए, तो एक नकस को पार न पैए । पचरंगी पाटी मिहीं भरी, कई विध खाजली माहें करी ॥१७४॥
कई चाकले चित्रकारी, ता पर बैठे श्री जुगल बिहारी । दोऊ सरूप चित में लीजे, फेर फेर आतम को दीजे ॥१७५॥
आतम सों न्यारे न कीजे, आतम बिन काहू न कहीजे । फेर फेर कीजे दरसन, आतम से न्यारे न कीजे अधखिन ॥१७६॥
पेहेले अंगुरी नख चरन, मस्तक लों कीजे बरनन । सब अंग वस्तर भूखन, सोभा जाने आतम की लगन ॥१७७॥
यों सरूप दोऊ चित में लीजे, अंग वार डार के दीजे । गलित गात सब भीजे, जीव भान भूंन टूक कीजे ॥१७८॥
रंग करो विनोद हाँस, सांचा सुख ल्यो प्रेम विलास । घरों सुख सदा खसम, लेत मेरी परआतम ॥१७९॥
पर इत सुख पायो जो मेरी आतम, सो तो कबहूं न काहू जनम । इत बैठे धनी साथ मिल, हाँसी करने को देखाया खेल ॥१८०॥
आगे बारे सहस्त्र बैठियां हिल मिल, जानों एकै अंग हुआ भिल । याको क्यों कहूं सरूप सिनगार, जाने आतम देखनहार ॥१८१॥
कई कोट कहूं जो अपार, जुबां क्या कहेगी झलकार । जैसे भूखन तैसे वस्तर, तैसी सोभा सरूप सुन्दर ॥१८२॥
इत बड़े चौक मिलावे, धनी साथको बैठे खेलावें । जो खेल मांग्या है सैयन, सो देखाया फिराए के मन ॥१८३॥
धनी धाम आप बिसर्जन, खेल देखाया जो सुपन । तामें बांधी ऐसी सुरत, सो अब पीछी क्यों ए ना फिरत ॥१८४॥
धनी दिए दरसन ता कारन, करने को सैयां चेतन । धनी आप सैयों को दई सुध, सो हम गावत अनेक विध ॥१८५॥
जागियां तो भी खेल न छोडें, फेर फेर दुख को दौड़ें । धनी याद देत घर को सुख, तो भी छूटे ना लग्यो जो विमुख ॥१८६॥
अब आप जगाए के धनी, हाँसी करसी मिनों मिने घनी । अब केहेती हों साथ सबन, घर जागोगे इन वचन ॥१८७॥
ए जो किया है तुम कारन, धनी धाम सैयां बरनन । जित मिलकर बैठियां तुम, याद करो आप खसम ॥१८८॥
करो अंतरगत गम, ए जो जाहेर देखाया हम । याद करो वतन सोई, और न जाने तुम बिना कोई ॥१८९॥
तुम मांगी धनी पे करके खांत, ए जो धनीएँ करी इनायत । याद करो सोई साइत, ए जो बैठके मांग्या तित ॥१९०॥
स्याम स्यामाजी साथ सोभित, क्यों न देखो अंतरगत । पीछला चार घड़ी दिन जब, ए सोई घड़ी है अब ॥१९१॥
याद करो जो कह्या मैं सब, नींद छोड़ो जो मांगी है तब । याद करो धनीको सरूप, श्री स्यामाजी रूप अनूप ॥१९२॥
याद करो सोई सनेह, साथ करत मिनों मिने जेह । सुख सैयां लेवें नित, अंग आतम जे उपजत ॥१९३॥
रस प्रेम सरूप है चित, कई विध रंग खेलत । बुध जाग्रत ले जगावती, सुख मूल वतन देखावती ॥१९४॥
प्रेम सागर पूर चलावती, संग सैयोंको भी पिलावती । पियाजी कहें इन्द्रावती, तेज तारतम जोत करावती ॥१९५॥
तासों महामत प्रेम ले तौलती, तिनसों धाम दरवाजा खोलती । सैयां जानें धाम में पैठियां, ए तो घरही में जाग बैठियां ॥१९६॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥२८२॥
